यह बात बहुत ज्यादा पुरानी नहीं है। करीब एक महीने पहले मैं अपने एक रिश्तेदार के गांव में गया था जो कि मेरे गांव से करीब ४० किलोमीटर की दूरी पर है। वे मेरे दूर के अंकल लगते थे। मैं किसी काम से वहां गया था लेकिन काम में इतना मशगूल हो गया कि समय का ध्यान ही नहीं रहा। सो मैं अपने अंकल के घर चला गया। वहां पर जब मैं पहुंचा तो देखकर हैरान रह गया। मेरी आंटी इतनी हसीन थीं कि मेरी आंखें खुली की खुली रह गईं। आंटी ने भी इस बात को ताड़ लिया और मुस्कुराकर रह गईं।

मेरे अंकल की उम्र करीब ४० साल है जबकि मेरी आंटी सिर्फ २५ साल की ही हैं। मैं अंकल की शादी में काम के कारण आ नहीं सका था इसलिए आंटी को देख ही नहीं पाया था। उनकी शादी ६ महीने पहले ही हुई थी। मैं आंटी का बायोडाटा बाद में लिखूंगा, पहले यह बता दूं कि उनको चोदने का प्रोग्राम कैसे बनाया।

मेरी आंटी का नाम रम्भा है और अंकल का नाम योगेश।

तो जब मैं घर पहुंचा तो आंटी बोली कि यह कौन है तो अंकल ने बता दिया कि यह हमारा भतीजा है।

तो आंटी ने पूछा कि इसका नाम क्या है तो मैंने खुद ही अपना नाम बताया कि मेरा नाम राजीव है।

तब आंटी चहककर बोलीं- वाह ! यह वही है जिसके बारे में आप हमेशा बाते किया करते हैं।

तब मैंने पूछा- आंटी ! क्या आप मुझे पहले से जानती हैं?

तो उन्होंने बताया- तुम्हारे अंकल तुम्हारे बारे में अक्सर मुझे बताया करते हैं, तुम बैठो मैं तुम्हारे लिए कुछ लाती हूँ।

तब उन्होंने अंकल से कहा- जाओ ! दुकान से नमकीन बिस्कुट इत्यादि ले आओ, खत्म हो गई है !

अंकल बाहर को चले गये।

तब आंटी मेरे पास बैठकर मेरे कंधे पर हाथ रखकर बोलीं- तुम शादी में क्यों नहीं आये थे?

मैंने बता दिया कि कुछ काम था इसलिए नहीं आया था। लेकिन उसने फिर शिकायत की- तो इतने दिनों क्यों नहीं आये थे?

मैंने बताया- आजकल बहुत व्यस्त हूँ और आपसे मिलने नहीं बल्कि काम के सिलसिले में आया हूँ।

तो फिर क्या था- आंटी दूसरी तरफ मुंह फुलाकर बैठ गयीं और कहा कि तुम्हें सिर्फ काम ही रहता है, तुम मुझसे मिलना नहीं चाहते, मुझे प्यार करने की क्या जरूरत है तुम्हें ! तुम इतने हैंडसम हो ! पता नहीं कि कितनी गर्लफ्रेन्ड होगी तुम्हारी, इसीलिए तो मुझसे बात नहीं करते।

जब आंटी गुस्सा हो गईं तो फिर तो मेरी बांछें खिल गईं। मैंने तुरंत ही आंटी की गर्दन में हाथ डाल दिया और कहा- आप गलत समझती हैं, मैं आपको चाहता तो हूँ कि प्यार करूं लेकिन आप बुरा न मान जाएँ इसलिए मजाक कर दिया।

तब आंटी मेरी तरफ घूम कर बोली- सच कह रहे हो?

तो मैंने कहा- आपकी कसम।

तब आंटी ने मेरे गले में बांहें डाल दीं और मेरे चेहरे पर चुम्बनों की झड़ी लगा दी और उनके आंसू निकल आए।

मैंने कहा- ओह, आंटी आप तो रोने लगी।

आंटी रोते-रोते बोली- तुम मुझे इतना प्यार करते हो कि आंखे भर आई।

मैंने रूमाल निकाल कर आंटी के आंसू पोछे और कहा- अगर अब रोओगी तो फिर मैं अपनी गर्लफ्रेन्ड के पास चला जाउंगा।

आंटी ने मेरी तरफ क्रोधित नजरों से देखा तो मुझे लगा कि यह सही में नाराज न हो जाये, मैंने आंटी का हाथ पकड़ा और अपने सिर पर रख कर कहा- आपको मेरी कसम है कि आप मुझसे नाराज नहीं होंगी, मैं मजाक कर रहा था, अगर आप नाराज हुईं तो मैं आत्महत्या कर………..

बस फिर क्या था- आंटी ने अपना हाथ मेरे होंठों पर रख दिया और आंसू भरी आंखों से बोलीं- मेरी कसम से ऐसा न कहो।

मुझे मजाक सूझा और मैंने कह दिया- आंटी मेरे होंठो पर अपना हाथ नहीं बल्कि अपने होंठ रख कर मुझे चुप कर दो !

आंटी ने एक पल मुझे घूर कर देखा, फिर अगले पल ही मेरे होंठों पर अपने होंठ रख दिये और चूमने लगी। मैंने भी देर करना मुनासिब नहीं समझा और आंटी का चेहरा हथेलियों में भर कर होंठों को चूसने लगा। करीब २ मिनट बाद आंटी अलग हुईं और मुझसे कहा- भगवान के लिए अब ऐसी बातें नहीं बोलोगे !

मैंने कहा- आंटी ! भगवान को छोड़ो और कहो कि मेरे लिए ऐसी बातें नहीं बोलोगे तो मैं नहीं बोलूंगा।

तब आंटी खिलखिला कर हंस पड़ी और मेरे गालों को चूम लिया।

मैंने कहा- आंटी आपके होंठ और गाल इतने रस भरे हैं कि मेरा जी चाहता है कि मैं देर तक चूसूं ! क्या आप बुरा तो नहीं मानेंगी।

आंटी ने कहा- मेरे होंठों गालों को ही क्या, जो तुम चूमना, चूसना चाहते तो वो चूसो। लेकिन अभी तुम्हारे अंकल घर में आते ही होंगे इसलिए बाद में चूसना।

मैंने कहा- अंकल को मैं रात को बाहर भेज दूंगा कहीं तब आपको खूब प्यार करूंगा।

आंटी ने कहा- ठीक है ! मैं सोचूंगी कि कैसे तुम्हारे अंकल को बाहर भेजूं !

मैंने कहा- आंटी, आप व्यर्थ ही चिंता करती हैं, मैं खेत पर किसी बहाने से भेज दूंगा।

तब आंटी ने कहा- तुम बैठो ! मैं चाय बनाती हूँ तुम्हारे अंकल आते ही होंगे। और आंटी चाय बनाने चली गईं और मैं बाहर दरवाजे पर आ गया यह देखने कि अंकल आ रहे हैं या नहीं। बढ़िया हुआ कि अंकल नहीं आ रहे थे।

मैंने दरवाजे को बंद किया लेकिन जंजीर नहीं लगाई और अंदर आ गया।

अब मैं अपनी आंटी के जिस्म का बायोडाटा बताता हूँ। मेरी आंटी २५ साल की जवान लड़की हैं औरत इसलिए नहीं कह रहा कि मुझे तो बाद में मालूम हुआ कि आंटी की बुर की सील ही अभी नहीं टूट पाई थी ! नुकीली चूचियां, उनके बूब्स ३६ के हैं कमर २८ चूतड़ ३४ के साइज के हैं।

उनका चेहरा ऐसा लगता है जैसे कि मक्खन में एक चुटकी सिंदूर मिला दिया गया हो ! होंठ ऐसे जैसे कि अभी खून पीकर आई हों ! लम्बी सुराहीदार गर्दन ! भारी गोल चूचियां, पतली कमर बाहर को निकले हुए हाहाकारी चूतड़ ! केले के तने जैसी चिकनी जांघे लम्बी टांगें ! वाह! वाह! उनमें ऐसा सब कुछ था कि किसी का भी ईमान डोल जाए और फिर मेरी तो बल्ले-बल्ले थी, वो आसानी से मेरी गोद में जो आ गिरी थी। जबकि इसके विपरीत मेरे अंकल ४० साल की उम्र पर पहुंच गये थे। अब अंकल का बायोडाटा बताने की जरूरत नहीं है क्योंकि पाठक खुद ही अंदाजा लगा लेंगे कि ४० साल का गांव का आदमी कैसा लगता होगा।

अब आता हूँ कहानी पर।

मैं सीधा रसोईघर में गया और बोला- आंटी ! अभी अंकल आते तो दिख नहीं रहे हैं !

तो आंटी बोली- दुकान दूर है और भीड़ भी लगी रहती है, इसलिए देर लग रही है। क्या तुम्हें कुछ ज्यादा ही भूख लगी है? अगर ज्यादा लगी हो तो बताओ कि क्या खाओगे।

मैंने कहा- आंटी, मैं तो इसलिए कह रहा था कि यदि अंकल देर से आयें तो मैं आपको चूम-चाट तो सकूं।

तब आंटी खिलखिलाकर हंस पडीं और बोली- इसीलिए रसोई में आ गये हो?

तो मैंने कहा- आपको यदि बुरा लगा हो तो मैं चला जाता हूँ।

आंटी बोल पड़ी- तुम जो चाहते हो वो करो, मैं बुरा नहीं मानूंगी और तुम मुझे आंटी नहीं रम्भा कहोगे।

मैंने कहा- ठीक है, मेरी रम्भा रानी ! तुम पीछे घूमकर चाय बनाओ तब तक मैं तुम्हारी गांड को देखता हूँ ! इससे चाय भी बनती रहेगी और मैं तुम्हारी गांड को देखता रहूँगा।

तब रम्भा पीछे को घूमी और मैं उसके चूतड़ों पर साड़ी के ऊपर से हाथ फेरने लगा। मैं जोर-जोर से उसके चूतड़ों को सहला रहा था और रम्भा सिसकारियां भर रही थी। हाथ फेरते हुए मैं उसकी साड़ी को ऊपर को सरका रहा था जिससे कि मुझे उसकी टांगें नजर आ रही थीं। मेरा लण्ड पैंट में खड़ाहोने लगा था जिससे कि मेरी लण्ड वाली जगह फूल गई थी। मेरा जी चाहा कि मैं रम्भा की साड़ी को ऊपर उठा दूं जिससे की उसकी मस्त गांड का नजारा तो देख सकूं।

मैंने साड़ी को ऊपर उठाना जारी रखा। ज्यों-ज्यों साड़ी ऊपर उठ रही थी मुझे उसकी जांघे दिखने लगीं। वाह क्या शानदार नजारा था ! क्या मस्त चिकनी जांघे थी। मैं नीचे बैठ गया और उसको चूमने लगा। चूमते-चूमते मैं रम्भा की गांड को भी देख रहा था। अब मैं सोच रहा था कि चूतड़ों को चाटूं कि अचानक मेरी छठेन्द्रिय ने मुझे खतरे का आभास कराया।

मैं तुरन्त ही उठ गया और बोला- रम्भा मुझे लगता है कि अंकल आ रहे हैं, तुम चाय बनाओ मैं बाहर जाता हूँ। और हां आज रात को ब्रा और पैंटी नहीं पहनना।

मैंने उससे कहा तो उसने प्रत्युत्तर में मुस्कुराकर आंख मार दी। मैं निहाल हो उठा और मैंने उसको पीछे से बांहों में भरकर चूचियां दबा दीं और बाहर को भाग गया। जैसे ही मैंने दरवाजा खोला तो देखा कि अंकल दरवाजा खोलने के लिए हाथ बढ़ा चुके थे।

मैं बोला- अंकल आप आ गये।

हां आ तो गया हूँ लेकिन तुम जा कहां रहे थे।

मैं बोला- आपने बहुत देर कर दी थी तो मैं बाहर आपको देखने जा रहा था कि देर क्यों लग रही है ! अब चलो।

जैसे ही हम अन्दर पहुंचे तो देखा कि रम्भा चाय लेकर रसोई से निकल रही थी।

ओह ! '' आप इतनी देर से आये हैं चाय तो बन गई है और आप अब आ रहे हैं !'' रम्भा ने कहा।

''हां ! वहां दुकान पर भीड़ थी ना ! इसीलिए देर हो गई है !'' अंकल ने कहा।

खैर, कोई बात नहीं ! चाय पियो ! रम्भा ने पैकट ले लिया और रसोईघर से प्लेट में नमकीन और बिस्कुट इत्यादि ले कर बाहर आ गई।

चाय पीने के बाद मैंने कहा- अंकल, मुझे आपका खेत देखना है, क्या बोया है खेत में?

''भुट्‌टा !'' अंकल ने कहा।

बस मेरे दिमाग में एक योजना घुस गई।

अंकल आप खेत की रखवाली खुद करते हैं या फिर किसी और से करवाते हैं?

नहीं, तेरे अंकल खुद ही रखवाली करते हैं ! अंकल के बोलने से पहले ही रम्भा बोल पड़ी।

शाम का खाना खाकर मैं बोला- चलो अंकल मुझे अपना खेत दिखाओ चलकर ! शाम होने वाली है इसलिए जल्दी चलो, फिर वापस भी तो आना है।

हां आना तो है लेकिन यह कोई जरूरी नहीं कि मैं भी वापस आऊं ! अंकल बोले।

क्यों?

रम्भा बोली- यहां पर दूसरों के जानवर खेत चर जाते हैं, इसलिए तेरे अंकल ज्यादातर खेत में ही सोते हैं।

फिर हम खेत में चले गये। जब हम खेत में पहुंचे तो अंकल बोले- तुम खेत घूमो ! मैं टट्‌टी फिर कर आता हूँ।

एक जगह पर मुझे तरीका सूझ गया और मैंने कुछ पौधों को इस अंदाज में तोड़-मरोड़ दिया जैसे कि उसको किसी जानवर ने खा लिया हो। जब अंकल के साथ मैं खेत देख रहा था तो अंकल उस स्थान पर पहुंच कर बोले- आज यहीं पर सोऊंगा ! लगता है कि किसी जानवर ने इसे चर लिया है।

तुम घर चले जाओ ! अंकल ने अपना बिस्तर खेत में ही लगाते हुए बोले।

ठीक है ! कहकर मैं घर वापस आ गया।

घर में जब मैं आया तो देखा कि रम्भा घर के दरवाजे पर मेरे इंतजार में खड़ी थी। मेरे अंदर आते ही उसने दरवाजा बंद कर लिया।

ओह! मेरी जान ! रम्भा रानी ! तू तो बड़ी कयामत ढा रही है ! क्या तुमने ब्रा और पैंटी पहनी है।

नहीं तुमने ही तो कहा था कि न पहनो तो मैंने न पहनी।

हां तो मैं सबसे पहले तुम्हारे चूतड़ों को चूसूंगा ! चलो अन्दर बेडरूम में चलो।

हम बेडरूम में आ गये तो मैंने उसे सिंगारदार के सामने खड़ा कर दिया जिसमें कि एक बड़ा सा शीशा लगा हुआ था। अब मैंने उससे कहा- अब पीछे मुड़ कर अपनी साड़ी को अपने हाथों से ऊपर उठा कर अपने चूतड़ दिखाओ।

वह चहकती हुई पीछे को घूमी और साड़ी को ऊपर उठा कर अपने चूतड़ों को दिखाने लगी कि देखो बढ़िया हैं ना?

हां बहुत बढ़िया हैं ! मैंने कहा और जाकर उसके चूतड़ों को चाटने लगा। २ मिनट बाद मैंने उसके हाथों को हटा दिया जिससे कि उसकी साड़ी नीचे को गिर गई।

अब मैंने उसे आगे से बाहों में भर लिया और उसके होंठ चूसने लगा। वाह ! क्या मदमस्त होंठ थे, उससे भी ज्यादा मदमस्त उसकी अदायें थी ! जितनी जोर से मैं उसके होंठों को चूसता उससे भी ज्यादा जोर से वो मेरे होठों को चूस रही थी। कुछ देर के बाद मैंने कहा- मेरी रम्भा रानी, अब तो मैं तुझे चोदकर वो मजा दूंगा कि तू सारी जिन्दगी याद रखेगी।

इतना कह कर मैं उससे लिपट गया और बिस्तर पर ले जाकर उसके होठों और गालों चूमने चाटने लगा। चाटते-चाटते मैं उसकी चूचियों को ऊपर से ही दबा रहा था। उसके मुंह से मस्त सिसकारियां निकल रही थीं। अब मैंने अपना चेहरा नीचे किया और कहा- रम्भा ! अब इस ब्लाउज को निकालने में मेरी मदद करो।

वो बोली- मदद क्या करना ! मैं ही निकाले दे रही हूँ।

उसने ब्लाउज को ऊपर से पकड़ा और एक ही झटके में खींच डाला। चूंकि ब्लाउज में चुटपिटी लगी हुईं थी इसलिए तुरन्त ही फाटक खुल गया और मेरे आंखे फटी की फटी रह गईं। इतनी बड़ी-बड़ी चूचियां गोल-गोल जैसे कि हिमालय पर्वत हों। वह लेटी थी लेकिन क्या मजाल कि जरा सा भी ढलकाव आया हो।

मैं उसकी चूचियों पर पिल पड़ा और खूब मरोड़-मरोड़ कर चूसा। चूचियां चूसते हुए मैं एक हाथ उसकी चूत पर भी फिरा रहा था। जिससे कि वह और भी गर्म हो गई थी। वह खूब तेजी से चिल्ला रही थी- चूसो और तेजी से चूसो ! आज भुर्ता ही बना दो इन चूचियों का।

कुछ देर बाद मैंने कहा- अब साड़ी और पेटीकोट को निकाल दो !

तो वह तुनककर उठ खड़ी हुई, बिस्तर के ऊपर खड़ी हो कर गुस्से भरी नजरों से मेरी तरफ देखा और कहा- तुम तो यह सब कपड़े पहने हो और मुझसे कह रहे हो कि निकालो। अब जब तुम पहले निकालोगे तभी मैं निकालूंगी।

मैंने उससे कहा- खुद ही मेरे कपड़े निकाल दो।

बस फिर क्या था- वह चहकती हुई आई और मेरे सारे कपड़े निकाल दिए, अंडरवियर भी नहीं छोड़ा। जैसे ही उसकी नजर मेरे लण्ड पर पड़ी तो उसकी आश्चर्ययुक्त व खुशी मिश्रित चीख निकल गई- अरे ! इतना बड़ा और मोटा लण्ड।

क्यों ? क्या हुआ ? अपने लण्ड को बिना हाथों के ही हिलाते हुए मैं बोला।

वह बोली- तुम्हारे अंकल का लण्ड तो ३ इंच लम्बा है और आधा इंच ही मोटा !

खैर कोई बात नहीं ! मैं बोल पड़ा- अब मैं तुम्हें मजा दूंगा, लो छू कर देखो ! उसने किलकारी निकालकर मेरे लण्ड को पकड़ लिया और उससे खेलने लगी।

मैं अचानक पीछे हटा और कहा- अब तुम कपड़े पहने हो तो नहीं खेलने दूंगा।

बस फिर क्या था मेरे कुछ भी करने से पहले ही उसने अपने सारे कपड़े निकाल दिये। चूंकि कमरे में भरपूर प्रकाश था इसलिए उसकी बुर बिना झांटों की साफ चमक रही थी।

लेकिन वह तुरन्त ही आई और मेरे लण्ड से खेलने लगी।

मैंने उससे कहा- यह सब लेट कर करें?

वह तुरन्त मान गई और हम लेट गये। वह मेरे लण्ड से खेलते खेलते ही चूमने लगी और चूमते हुए ही चूसने लगी। मैं अब तक बहुत उत्तेजित हो चुका था सो मैंने उससे कहा- अब हम ६९ की पोजीशन में आ जायें ! मैं तुम्हारी बुर चाटना चाहता हूँ।

अब हम ६९ की पोजीशन में थे। वाह ! क्या बुर थी उसकी बिना झांटो के छोटी सी गुलाबी ! मैं बेतहाशा उसको चूसने लगा। कभी मैं जीभ ऊपर करता तो कभी नीचे कभी गोल-गोल घुमाता तो कभी बुर के अन्दर घुसेड़ देता। मैं उसके दाने को जोर-जोर से चूस रहा था सो मैं और वह कन्ट्रोल नहीं रख पाये और हम दोनों ही एक दूसरे के मुंह में झड़ गये। मैंने उसका और उसने मेरा सारा रस पी लिया।

फिर हम सीधे लेट गये और मैं उसकी जांघों पर अपनी एक टांग रखकर और एक हाथ से उसकी एक चूची दबाकर पूछने लगा- क्या अंकल तुमको नहीं चोदते हैं ?

वह बोली- अब तक उन्होंने मुझे १०-१५ बार ही चोदा है किन्तु उनकी छोटी सी लूली क्या करेगी ! और मैंने अपनी सहेलियों से सुना है कि पहली बार चोदने पर खून भी निकलता है लेकिन मेरे तो नहीं निकला !

मैं समझ गया कि यह अभी कुवांरी ही है ! मैंने उसे बताया कि तुम अभी कुवांरी ही हो ! छोटा सा लण्ड कुछ भी नहीं कर पाया है। अब देखो कि मैं तुमको कैसे चोदता हूँ। तुम अपनी जांघें फैला लो !

मैंने नीचे तकिया लगा दिया जिससे कि उसकी चूत पूरी खुल गई। अब मैं उसके बीच में आ गया और लण्ड को उसके दाने पर रगड़ने लगा। वह चिल्ला पड़ी कि अब सब्र नहीं होता है खोंस दो।

मैंने उससे कहा- तुम मुंह में कपड़ा खोंस लो जिससे कि आवाज नहीं निकलेगी।

तो वह बोली- क्या दर्द होगा?

मैंने कहा- थोड़ा सा होगा ! फिर बहुत मजा आयेगा।

उसने तुरन्त ही कपड़ा खोंस लिया। अब तक उसकी बुर खूब चिकनी हो गई थी। सो मैंने देर करना मुनासिब नहीं समझा और उसकी कमर को पकड़ कर एक जोरदार झटका दिया। इतनी जोरदार कि मेरा पूरा का पूरा लण्ड उसकी बुर में घुस गया। वह जल बिन मछली की तरह तड़प रही थी और पूरा जोर लगा कर मुझे बाहर की तरफ ढकेल रही थी लेकिन मैंने उससे कहा- जोर से बिस्तर को पकड़ लो और मैंने लण्ड बाहर की तरफ खींचा और फिर पुनः अन्दर को खोंस दिया। अगर उसके मुंह में कपड़ा नहीं होता तो फिर आधे गांव में उसकी चीख साफ सुनी जा सकती थी।

लगातार ५ मिनट तक मैं उसकी बुर की चुदाई करता रहा और वह तड़पती रही। ५ मिनट के बाद मैं रूका और लण्ड को उसकी चूत में डालकर उसके ऊपर लेट गया और उसकी चूची दबाते हुए उसके मुंह से कपड़ा निकाला। उसने एक हिचकी ली और रोते हुए बोली- भला ऐसी कहीं चुदाई की जाती है कि मेरी बुर का भुर्ता ही बन जाए।

मैंने कहा- अब दर्द तो खत्म हो गया है अब तो सिर्फ मजा ही आयेगा।

तना कह कर मैं पुनः उठा और उसकी बुर को धीरे-धीरे चोदने लगा। अब वह चिल्ला रही थी कि स्पीड तेज करो और तेज ! उसके मुंह से मदमस्त सिसकारियां निकल रही थी और अपनी उंगली से बुर को रगड़ रही थी।

१५ मिनट तक मैं उसको चोदता रहा। इस दौरान वह दो बार झड़ी।

फिर मैंने कहा- अब तुम मेरे उपर आ जाओ और मुझे चोदो !

जब मैंने लण्ड बाहर निकाला तो उसकी बुर से खून और बुर-रस निकल रहा था तो मैंने उससे कहा- देखो यह तुम्हारी कुवांरी बुर की निशानी है ! और अपना लण्ड उसकी आंखो के सामने कर दिया तो वह शरमा गई। अब वह मेरे उपर थी और जोरदार तरीके से उछल रही थी। कभी मैं उसको रोक कर जोरजोर धक्के लगाने लगता तो कभी वह मुझे रोककर उछलने लगती।

१० मिनट के बाद वह झड़ गई तो धक्के लगाना बंद कर दिया और बोली- अब मैं थक गई हूँ !

लेकिन चूंकि मेरे लण्ड से एक बार माल चूसते समय पहले ही निकल गया था इसलिए मैं झड़ा नहीं था। सो मैने उसे नीचे लिटाया और जोर-जोर से चोदने लगा। ५ मिनट के बाद मुझे लगा कि अब मैं झड़ने वाला हूँ तो उससे कहा- मैं अपना माल कहां पर छोड़ूं?

तो उसने कहा- बुर में ही छोड़ दो ! मुंह में तो एक बार ले ही चुकी हूँ।

मैंने अपनी स्पीड बढ़ा दी और अचानक रम्भा के शरीर को झटके लगने लगे मैं समझ गया कि वो झड़ने वाली है। जब मेरे लण्ड से पिचकारी निकलने लगी तो मैंने अपने लण्ड को जड़ तक अन्दर खोंस देता और बाहर खींचता लेकिन सुपाड़ा अन्दर ही रहने देता। मैं यही क्रिया बार-बार दोहरा रहा था। जब हम दोनों पूरे झड़ गये तो मैंने एक करारा धक्का लगा कर अपना लंड पूरा अंदर पेल दिया और रम्भा के ऊपर लेट गया और कहा- कैसा लगा?

उसने कहा- मेरे राजा आज मुझे इतना मजा आया है कि आज तक कभी भी नहीं आया होगा !

तो मैंने कहा- तो चलो इसी बात पर एक रसभरा चुंबन हो जाय !

रम्भा ने मेरे होंठो को चूम लिया और बोली- अब मैं बहुत थक गई हूँ चुपचाप सो जाओ। अब कल चोदेंगे।

गुड नाइट!

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