यह उस समय की बात है जब मैंने किराये पर एक कमरा और रसोई ले रखी थी। खुद ही पका कर खाता था। नौकरी की तलाश चल रही थी। मेरा एक दोस्त था कबीर। उम्र मेरे जितनी ही थी चौबीस साल। वो अपनी माँ के साथ मेरे बगल वाले कमरे में रहता था। उसके पास भी एक कमरा और रसोई ही थे। उसकी नौकरी एक प्राइवेट कंपनी में लगी हुई थी और वो मेरी नौकरी के लिए भी मेरे साथ था। मुझे दिल्ली आये तीन महीने हो चुके थे और पर नौकरी थी कि मिल ही नहीं रही थी। मैं अक्सर इस बात के लिए परेशान रहता था।

फिर एक दिन ……

दिन के ग्यारह बजे थे। सब अपने अपने काम पर जा चुके थे। पूरी बिल्डिंग खाली हो चुकी थी। सिर्फ एक दो औरतें ही थी जो अपने अपने काम में लगी हुई थी। सिवाय मेरे सबके पास करने के लिए कुछ न कुछ काम था। खाली पड़े पड़े बोर हो रहा था सो उठ कर टीवी देखने के लिए कबीर के कमरे की तरफ चल पड़ा।

जाकर जैसे ही मैंने दरवाजा खटखटाया, कबीर की माँ  किसी गाँव से थी, की आवाज आई- कौन है ?

मैंने कहा- आंटी, मैं राज।

तो वो बोली- बेटा, दो मिनट रुक ! अभी आती हूँ।

मैं सोच रहा था कि आंटी ऐसा क्या कर रही हैं कि दरवाजा खोलने के लिए उन्हें दो मिनट का समय चाहिए।

मैंने दरवाजे के छेद में से देखने की कोशिश की तो देखा- संतोष आंटी कपड़े बदल रही थी। आंटी ने केवल सलवार पहनी हुई थी उनका ऊपर का हिस्सा नंगा था। आंटी के दो बड़े बड़े खरबूजे जैसी चूचियाँ बिलकुल नंगी थी।

आंटी के बारे में मैं बता दूँ कि आंटी की उम्र करीब चालीस साल थी। आंटी ने बताया था कि उनकी शादी पन्द्रह साल की उम्र में ही हो गई थी और एक साल के बाद ही कबीर पैदा हो गया था। यानि आंटी मात्र सोलह साल की उम्र में ही माँ बन गई थी। कबीर के पैदा होने के सात साल बाद कबीर के बापू की एक सड़क दुर्घटना में मौत हो गई थी। इस दौरान आंटी ने एक लड़की भी पैदा करी थी जिसकी अब शादी हो चुकी थी। कबीर की भी शादी हो चुकी होती अगर वो नौकरी की तलाश में दिल्ली न आ गया होता। संतोष आंटी ने केवल सात-आठ साल सेक्स का मजा लिया था। आंटी ने अपने शरीर का पूरा ध्यान रखा था। तभी तो इस उम्र में भी आंटी की चूचियाँ एकदम से तनी हुई थी। बड़े बड़े तने हुए खरबूजे के साइज की चूचियाँ बेहद आकर्षक थी।

पहले भी मैंने एक दो बार गौर से इन चूचियों को देखा था पर ज्यादा समय वो चुन्नी के नीचे छिपी रहती थी। आज जब आंटी की चूचियों को नग्न देखा तो लंड एकदम से तन कर कच्छा फाड़ने को हो गया।

आंटी चूचियों के ऊपर कुछ लगा रही थी जिस के कारण दोनों चूचियाँ कमरे की रोशनी में चमक रही थी। आंटी ने अपना कमीज पहन लिया। मैंने देखा कि आंटी ने ब्रा नहीं पहनी थी।

आंटी ने आकर दरवाजा खोला और बोली- क्या बात है बेटा ?

"बस आंटी खाली बैठा बोर हो रहा था तो सोचा कुछ देर आपके पास बैठ कर टीवी देख लूँ ! इस बहाने कुछ देर आप के साथ भी गप-शप हो जायेगी।" मैंने कहा और आंटी के बिल्कुल बगल में बैठ गया।

आंटी की नंगी चूचियाँ देख कर मेरी तो पहले ही हालत खराब हो रही थी। लंड में अभी थी तनाव था। अगर आंटी एक-दो मिनट और दरवाजा न खोलती तो शायद मैं वहीं मुठ मार लेता।

आंटी ने मेरे सर पर हाथ फेरा और पूछा- क्या बात अभी तक कोई काम नहीं मिला ?

आंटी के हाथ फेरने से मेरे लंड और उछलने लगा था। अपने आप पर काबू पाते हुए मैंने कहा- अभी नहीं आंटी।

आंटी बोली- कोई बात नहीं बेटा ! मिल जायेगा।

आंटी की सहानुभूति लेने के लिए मैं रोनी सी सूरत करके झूठ-मूठ का रोने सा लगा।

आंटी ने बड़े प्यार से मुझे अपनी ओर खींचा और बोली- बेटा चिंता नहीं करते, जब सही वक्त आयेगा तो अपने आप कुछ काम मिल जायेगा।

मैं भी आंटी से चिपकता जा रहा था। आंटी मेरे सर और कमर पर हाथ फेर कर सहला रही थी जिसका मैं भरपूर आनंद ले रहा था। आंटी की वो भरपूर चूचियाँ बिल्कुल मेरे मुँह के पास थी। एक बार तो मन कर रहा था कि मुँह में पकड़ कर चूम लूँ पर डर भी लग रहा था। मैंने अपना एक हाथ आंटी की कमर पर बिल्कुल चूची के नीचे रख दिया। आंटी का दायाँ हाथ भी मुझे सहलाता हुआ नीचे की तरफ जा रहा था। मैं एकदम से चिंहुक उठा जब आंटी का हाथ अचानक मेरे लंड से टकराया। लंड तो पहले ही बिजली का खम्बा बना हुआ था। जैसा करंट आंटी के लंड छूने से मुझे लगा था कुछ वैसा ही करंट आंटी को भी लगा। तभी तो आंटी का बदन कुछ काँप सा उठा था। मैंने नजर उपर करके देखा तो आंटी की आँखे बंद थी। माथे पर पसीना था।

मैंने उठाने की कोशिश करते हुए जानबूझ कर एक हाथ से आंटी की दाईं चूची दबा थी। इस उम्र में भी आंटी की चूची कुछ कठोर सी लगी जैसे के तनी हुई चूची। मुझे इसका बहुत अनुभव था क्योंकि मैं कई चूतें फाड़ चुका था तब तक। जैसे ही मैंने चूची दबाई आंटी के मुँह से एक आह से निकली और उनका हाथ सरक कर मेरे लंड पर चला गया लेकिन बिल्कुल ऐसे जैसे कि अनजाने में सब हुआ हो। जैसे ही मैं अलग हुआ, आंटी का चेहरा कुछ परेशान सा लगा।

मैंने पूछा- आंटी क्या हुआ?

तो बोली- राज बेटा, अब तुम जाओ, मुझे कुछ काम है, बाद में आना।

मैंने कहा- ठीक है ! और उठकर बाहर आ गया।

आंटी ने जल्दी से दरवाजा बंद कर लिया। इस तरह जल्दी से दरवाजा बंद करने के कारण मुझे कुछ शक हुआ तो मैं एकदम से दरवाजे के पास पहुँचा और उसी छेद में से झाँकने लगा जिसमें से पहले देखा था। मेरा शक सही था। आंटी गर्म हो चुकी थी और आंटी अपनी सलवार नीचे कर रही थी। सलवार नीचे करके आंटी अपनी चूत में ऊँगली करने लगी जोर जोर से।

मुझे शरारत सूझी और मौका भी था, मैंने दरवाजा खटखटा दिया।

आंटी चौक उठी, झट से सलवार ऊपर करके आंटी ने दरवाजा खोला। आंटी के चेहरे पर पसीना साफ़ नजर आ रहा था।

क्या हुआ आंटी ? मैंने पूछा।

आंटी के मुँह से कोई आवाज नहीं निकली। मैंने आंटी को थोड़ा अंदर धकेला और दरवाजा बंद कर दिया।

आंटी बोली : यह तू क्या कर रहा है?

मैं बोला- आंटी, थोड़ी देर पहले आपने मेरी परेशानी दूर करी थी, अब मैं आपकी परेशानी दूर करना चाहता हूँ।

आंटी थोड़ा सकपका गई, उनकी आवाज लडखडा रही थी- मुझे क्या परेशानी है ….

मैंने आंटी के कंधे पर हाथ रखा और आंटी को अपनी तरफ खींचा और अपने होंठ आंटी के होठों पर रख दिए।

आंटी ने मुझे एक दम से धक्का दिया और बोली- यह तुम क्या कर रहे हो ?

आंटी, मुझे मालूम है कि आपको इसकी बहुत जरूरत है। वरना आप वो न करती जो अभी कुछ देर पहले कर रही थी।

मैं क्या कर रही थी ? आंटी ने चौंकते हुए पूछा।

मैं थोड़ा बेशर्म होते हुए बोला- आंटी, अभी आप अपनी चूत में उंगली नहीं कर रही थी क्या ?

आंटी चुप रही और मेरे मुँह की तरफ देखती रही।

मैं फिर बोला- आंटी, मैं आपकी यह जरूरत पूरी कर सकता हूँ।

आंटी बोली- नहीं राज, तुम मेरे बेटे जैसे हो बेटा। मैं तुम्हारे साथ नहीं कर सकती।

आंटी की आवाज में लंड की जरूरत साफ़ झलक रही थी। आंटी ने मुँह दूसरी तरफ कर लिया था। मैं आगे बढ़ा और आंटी की कमर में हाथ डाल कर आंटी को अपनी तरफ खींचा। मेरा तना हुआ लंड आंटी की मस्त गांड में चुभने लगा। आंटी के मुँह से सिसकारी निकल गई। मैंने दोनों हाथ ऊपर करके आंटी की दोनों चूचियाँ पकड़ ली।

हाय क्या मस्त चूची थी आंटी की। कब से इन्हें हाथों में लेने को तड़प रहा था।

आंटी अब भी मुझ से छुटने का हल्का प्रयास कर रही थी पर मेरी पकड़ इतनी कमजोर नहीं थी। मैं प्यार से आंटी की गर्दन पर चूमते-चूमते आंटी की मस्त चूचियाँ मसल रहा था। आंटी के मुँह से एक ही आवाज आ रही थी- छोड़ दे बेटा ! भगवान के लिए ऐसा मत कर।

इसी आवाज के बीच में मस्ती भरी सिसकारियाँ भी निकल रही थी। जिस से मुझे पता लग रहा था कि आंटी भी चूची मसलवाने का मजा ले रही हैं।

मैंने धीरे धीरे आंटी की कमीज उठानी शुरू की तो आंटी ने मेरा हाथ पकड़ लिया और धीरे से बोली- प्लीज, कपड़े मत उतारो ! कोई आ गया तो मुश्किल हो जायेगी।

मैंने आंटी की बात को अनसुना कर दिया और आंटी की कमीज को उतार कर एक तरफ़ फेंक दिया। आंटी के मस्त खरबूजे अब बिल्कुल नंगे मेरी आँखों के सामने थे। एक पल के लिए तो मैं उन्हें देखता रह गया क्योंकि आज तक इतनी बड़ी बड़ी चूचियाँ मैंने नंगी नहीं देखी थी। मैंने एक चूची को पकड़ा और मुँह में लेकर चूसने लगा। आंटी के मुँह से सेक्स भरी सिसकारी फ़ूट पड़ी। अब आंटी भी चुदने के लिए बिल्कुल तैयार थी।

मैं एक चूची मसल रहा था और दूसरी को चूस रहा था। आंटी ने भी अब हरकत करनी शुरू कर दी थी। आंटी ने हाथ बढ़ा कर मेरा लगभग आठ इंच का तना हुआ लंड पजामे के ऊपर से ही पकड़ लिया और धीरे धीरे सहलाने लगी। मैंने भी चूची चूसते चूसते आंटी की सलवार का नाड़ा खोल दिया। सलवार जमीन चूमने लगी। आंटी ने नीचे कोई अंडरवियर नहीं पहना हुआ था। सलवार नीचे जाते ही आंटी बिल्कुल नंगी हो गई थी। आंटी की चूत पर बड़ी बड़ी झांटे थी काली काली।

मैं एक हाथ से आंटी की चूत को सहलाने लगा। झांटें आंटी की चूत के रस से गीली हो चुकी थी। मैंने एक उंगली आंटी की चूत में सरका दी। आंटी एकदम से चिहुंक उठी। आंटी के मुँह से आआआह निकल गई।

कुछ देर चूत में उंगली पिलवाने के बाद आंटी ने मुझे अपने से दूर किया और मेरे लंड पर झपट पड़ी। मेरे पजामे को पकड़ कर नीचे सरका दिया। फिर अंडरवियर को भी उसी गति से नीचे खींच दिया। मेरा तना हुआ लंड अब आंटी के मुँह के बिल्कुल सामने था। आंटी ने बिना देर करे लंड को मुँह में ले लिया और जीभ घुमा घुमा कर लंड को चूसने लगी। अब सिसकारी निकलने की बारी मेरी थी। मेरी भी मस्ती के मारे आह्ह्ह निकल गई। आंटी मस्त हो कर लंड चूस रही थी।

पांच मिनट के बाद आंटी बोली- बेटा अब देर मत कर ! चोद दे मुझे। जल्दी कर अगर कोई आ गया तो सारा मजा खराब हो जायेगा।

मैंने कहा- आंटी तुम बस मजे लो ! कोई आएगा तो मैं अपने आप देख लूँगा।

आंटी अब बिस्तर पर टाँगें खोल कर लेट गई, आंटी की खुली हुई लाल लाल चूत साफ़ दिख रही थी। मैं आंटी की टांगों के बीच में बैठ गया और आंटी की बड़ी बड़ी झांटो को सहलाने लगा। आंटी की सिसकारियाँ चालू थी। मैं आंटी की चूत पर झुक गया। मैं बता दूँ कि मुझे चूत की खुशबू बहुत अच्छी लगती है। मैंने अपनी जीभ आंटी की चूत के लाल लाल दाने पर रख दी। आंटी एकदम उछल पड़ी। आंटी बोली- बेटा यह क्या कर रहा है? तेरे अंकल ने तो कभी भी ऐसा नहीं किया।

क्या बात करती हो मेरी जान ! इस अमृत के लिए तो दुनिया तरसती है ! और मैं फिर से चूत चाटने में लग गया।

आंटी ज्यादा देर बर्दाश्त नहीं कर पाई और उसने ढेर सारा रस मेरे मुँह पर उछाल दिया जिसे मैं चाट गया। रस निकलने के बाद आंटी थोड़ी सुस्त सी पड़ गई। मैं उठा और मैंने एक बार फिर अपना लंड आंटी के मुँह में घुसेड़ दिया। आंटी लंड चुसती रही और मैं आंटी की चूची से खेलता रहा।

दो मिनट के बाद ही आंटी बोल पड़ी- बेटा, अब लंड का मजा भी देगा या नहीं इस चूत को। पूरे सोलह साल बाद लंड नसीब हुआ है निगोड़ी को।

क्या बात करती हो आंटी ! आपने इतने साल से लंड का स्वाद नहीं लिया?

हाँ बेटा, तेरे अंकल के मरने के बाद से लंड देखा भी नहीं सही से।

सच ?

हाँ बेटा, तेरे अंकल के मरने के बाद एक बार कबीर के दादा जी ने मेरे साथ बलात्कार करने के कोशिश की तो मैं कबीर और सुमन को लेकर शहर आ गई। उनको पालने पोसने में ही जिंदगी गुजर गई। कभी सेक्स के बारे में सोचा ही नही। हाँ, कभी कभी जब ज्यादा दिल करता तो ऊँगली या मोमबत्ती से इस चूत को शान्त कर लेती थी।

मैंने पूछा- फिर आज कैसे?

आंटी बोली- जब तुम रोते हुए मुझसे लिपटे तो तुम्हारे बदन का स्पर्श ना जाने क्यों मुझे बहुत अच्छा लगा और बदन में एक आग सी लग गई और मैं अपने आप को रोक ही नहीं पाई। फिर तुमने मेरी चूची दबा कर उस आग में घी का काम कर दिया। जब तुम्हारे इस लोहे की रॉड जैसे लंड को छुआ तो मैं बेबस हो गई। ऊँगली से आग बुझाना चाहती थी कि तुमने दरवाजा खटखटा दिया। फिर तो तुम्हें मालूम ही है मेरी जान।

सुनते हुए मैं आंटी की चूचियों से खेल रहा था। आंटी फिर से गर्म हो चुकी थी। अब मैं भी देर नहीं करना चाहता था क्योंकि सच में कोई आ भी सकता था।

मैं आंटी की टांगों के बीच में पहुँचा और अपना लंड आंटी की गर्म गर्म चूत के मुँह पर रख दिया।

आंटी बोली- बेटा, अब और ना तड़पा।

मैंने भी जोश में एक जोरदार धक्का लगा किया। मैं यह भूल गया कि आंटी की चूत बहुत सालों से चुदी नहीं है।

आंटी की चीख निकल गई, बोली- बेटा आराम से डाल ! फाड़ डालेगा क्या?

बहुत सालों से चुदी न होने के कारण आंटी की चूत एक दम कोरी चूत की तरह से टाईट हो चुकी थी। मुझे मेरी गलती का एहसास हुआ और मैं फिर धीरे धीरे लंड को आंटी की गर्म चूत में घुसाने लगा। और अगले दो धक्कों में मैंने पूरा लंड आंटी की मस्त चूत में घुसा दिया। फिर शुरू हुआ धक्कों का मुकाबला। आंटी नीचे से अपनी गांड उठा-उठा कर चुद रही थी, मैं भी पूरे जोश से धक्के लगा कर आंटी की चूत का भुरता बना रहा था। मस्ती भरी आहें और सिसकारियाँ कमरे में गूंज रही थी।

दोनों मस्त हो कर चुदाई का मजा ले रहे थे। आंटी आह्हह्ह आह्हह्ह करके मेरा जोश बढ़ा रही थी, हर धक्के के साथ आंटी बोल उठती- और जोर से मेरी जान ! और जोर से लगा धक्का ! फाड़ दे साली को ! इसे भी बहुत सालों बाद लंड नसीब हुआ है। मार बेटा मार ! और जोर से धक्के मार। सारा रस निकल दे इस चूत का। जल्दी जल्दी कर ! मेरा निकलने वाला हैं।

मैं भी पूरे जोश में था। पूरा आधा घंटा आंटी की चूत का बाजा बजाया। फिर मैं झड़ने के कगार पर पहुँच गया। इस बीच आंटी तीन बार चूत का रस उगल चुकी थी यानि झड चुकी थी। फिर मैं भी अपने आप पर काबू नहीं कर सका। मैंने आंटी से पूछा- कहाँ पानी निकालूँ ?

तो आंटी बोली- बेटा, इस चूत ने सालो से लंड का पानी नहीं पिया है तो बेटा इस चूत में ही डाल दे अपना अमृत। बहुत तरसी हूँ इस अमृत के लिए।

फिर मैंने धक्कों की गति दुगनी कर दी और दस बारह धक्कों के बाद पूरा लंड आंटी की चूत में निचोड़ दिया। जैसे ही मेरा वीर्य आंटी की चूत में गिरा, आंटी ने जोर से मुझे भींच लिया अपने बाहों और टांगों में।

करीब पांच से दस मिनट तक आंटी और मैं इसी तरह पड़े रहे फिर जाकर आंटी ने अपनी पकड़ कुछ ढीली की। आंटी सोलह साल की प्यास को पूरी तरह से मिटाना चाहती थी।


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