ठीक दो साल ही पहले मेरी शादी विवेक नाम के युवक से हुई थी। मैं एक बहुत कामुक और बहुत ही चुदक्कड़ लड़की हूँ। शादी से पहले न जाने कितनी बार अपनी बुर चुदवाई थी लेकिन जो सोचा था वो जीवन में नहीं मिल पाया- पति के रूप में ज़बरदस्त मर्द और उसका मोटा लंबा लौड़ा जो रोज़ रात को मुझे ही ठंडी करे !

लेकिन विवेक का ना तो बड़ा था और ना ही मुझे किनारे लगाने लायक ! धोखा हुआ था मेरे साथ ! लेकिन इतना ज़रूर था कि मेरा भेद नहीं खुल पाया क्यूंकि उस से तो मुश्किल से मेरे पहले से चुदी होने का राज नहीं खुला
क्यूंकि अगर मैं सील बंद होती तो वो मेरी सील तोड़ ही नहीं पाता।

शादी के छः महीने बीत गए, सासू माँ अब मुझसे बच्चे की उम्मीद लगाए बैठी थी और फिर एक दिन मेरे पति का ऑस्ट्रेलिया का वीसा लग गया।

सासू माँ ने मुझसे कहा- अब वीसा लग गया है, उससे कहना कि जाने से पहले तुझे पेट से करके जाए !

मेरे ससुर जी फौजी रह चुके थे और अब एक कंपनी में गार्ड थे लेकिन फिर वो नौकरी छोड़ घर आ गए। यह बात ससुर जी ने सुन ली क्यूंकि मैंने उन्हें दरवाज़े के बाहर खड़ा देखा था। मुझे देख वो मुस्कुरा दिए और चले गए। ऊपर
से मैं उन दिनों पहले ही बहुत प्यासी थी।

फिर एक दिन पति देव तो फ्लाईट पकड़ सिडनी पहुँच गए। वो चले गए और वहाँ जाकर मेरे पेपर्स भी तैयार करवाने लगे। उधर अब ससुर के इलावा मेरे जेठ की नियत मुझ पर खराब थी। हालाँकि वो दूसरे घर में रहता था लेकिन पति के जाने के बाद वो आने के बहाने ढूंढता। ससुर जी शायद डरते थे कि कहीं मैं विरोध ना कर दूँ !

एक रात मेरा सब्र का बांध टूट गया। मेरे ससुर और मैं दोनों घर में अकेले थे और मैं कई दिनों से चुदाई चाहती थी। मैं ससुर जी के कमरे में गई, जीरो वाट का दूधिया बल्ब जल रहा था। ससुर जी सीधे लेट कर सोये थे लेकिन उनके लौड़े ने तो पजामे को तम्बू बना रखा था शायद वो नाटक कर रहे थे।

मैं बिस्तर के बिल्कुल पास गई, घुटनों के बल बैठ कर हाथ उनके लौड़े की ओर बढ़ा दिया। लेकिन न जाने क्या हुआ, मैं डर से वहाँ से वापिस चली आई। नींद नहीं आ रही थी, बार-बार ससुर जी का पजामे में खड़ा लौड़ा सामने आ जाता। तभी मैंने अपनी सलवार का नाड़ा खोल कर पैंटी में हाथ डाल कर देखा, कच्छी गीली हो गई थी। मुझे सीधे लेट नींद नहीं आती, एक तकिये को बाँहों में लेकर उलटी लेट सोने की कोशिश करने लगी।

अभी आँख लगी थी कि किसी का हाथ मेरी गांड की गोलाइयों पर फिरने लगा। मैं समझ गई थी लेकिन कुछ न बोली। मेरी सलवार का नाड़ा खींचा गया, गांड नंगी करके कच्छी के ऊपर से सहलाने लगे। मेरा सब्र टूट रहा था। पापा ने गांड को चूमना चालू कर दिया। मैं नाटक कर मदहोश हुई पड़ी थी। वो मेरी बग़ल में लेट गए और पूरी सलवार नीचे तक सरकाने की कोशिश की।

फिर बोले- अब मान भी जाओ बहू ! खुद तो मेरे कमरे में इतने करीब आई और वापिस चली आई ! अब जब हम चल कर खुद आये हैं तो सोने का नाटक ?

मैं पलटी, कॉलर से पकड़ कर ससुर जी को अपने ऊपर गिरा दिया- आप भी तो सोने का नाटक कर रहे थे ! अब तो मुझे कह रहे हो !

वो मेरे गुलाबी होंठों को चूसने लगे। वाह ! कितने प्यार से चूस रहे थे ! मैं उठी और उनकी कमीज़ उतार दी। क्या मर्दानी छाती थी ! मैं वहाँ चूमने लगी, बालों से खेलने लगी। सारी शर्म-सीमा ना जाने कहाँ गायब हो गई थी।

कुछ ही पलों में उन्होंने मेरे बदन से एक एक करके सारे कपड़े उतार फेंके। मुझे अपनी मजबूत फौजी बाँहों में जकड़ लिया, कभी मेरी जवानी का रस पीते तो कभी मेरी जांघों की चूमा-चाटी करते। अब मेरा सब्र जवाब देने लगा और
मैंने उठ कर उनको बिस्तर पर धक्का दिया, उन पर गिरते हुए उनके अण्डर्वीयर को उतार फेंका और उनका फौलादी लौड़ा बाहर निकाल लिया। और कुछ देर पहले जिसको पजामा फाड़ने पर उतरे हुए को देखा था, सोचा था, यह उससे भी ज्यादा मोटा लम्बा था।

मैंने झट से चूसना शुरु किया, वो आहें भर रहे थे, मेरे मम्मे दबाते जा रहे थे। मेरी जवानी के रंग में ससुर जी रंग के डुबकियाँ लगाने लगे। फिर न उनसे रुका गया, न मुझ से ! और मेरी टाँगें आखिर चौड़ी करवा ही ली
उन्होंने ! मैंने नीचे हाथ लेजाकर खुद ठिकाने पर रखवा दिया और मेरा इशारा पाते ही ससुर जी ने झटके से लौड़ा अन्दर कर दिया।

हाय मजा आ गया ! कितनी भीड़ी गली है ! कमबख्त मेरा नाम मिटटी में मिला रहा है ! मेरा अपना बेटा जिससे दरार खुल न सकी !

तो आप फाड़ डालो ससुर जी !

यह ले साली, देख नज़ारा फौजी की चुदाई का ! ले !

वो तेज़ तेज़ धक्के लगने लगे और मुझे स्वर्ग दिखने लगा। बीस पच्चीस मिनट मुझे कभी इधर से, कभी उधर से, ऊपर-नीचे कितने तरीकों से सम्भोग का असली सुख दिया और फिर अपना बीज मेरी चूत में निकाल मुझ से चिपक गए।

पूरी रात ससुर जी के साथ बिताई। सुबह आंख खुली तो नंगी उनकी बाँहों में सो रही थी। सुबह चली तो लगा कि कल रात मानो पहली बार चुदवाया था।

फ़िर आये दिन मौका पाते ही हम बंद कमरे में रास-लीला रचाने लगे। अब जेठ जी को ना जाने कैसे हम पर शक हो गया।

एक रोज़ दोपहर को जब घर में मैं और ससुर जी थे और मैं यह सोचकर कि और कोई नहीं है घर में, चली गई ससर जी के कमरे में !

जब मैं निकली ससुर जी के कमरे से, वो भी जालीदार नाइटी और उसके नीचे कुछ न पहना था जिससे मेरे जवान मम्मे, कड़क हुए चुचूक साफ़ दिख रहे थे और ऊपर से सलवटें पड़ी हुई देख जेठ जी मुस्करा दिए। मुझे क्या मालूम था कि जेठ जी वहीँ मौजूद थे, मुझे देख उनकी आँखों में वासना चमकने लगी। मैं शरमा कर निकल गई।

जेठ जी ने जेठानी के जनेपे के लिए उनके पीहर भेज दिया जिससे उनकी वासना और बढ़ गई। करते भी क्या ! औरत पेट से थी तो लौड़े का क्या हाल होगा !

मांजी सा ने मुझे रोज़ तीनों वक़्त का खाना भिजवाने को कह रखा था। मैं पहले नौकर से कहती थी लेकिन फिर खुद लेकर जाने लगी।

जेठ जी को भनक पड़ गई और फिर उनकी मेरे ऊपर निगाहें टिक चुकी थी। ऊपर से जेठानी के जनेपे के लिए उनके पीहर भेज दिया जिससे उनकी वासना और बढ़ गई। करते भी क्या ! औरत पेट से थी तो लौड़े का क्या हाल होगा ! लेकिन मुझे तो ससुर जी ही नहीं छोड़ते थे लेकिन मेरा झुकाव अब जेठ जी की तरफ भी था, चाहती थी कि उनकी प्यास बुझाऊँ ! आखिर मौका मिल गया !

एक दिन ऐसा जरूरी काम पड़ा कि ससुर जी को सासू माँ के साथ बाहर जाना ही पड़ा और दोपहर को मैं घर में अकेली थी। लेकिन जेठ जी सुबह से घर नहीं थे, शायद उन्हें मालूम नहीं था कि मैं अकेली हूँ, वरना वो मौका कहाँ छोड़ते ! कोशिश ज़रूर करते !

मैंने उनके मोबाइल पर मिस-कॉल दे दी। उसके बाद वो फ़ोन पर फ़ोन करने लगे लेकिन मैंने नहीं उठाया। आधे घंटे के अंदर मेरा अंदाजा और तीर सही जगह लगा और वो घर आ पहुंचे। मैं अपने कमरे में कंप्यूटर पर बैठी सर्फिंग कर रही थी, बारीक सफ़ेद नाइटी अंदर काली ब्रा-पेंटी पहन रखी थी।

कुसुम ! तुमने कॉल की थी ?

मैं पलटी- नहीं तो ! वो गलती से पॉकेट में बटन दब गया होगा !

ठीक है ! कहाँ हैं सब ? अकेली हो आज ?

जी हाँ अकेली हूँ ! बैठो ! अभी चाय लेकर आती हूँ !

नहीं भाभी !

उन्होंने मेरी कलाई पकड़ ली, खींच कर मुझे अपने सीने से लगा लिया और मेरे गुलाबी होंठों का रसपान करने लगे। मेरी और से ज़रा सा विरोध ना देख उनकी हिम्मत बढ़ चुकी थी।

बहुत सुन्दर हो भाभी जान ! बहुत आग है आप में ! बहुत तड़पाया है आपने अपनी जवानी से मुझे ! हर पल गोली मारती रहती हो !

मैं भी तो आपकी वासना आपकी आँखों में पढ़ती रही हूँ, लेकिन पहल नहीं कर पा रही थी !

ओह मेरी जान ! मुझे भी सब मालूम था ! मैं भी थोड़ा सा झिझक रहा था ! मुझे मालूम है तूने अपनी मर्ज़ी से मुझे मिस-कॉल दी थी !*********

और यह कहते ही वो मुझ पर सवार होने लगे। मैंने एक पल में उनके बटन खोल उनकी कमीज़ अलग कर दी और उन्होंने मेरी नाईटी उतार फेंकी और ब्रा के ऊपर से मेरे मम्मे दबाने लगे। मैं अश अश कर रही थी। मैंने उनकी बेल्ट भी खोल दी, अपने हाथों से जींस का बकल खोल नीचे कर अंडरवीयर के ऊपर से ही उनके लौड़े को मसलने लगी। उनकी आग बढ़ने लगी, लौड़ा तन कर डण्डा बन चुका था, कितना बड़ा हथियार था !

मेरी चूत में कुछ-कुछ होने लगा। सिहरन सी उठने लगी, जवानी बेकाबू हो रही थी। उन्होंने मेरी ब्रा उतार मेरे दोनों मम्मों को बारी बारी खूब चूसा। मैं नीचे बैठ गई, उनकी पूरी जींस शरीर से अलग कर उनके लौड़े को आराम से
चूसने लगी।

कितना बड़ा है जेठ जी !

हां रानी ! इसको तेरे जैसी रांड पसंद है ! तेरी जेठानी तो ठंडी औरत है !

वो मेरे चूसने के अंदाज़ से बहुत खुश थे, मुझे बाँहों में उठा कर बिस्तर पर डाल लिया और मेरी टाँगें चौड़ी करवा ली। बीच में बैठ कर पहले प्यार से मेरी पूरी चूत पर हाथ फेरा, फिर मेरे दाने से थोड़ी छेड़छाड़ करने लगे। मैं बेकाबू हो रही थी, जल्दी ही उन्होंने लगाम लगा ली और अपना मोटा लौड़ा मेरी चूत में डालकर मुझे चोदने लगे।

अह अह और तेज़ करो जेठ जी ! जोर जोर से मारो ! अपनी जवान भाभी की जवान जवानी लूट लो !

यह ले यह यह साली कुतिया कब से तेरा आशिक हूँ ! तू है कि मेरे बाप से चुदवाती है !

क्या करूँ ! वो नहीं छोड़ते मुझे ! तेरे बाप में तेरे जितना दम ही है !

यह ले कमीनी ! अब से मुझे भी दिया करेगी ?

हाँ दूंगी ! लो मेरी और मजे से लो !

चल घोड़ी बन ! तेरी फाड़ता हूँ गांड !

घोड़ी बना मेरी गांड मारने लगे !

हाय दुखती है !

तब फिर से चूत में डाल मेरी लेने लगे। पच्चीस मिनट की लम्बी चुदाई के बाद उनका घोड़ा छूट गया और हांफने लगा।

पूरी दोपहर जेठ से चुदवाया और फिर दोनों के साथ में अपनी जवानी लूटने लगी। अगले बार मुझे मासिक-धर्म नहीं हुआ। ससुर जी ने मुझे पेट से कर दिया।

सासू माँ बहुत खुश हैं !

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