मासूम यौवना -1

हम ३ बहनें हैं, मैं सबसे छोटी हूँ, मेरी शादी बचपन में मेरी बहनों के साथ ही हो गई थी जब मैं शादी का मतलब ही नहीं जानती थी। मेरी बड़ी बहन ही बालिग थी, बाकी हम दो बहनों के लिए तो शादी एक खेल ही था।
उस वक्त हम दोनों बहनों की सिर्फ शादी हुई थी जबकि बड़ी बहन का गौना भी साथ ही हुआ था, वो तो ससुराल आने जाने लग गई, हम दोनों एक बार जाकर फिर पढ़ने जाने लगी। हमें तब तक किसी बात का कोई पता नहीं था, जीजाजी जीजी के साथ आते तो हम बहुत खुश होती, हंसी-मजाक करती, मेरी माँ कभी कभी चिढ़ती और कहती- अब तुम बड़ी हो रही हो, कोई बच्ची नहीं हो जो अपने जीजा जी से इतनी मजाक करो !
पर मैं ध्यान नहीं देती थी।
कुछ समय बाद मेरे ससुराल से समाचार आने लग गए कि इसको ससुराल भेजो, इसका गौना करो।
और मैं मासूम नादान सी ससुराल चली गई। उस वक्त मुझे साड़ी पहनना भी नहीं आता था, हम राजस्थान में ओढ़नी और कुर्ती, कांचली, घाघरा पहनते हैं, में भी ये कपड़े पहन कर चली गई जो मेरे दुबले पतले शरीर पर काफी ढीले-ढाले थे।
मुझे सेक्स की कोई जानकारी नहीं थी, हमारा परिवार ऐसा है कि इसमें ऐसी बात ही नहीं करते हैं, न मेरी बड़ी बहन ने कुछ बताया, ना ही मेरी माँ ने !
बाद में मुझे पता चला कि मेरी सास ने जल्दी इसलिए की कि मैं पढ़ रही थी, उसका बेटा कम पढ़ा था, वो सोच रही थी कि इसे जल्दी ससुराल बुला लें, नहीं तो यह इसे छोड़ कर किसी दूसरे पढ़े लिखे के साथ चली जाएगी। जबकि हमारे परिवार के संस्कार ऐसे नहीं थे, मुझे तो कुछ पता भी नहीं था। शादी के कई साल बाद मैंने पति को तब देखा जब वो गौना लेने आया। मुझे देख कर वो मुस्करा रहा था, मैंने भी चोर नजरों से उसे देखा, मोटा सा, काला सा, ठिगना, कुछ पेट बढ़ा हुआ !
मेरे पति थोड़े ठिगने हैं करीब 5’4″ के, मैं भी इतनी ही लम्बी हूँ। मेरे पति चेन्नई में काम करते हैं, 6-7 पढ़े हुए हैं जबकि में ऍम.ए. किए हूँ। वैसे मैं बहुत दुबली-पतली हूँ, मेरा चेहरा और बदन करीना कपूर से मिलता-जुलता है, मेरा बोलने-चलने का अंदाज़ भी करीना जैसा है इसलिए मुझे कोई करीना कहता है तो मुझे ख़ुशी होती है। मैं अपनी सुन्दरता देख इठला उठी। जब मैं घर में उसके सामने से निकलती कुछ घूंघट किये हुए तो वो खींसे निपोर देता ! मुझे ख़ुशी होती कि मैं सुन्दर हूँ। इसका मुझे अभिमान हो गया और मैं उसके साथ गाड़ी में अपनी ससुराल चल दी। गाड़ी में उसके साथ उसके और परिवार वाले भी थे, हम शाम को गाँव में पहुँच गए।
गाँव पहुँचने के बाद मैंने देखा कि मेरी ससुराल वालों का घर कच्चा ही था, एक तरफ कच्चा कमरा, एक तरफ कच्ची रसोई और बरामदा टिन का, बाकी मैदान में !
मेरे पति 5 भाइयों में सबसे छोटे थे जो अपने एक भाई-भाभी और माँ के साथ रहते थे, ससुर जी का पहले ही देहांत हो गया था !
वहाँ जाते ही मेरी सास और बड़ी ननद ने मेरा स्वागत किया, मुझे खाना खिलाया। घर मेहमानों से भरा था, भारी भरकम कपड़े और गहने पहने हुई थी, मैंने पहली बार घूंघट निकाला था, मैं परेशान थी।
मेरी ननद मुझे कमरे में ले गई जिसमें कच्ची जमीन पर ही बिस्तर बिछाये हुए थे, उसने मुझे कहा- कमला, ये भारी साड़ी जेवर आदि उतार कर हल्के कपड़े पहन ले, अब हम सोयेंगे !
मैंने अपने कपड़े उतार कर माँ का दिया हुआ घाघरा-कुर्ती ओढ़नी पहन ली, मेरे स्तन बहुत छोटे थे इसलिए चोली मैं पहनती नहीं थी। गर्मी थी तो चड्डी भी नहीं पहनी और अपनी ननद के साथ सो गई आने वाले खतरे से अनजान !
मैं सोई हुई थी, अचानक आधी रात को असहनीय दर्द से मेरी नींद खुल गई और मैं चिल्ला पड़ी। चिमनी की मंद रोशनी में मैंने देखा कि मेरी ननद गायब है और मेरे पति मेरी छोटी सी चूत में जिसमें मैंने कभी एक उंगली भी नहीं घुसाई थी, अपना मोटा और लम्बा लण्ड डाल रहे थे और सुपारा तो उन्होंने मेरी चूत में फंसा दिया था। घाघरा मेरी कमर पर था, बाकी कपड़े पहने हुए थे और वो गाँव का गंवार जिसने न तो मुझे जगाया न मुझे सेक्स के लिए शारीरिक और मानसिक रूप से तैयार किया, नींद में मेरा घाघरा उठाया, थूक लगाया और लण्ड डालने के लिए जबरदस्त धक्का लगा दिया।
मेरी आँखों से आँसू आ रहे थे और मैं जिबह होते बकरे की तरह चिल्ला उठी !
मेरी चीख उस कमरे से बाहर घर में गूंज गई।
बाहर से मेरी सास की गरजती आवाज आई, वो मेरे पति को डांट रही थी कि छोटी है, इसे परेशान मत कर, मान जा !
मेरे पति मेरी चीख के साथ ही कूद कर एक तरफ हो गए तब मुझे उनका मोटे केले जितना लण्ड दिखा। मैंने कभी बड़े आदमी लण्ड नहीं देखा था, छोटे बच्चों की नुनिया ही देखी थी इसलिए मुझे वो डरावना लगा।
उन्होंने अन्दर से माँ को कहा- अब कुछ नहीं करूँगा ! तू सो जा !
फिर उन्होंने मेरे आंसू पोंछे !
मेरी टाँगें सुन्न हो रही थी, मैं घबरा रही थी। थोड़ी देर वो चुपचाप लेटे, फिर मेरे पास सरक गए, उन्होंने कहा- मैंने गाँव की बहुत लड़कियों के साथ सेक्स किया है, वो तो नहीं चिल्लाती थी?
उन्हें क्या पता कि एक चालू लड़की में और अनजान मासूम अक्षतयौवना लड़की में क्या अंतर होता है !
थोड़ी देर में उन्होंने फिर मेरा घाघरा उठाना शुरू किया, मैंने अपने दुबले पतले हाथों से रोकना चाहा मगर उन्होंने अपने मोटे हाथ से मेरी दोनों कलाइयाँ पकड़ कर सर के ऊपर कर दी, अपनी भारी टांगों से मेरी टांगें चौड़ी कर दी, फिर से ढेर सारा थूक अपने लिंग के सुपारे पर लगाया, कुछ मेरी चूत पर !
मैं कसमसा रही थी, उन्हें धक्का देने की कोशिश कर रही थी पर मेरी दुबली पतली काया उनके भैंसे जैसे शरीर के नीचे दबी थी। मैंने चिल्ला कर अपनी सास को आवाज देनी चाही तो उसी वक्त उन्होंने मेरे हाथ छोड़ कर मेरा मुँह अपनी हथेली से दबा दिया।
मैं गूं गूं ही कर सकी। मेरे हाथ काफी देर ऊपर रखने से दुःख रहे थे। मैंने हाथों से उन्हें धकेलने की नाकाम कोशिश की। उनके बोझ से मैं दब रही थी। मेरा वजन उस वक्त 38-40 किलो था और वे 65-70 किलो के !
अब उन्होंने आराम से टटोल कर मेरी चूत का छेद खोजा जिसे उन्होंने कुछ चौड़ा कर दिया था, अपने गीले लिंग का सुपारा मेरी छोटी सी चूत के छेद पर टिकाया और हाथ के सहारे से अन्दर ठेलने लगे। 2-
3 बार वो नीचे फिसल गया, फिर थोड़ा सा मेरी चूत में अटक गया।
मुझे बहुत दर्द हो रहा था जैसे को लोहे की छड़ डाली जा रही हो, जिस छेद को मैंने आज तक अपनी अंगुली नहीं चुभाई थी, उसमें वो भारी भरकम लण्ड डाल रहा था।
मेरे आँसुओं से उसे कोई फर्क नहीं पड़ रहा था, वो पूरी बेदर्दी दिखा रहा था और मुस्कुरा था कि उसे सील बंद माल मिला जिसकी सील वो तोड़ रहा था !
मेरी दोनों टांगों को वो अपने पैरों के अंगूठों से दबाये हुए था, मेरे ऊपर वो था, उसके लिंग का सुपारा मेरी चूत में फंसा हुआ था। अब उसने एक हाथ को तो मेरे मुंह पर रहने दिया दूसरे हाथ से मेरे कंधे पकड़े और जोर का धक्का लगाया, लण्ड दो इंच और अन्दर सरक गया, मेरी सांस रुकने लगी, मेरी आँखें फ़ैल गई।
फिर उसने लण्ड थोड़ा बाहर खींचा, मैं भी लण्ड के साथ उठ गई। उसने जोर से कंधे को दबाया और जोर से ठाप मारी, मैं दर्द के समुन्दर में डूबती चली गई। आधे से ज्यादा लण्ड मेरी संकरी चूत में फंसा हुआ था, मेरी चूत से खून आ रहा था पर उन्हें दया नहीं आई,
वो और मैं पसीने-पसीने थे, मुँह से हाथ उन्होंने उठाया नहीं था और फिर उन्होंने आखिरी धक्का मारा और उनका पूरा लण्ड मेरी चूत में घुस चुका था, उनका सुपारा मेरी बच्चेदानी पर ठोकर मार रहा था।
मैं बेहोश हो गई पर दर्द की वजह से वापिस होश आ गया। मैं रो रही थी, सिसक रही थी, मेरा चेहरा आँसुओं से तर था पर दनादन धक्के लग रहे थे, मेरे चेहरे से हाथ हटा लिया गया था, मेरे कंधे तो कभी कमर पकड़ कर वे बुरी तरह से मुझे चोद रहे थे।
15-20 मिनट तक उन्होंने धक्के लगाये, मेरी चूत चरमरा उठी, हड्डियाँ कड़कड़ा उठी, मुझे बिल्कुल आनन्द नहीं आया था और वे मेरी चूत में ढेर सारा वीर्य डालते हुए ढेर हो गए और भैंसे की तरह हांफने लगे।
मैं रो रही थी, सिसकियाँ भर रही थी, मेरी चूत से खून और वीर्य मेरी जांघों से नीचे बह रहा था।
थोड़ी देर में सुबह हो गई, मेरे पति बाहर चले गए, मेरी ननद आई, उसने मेरी टांगें पौंछी, मेरे कपड़े सही किये, मुझे खड़ा किया। मैं लड़खड़ा रही थी, वो हाथों का सहारा देकर मुझे पेशाब कराने ले गई।
मुझे तेज जलन हुई, मैंने रोते-रोते कहा- मुझे मेरे गाँव जाना है !
मेरी सास ने बहुत मनाया पर मैं रोती रही, चाय नाश्ता भी नहीं किया। आखिर उन्होंने एस.टी.डी. से मेरे घर फ़ोन किया। एक-डेढ़ घंटे बाद मुझे मेरे भाई और छोटे वाले जीजाजी लेने आ गए और मैं अपनी सूजी हुई चूत लेकर अपने मायके रवाना हो गई वापिस कभी न आने की सोच लेकर !
मैंने दसवीं की परीक्षा दी और गर्मियों की छुट्टियों में फिर ससुराल जाना पड़ा। इस बार मेरे पति स्वाभाव कुछ बदला हुआ था, वो इतने बेदर्दी से पेश नहीं आये, शायद उन्हें यह पता चल गया कि यह मेरी ही पत्नी रहेगी।
मैं इस बार 4-5 दिन ससुराल में रुकी थी पर वे जब भी चोदते, मेरी हालत ख़राब हो जाती। पहली चुदाई में ही चूत में सूजन आ गई, बहुत ही ज्यादा दर्द होता, मुझे बिल्कुल आनन्द नहीं आता।
वो रात में 7-8 बार मुझे चोदते पर उनकी चुदाई का समय 5-7 मिनट रहता। रात भर सोने नहीं देते, वो मुझे कहते- मैंने बहुत सारी लड़कियों से सेक्स किया है, उन्हें मज़ा आता है, तुम्हें क्यों नहीं आता?
मैं मन ही मन में डर गई कि कहीं मुझे कोई बीमारी तो नहीं है? कहीं मैं पूर्ण रूप से औरत हूँ भी या नहीं?
अब मैं किससे पूछती? मेरी सारी सहेलियाँ तो कुंवारी थी।
फिर मैं वापिस पीहर आ गई, पढ़ने लगी। मेरा काम यही था, गर्मी की छुट्टियों में ससुराल जाकर चुदना और फिर वापिस आकर पढ़ना। मेरे पति भी चेन्नई फेक्टरी में काम पर चले जाते, छुट्टियों में आ जाते।
अब मैं कॉलेज में प्राइवेट पढ़ने लग गई, तब मुझे पता चला कि मुझे आनन्द क्यूँ नहीं आता है। मेरे पति मुझे सेक्स के लिए तैयार करते नहीं थे, सीधे ही चोदने लग जाते थे और मुझे कुछ आनन्द आने लगता तब तक वो ढेर हो जाते। रात में सेक्स 5-7 बार करते, पर वही बात रहती।
फिर मैंने उनको समझाया- कुछ मेरा भी ख्याल करो, मेरे स्तन दबाओ, कुछ हाथ फिराओ !
अब तक मैंने कभी उनके लण्ड को कभी हाथ भी नहीं लगाया था, अब मैंने भी उनके लण्ड को हाथ में पकड़ा तो वो फुफकार उठा। उन्होंने मेरे स्तन दबाये पेट और जांघों पर चुम्बन दिए, चूत के तो नजदीक भी नहीं गए।
मैंने भी मेरी जिंदगी में कभी लण्ड के मुँह नहीं लगाया था, मुझे सोच के ही उबकाई आती थी, अबकी बार उन्होंने चोदने का आसन बदला, अब तक तो वो सीधे-सीधे ही चोदते थे, इस बार उन्होंने मेरी टांगें अपने कंधे पर रखी और लण्ड घुसा दिया और हचक-हचक कर चोदने लगे।
मेरी टांगें मेरे सर के ऊपर थी, मैं बिल्कुल दोहरी हो गई थी पर चमत्कार हो गया, मुझे आनन्द आ रहा था, उनका सुपारा सीधे मेरी बच्चेदानी पर ठोकर लगा रहा था, मुझे लग रही थी पर आनन्द बहुत आया।
इस बार जब उन्होंने अपने माल को मेरी चूत में भरा तो मैं संतुष्ट थी। फिर मैंने अपनी टांगें ऊपर करके ही चुदाया, मुझे मेरे आनन्द का पता चल चुका था। फिर मेरे गर्भ ठहर गया, सितम्बर, 2000 में मेरे बेटा हो गया।
बेटा होने के बाद कुछ विशेष नहीं हुआ ! मैं प्राइवेट पढ़ती रही, मेरे पति साल में एक बार आते तब मैं ससुराल चली जाती और मेरे पति महीने डेढ़ महीने तक रहते, मैं उनके साथ रहती और जब वे वापिस चेन्नई जाते तो मैं अपने पीहर आ जाती। इसका कारण था कई लोंगो की मेरे ऊपर पड़ती गन्दी नज़र !
मेरे ससुराल में खेती थी, जब फसल आती तो वे मुझे मेरा हिस्सा देने के लिए बुलाते थे। लेकिन ज्यादातर मैं शाम को मेरे पीहर आ जाती थी।
एक बार मुझे रात को रुकना पड़ा, मैं मेरे घर पर अकेली थी, मेरे जेठों के घर आस पास ही थे, मेरी जिठानी ने कहा- तू अकेली कैसे सोएगी? डर जाएगी तू ! मेरे बेटे को अपने घर ले जा !
मेरे जेठ का बेटा करीब 18-19 साल का था, मैं 27 की थी, मैंने सोचा बच्चा है, इसको साथ ले जाती हूँ 
खाना खाकर हम लेट गए, बिस्तर नीचे ही पास-पास लगाए हुए थे, थोड़ी देर बातें करने के बाद मुझे नींद आ गई !
आधी रात को अचानक मेरी नींद खुल गई, मेरे जेठ का बेटा मेरे पास सरक आया था और एक हाथ से मेरा एक वक्ष भींच रहा था और दूसरे वक्ष को अपने मुँह में ले रहा था, हालाँकि ब्लाउज मैंने पहना हुआ था।
मेरे गुस्से का पार नहीं रहा, मैं एक झटके में खड़ी हो गई, लाइट जलाई और उसे झंजोड़ कर उठा दिया !
मेरे गुस्से की वजह से मुंह से झाग निकल रहे थे, वो आँखें मलता हुआ पूछने लगा- क्या हुआ काकी?
मुझे और गुस्सा आया मैंने कहा- अभी तू क्या कर रहा था?
पठ्ठा बिल्कुल मुकर गया और कहा- मैं तो कुछ नहीं कर रहा था।
मैंने उसको कहा- अपने घर जा !
वो बोला- इतनी रात को?
मैंने कहा- हाँ !
उसका घर सामने ही था, वो तमक कर चला गया और मैं दरवाजा बंद करके सो गई।
सुबह मैंने अपनी जेठानी उसकी माँ को कहा तो वो हंस कर बात को टालने लगी, कहा- इसकी आदत है ! मेरे साथ सोता है तो भी नींद में मेरे स्तन पीता है।
मैंने कहा- अपने पिलाओ ! आइन्दा मेरे घर सुलाने की जरुरत नहीं है !
मुझे उसके कुटिल इरादों की कुछ जानकारी मिल गई थी। उसकी माँ चालू थी, गाँव वालों ने उसे मुझे पटाने के लिए लालच दिया था इसलिए वो अपने बेटे के जरिए मेरी टोह ले रही थी। उसे पता था उसके देवर को गए दस महीने हो गए थे, शायद यह पिंघल जाये पर मैं बहुत मजबूत थी अपनी इज्जत के मामले में !
इससे पहले कईयों ने मुझ पर डोरे डाले थे, मेरे घर के पास मंदिर था, उसमें आने का बहाना लेकर मुझे ताकते रहते थे। उनमें एक गाँव के धन्ना सेठ का लड़का भी था जिसने कहीं से मेरे मोबाइल नंबर प्राप्त कर लिए और मुझे बार बार फोन करता। पहले मिस कॉल करता, फिर फोन लगा कर बोलता नहीं ! मैं इधर से गालियाँ निकलती रहती।
फिर एक दिन हिम्मत कर उसने अपना परिचय दे दिया और कहा- मैं तुमको बहुत चाहता हूँ इसलिए बार बार मंदिर आता हूँ।
मैंने कहा- तुम्हारे बीवी, बच्चे हैं, शर्म नहीं आती !
फिर भी नहीं माना तो मैंने उसको कहा- शाम को मंदिर में आरती के समय लाऊडस्पीकर पर यह बात कह दो तो सोचूँगी।
तो उस समय तो हाँ कर दी फिर शाम को उसकी फट गई। फिर उसने कहा- मुझे आपकी आवाज बहुत पसंद है, आप सिर्फ फोन पर बात कर लिया करें। मैं कुछ गलत नहीं बोलूँगा। मैंने कहा- ठीक है ! जिस दिन गलत बोला, बातचीत कट ! और मेरा मूड होगा या समय होगा तो बात करुँगी।
यह सुनते ही वो मुझे धन्यवाद देने लगा और रोने लगा और कहने लगा- चलो मेरे लिए इतना ही बहुत है ! कम से कम आपकी आवाज तो सुनने को मिलेगी !
मैं बोर होने लगी और फोन काट दिया। उसके बाद वो दो चार दिनों के बाद फोन करता, मेरा मूड होता तो बात करती वर्ना नहीं ! वो भी कोई गलत बात नहीं करता, मेरी तारीफ करता। इससे मुझे कोई परेशानी नहीं थी।
मेरा पति चेन्नई से नौकरी छोड़ कर आ गया था। मेरा बी.ए. हो चुका था, मैंने गाँव में स्कूल ज्वाइन कर लिया, टीचर बन गई वहाँ भी और टीचर मुझ पर लाईन मारते, पर मैंने किसी को घास नहीं डाली।
फिर मेरे पति को वापिस चेन्नई बुला लिया तो चले गए तो मैंने भी स्कूल छोड़ दिया और पीहर आ गई !
फिर मेरे पति वापिस चेन्नई चले गए तो मैंने भी स्कूल छोड़ दी और पीहर आ गई !
जब भी मेरे बड़े जीजाजी अजमेर आते तो मुझसे हंसी मजाक करते थे, मैं मासूम थी, सोचती थी कि मैं छोटी हूँ इसलिए मेरा लाड करते हैं। वे कभी यहाँ-वहाँ हाथ भी रख देते थे तो मैं ध्यान नहीं देती थी। कभी वो मुझे अपनी बाँहों में उठा कर कर मुझे कहते थे- अब तुम्हारा वजन बढ़ गया है !
मेरे जीजाजी करीब 46-47 साल के हैं 5’10” उनकी लम्बाई है, अच्छी बॉडी है, बाल उनके कुछ उड़ गए हैं फिर भी अच्छे लगते हैं। पर मैंने कभी उनको उस नजर से नहीं देखा था मैंने उनको सिर्फ दोस्त और बड़ा बुजुर्ग ही समझा था।
इस बीच में कई बार मैं अपनी दीदी के गाँव गई। वहाँ जीजा जी मुझसे मजाक करते रहते, दीदी बड़ा ध्यान रखती, मुझे कुछ गलत लगता था नहीं।
फिर एक बार जीजा जी मेरे पीहर में आये, दीदी नहीं आई थी।
वे रात को कमरे में लेटे थे, टीवी देख रहे थे। मेरे पापा मम्मी दूसरे कमरे में सोने चले गए। मेरी मम्मी ने आवाज दी- आ जा ! सो जा !
मेरा मनपसंद कार्यक्रम आ रहा था तो मैंने कहा- आप सो जाओ, मैं बाद में आती हूँ।
जीजा जी चारपाई पर सो रहे थे, उसी चारपाई पर बैठ कर मैं टीवी देख रही थी। थोड़ी देर में जीजाजी बोले- बैठे-बैठे थक जाओगी, ले कर देख लो।
मैंने कहा- नहीं !
उन्होंने दोबारा कहा तो मैंने कहा- मुझे देखने दोगे या नहीं? नहीं तो मैं चली जाऊँगी। थोड़ी देर तो वो लेटे रहे, फ़िर वे मेरे कंधे पकड़ कर मुझे अपने साथ लिटाने की कोशिश करने लगे।
मैंने उनके हाथ झटके और खड़ी हो गई। वो डर गए। मैंने टीवी बंद किया और माँ के पास जाकर सो गई।
सुबह चाय देने गई तो वो नज़रें चुरा रहे थे। मैंने भी मजाक समझा और इस बात को भूल गई। फिर जिंदगी पहले जैसी हो गई। फिर मैं वापिस गाँव गई, मेरे पति आये हुए थे।
अब स्कूल में तो जगह खाली नहीं थी पर मैं एम ए कर रही थी और गाँव में मेरे जितना पढ़ा-लिखा कोई और नहीं था, सरपंच जी ने मुझे आँगन बाड़ी में लगा दिया, साथ ही अस्पताल में आशा सहयोगिनी का काम भी दे दिया।
फिर एक बार तहसील मुख्यालय पर हमारे प्रशिक्षण में एक अधिकारी आये, उन्होंने मुझे शाम को मंदिर में देखा था, और मुझ पर फ़िदा हो गए।
मैंने उनको नहीं देखा !
फिर उनका एक दिन फोन आया, मैंने पूछा- कौन हो तुम?
उन्होंने कहा- मैं उपखंड अधिकारी हूँ, आपके प्रशिक्षण में आया था !
मैंने कहा- मेरा नंबर कहाँ से मिला?
उन्होंने कहा- रजिस्टर में नाम और नंबर दोनों मिल गए !
मैंने पूछा- काम बोलो !
उन्होंने कहा- ऐसे ही याद आ गई !
मैंने सोचा कैसा बेवकूक है !
खैर फिर कभी कभी उनका फोन आता रहता ! फिर मेरा बी.एड. में नंबर आ गया और मैंने वो नौकरी भी छोड़ दी। फिर उनका तबादला भी हो गया, कभी कभी फोन आता लेकिन कभी गलत बात उन्होंने नहीं की।

एक बार बी.एड. करते मैं कॉलेज की तरफ से घूमने अभ्यारण गई तब उनका फोन आया। मैंने कहा- भरतपुर घूमने आए हैं।

तो वो बड़े खुश हुए, उन्होंने कहा- मैं अभी भरतपुर में ही एस डी एम लगा हुआ हूँ, मैं अभी तुमसे मिलने आ सकता हूँ क्या?

मैंने मना कर दिया, मेरे साथ काफी लड़कियाँ और टीचर थी, मैं किसी को बातें बनाने का अवसर नहीं देना चाहती थी और वो मन मसोस कर रह गए !

फिर काफ़ी समय बाद उनका फोन आया और उन्होंने कहा- आप जयपुर आ जाओ, मैं यहाँ उपनिदेशक लगा हुआ हूँ, यहाँ एन जी ओ की तरफ से सविंदा पर लगा देता हूँ, दस हज़ार रुपए महीना है।

मैंने मना कर दिया। वे बार बार कहते कि एक बार आकर देख लो, तुम्हें कुछ नहीं करना है, कभी कभी ऑफिस में आना है।

मैंने कहा- सोचूँगी !

फिर बार बार कहने पर मैंने अपनी डिग्रियों की नकल डाक से भेज दी।

फिर उनका फोन आया- आज कलेक्टर के पास इंटरव्यू है !

मैं नहीं गई।

उन्होंने कहा- मैंने तुम्हारी जगह एक टीचर को भेज दिया है, तुम्हारा नाम फ़ाइनल हो गया है, किसी को लेकर आ जाओ।

मैं मेरे पति को लेकर जयपुर गई उनके ऑफिस में ! वो बहुत खुश हुए, हमारे रहने का इंतजाम एक होटल में किया, शाम का खाना हमारे साथ खाया।

मेरे पति ने कहा- तुम यह नौकरी कर लो !

दो दिन बाद हम वापिस आ गए। साहब ने कहा था कि अपने बिस्तर वगैरह ले आना, तब तक मैं तुम्हारे लिए किराये का कमरे का इंतजाम कर लूँगा।

10-12 दिनों के बाद मेरे पति चेन्नई चले गए और मैं अपने पापा के साथ जयपुर आ गई। साहब से मिलकर में पापा ने भी नौकरी करने की सहमति दे दी।

मैं मेरे किराये के कमरे में रही, एक रिटायर आदमी के घर के अन्दर था कमरा जिसमें वो, उसके दो बेटे-बहुएँ, पोते-पोतियों के साथ रहता था। मकान में 5 कमरे थे जिसमें एक मुझे दे दिया गया। बुजुर्ग व्यक्ति बिल्कुल मेरे पापा की तरह मेरा ध्यान रखते थे।

मैं वहाँ नौकरी करने लगी। कभी-कभी ऑफिस जाना और कमरे पर आराम करना, गाँव जाना तो दस दस दिन वापिस ना आना !

साहब ने कह दिया कि तनख्वाह बनने में समय लगेगा, पैसे चाहो तो उस एन जी ओ से ले लेना, मेरे दिए हुए हैं।

मैंने 2-3 बार उससे 3-3 हजार रूपये लिए। साहब सिर्फ फोन से ही बात करते, मीटिंग में कभी सामने आते तो मेरी तरफ देखते ही नहीं। फिर मेरा डर दूर हो गया कि साहब कुछ गड़बड़ करेंगे। वो बहुत डरपोक आदमी थे, वो शायद सोचते कि मैं पहल करुँगी और मेरे बारे में तो आप जानते ही हैं !

फिर मैंने कई बार जीजा जी से बात की, उन्हें उलाहना दिया कि मैं यहाँ नौकरी कर रही हूँ और आप आकर एक बार भी मिले ही नहीं।

तो जीजा आजकल, आजकल आने का कहते रहे, टालते रहे।

मैंने कहा- घूमने ही आ जाओ दीदी को लेकर !

दीदी को कहा तो दीदी ने कहा- बच्चे स्कूल जाते हैं, मैं तो नहीं आ सकती, इनको भेज रही हूँ !

एक दिन जीजा ने कहा- मैं आ रहा हूँ !

मैंने उस होटल वाले को कमरा खाली रखने का कह दिया जहाँ मैं और मेरे पति साहब के कहने पर रुके थे
क्यूंकि मेरा कमरा छोटा था। वो होटल वाला साहब का खास था, उसने हमसे किराया भी नहीं लिया था।
और अब भी उसने यही कहा- आपके जीजा जी से भी कोई किराया नहीं लूँगा ! उनके लिए ए.सी. रूम खाली रख दूँगा।

उसके होटल 2-3 ए.सी. रूम थे।

मैंने कहा- ठीक है !

जीजा जी आए मेरे कमरे पर, दोपहर हो रही थी, खाना मैंने बना रखा था, खाना खाकर हए एक ही बिस्तर पर
एक दूसरे की तरफ़ पैर करके लेट गए।

शाम हुई तो हम घूमने के लिए निकले।

मैंने कहा- साहब के पहचान वाले के होटल चलते हैं, घूमने के लिए बाइक ले लेते हैं।

उसको साहब का कहा हुआ था, उसके लिए तो मैं ही साहब थी, मेरे रिश्तेदार आएँ तो भी उसको सेवा करनी ही थी होटल में ठहराने से लेकर खाना खिलाने की भी !

हम होटल गए तो वो कही बाहर गया हुआ था ! मैंने सोचा अब क्या करें?

मैंने उसको फोन कर कहा- मुझे आपकी बाइक चाहिए !

उसने बताया कि वो शहर से दूर है, एक घंटे में आ जायेगा, हमें वहीं रुक कर नौकर से कह कर चाय नाश्ता करने को कहा।

मुझे इतना रुकना नहीं था, मैं जीजाजी को लेकर चलने लगी ही थी, तभी उस होटल वाले का जीजा अपनी बाइक लेकर आया। वो भी मुझे जानता था, उसने पूछा- क्या हुआ मैडम जी?

वहाँ सब मुझे ऐसे ही बुलाते हैं, मैंने उसे बाइक का कहा तो उसने कहा- आप मेरी ले जाओ !
मैंने जीजाजी से पूछा- यह वाली आपको चलानी आती है या नहीं? कहीं मुझे गिरा मत देना !

तो जीजाजी ने कहा- और किसी को तो नहीं गिराया पर तुम्हें जरूर गिराऊँगा !

मैं डरते डरते पीछे बैठी, जीजाजी ने गाड़ी चलाई कि आगे बकरियाँ आ गई। जीजाजी ने ब्रेक लगा दिए, बकरियों के जाने के बाद फिर गाड़ी चलाई तो मैं संतुष्ट हो गई कि जीजाजी अच्छे ड्राइवर हैं !

अब वो शहर में इधर-उधर गाड़ी घुमा रहे थे, कई बार उन्होंने ब्रेक लगाये और मैं उनसे टकराई, मेरी चूचियाँ उनकी कमर से टकराई, उन्होंने हंस कर कहा- ब्रेक लगाने में मुझे चलाने से ज्यादा आनन्द आ रहा है !
मुझे हंसी आ गई।

थोड़ी देर घूमने के बाद हम वापिस होटल गए, उसे बाइक दी और पैदल ही घूमने निकल गए।

मैंने जीजाजी को कहा- अब खाना खाने होटल चलें?

उन्होंने कहा- नहीं, कमरे पर चलते हैं। आज तो तुम बना कर खाना खिलाओ !

मैंने कहा- ठीक है !

हम वापिस कमरे पर आ गए, मेरा पैदल चलने से पेट थोड़ा दुःख रहा था ! मैंने खाना बनाया, थोड़ी गर्मी थी, हम खाना खा रहे थे कि मेरी माँ का फोन आ गया।

उसे पता था जीजाजी वहाँ आये हुए हैं।

उन्होंने जीजाजी को पूछा- आप क्या कर रहे हो?

तो उन्होंने कहा- कमरे पर खाना खा रहा हूँ, अब होटल जाऊँगा।

फिर माँ ने कहा- ठीक है !

पर जीजा जी ने मुझसे कहा- मैं होटल नहीं जाऊँगा !

मैंने कहा- कोई बात नहीं ! यहीं सो जाना !

मैं कई बार उनके साथ सोई थी, हालाँकि पहले हर बार हमारे साथ जीजी या और कोई था पर आज हम अकेले थे पर मुझे कोई डर नहीं था।

हम खाना खाने के बाद छत पर चले गए। कमरे में मच्छर हो गए थे इसलिए पंखा चला दिया और लाईट बंद कर दी।

हम छत पर आ गए तो मैंने उन्हें कहा- यहाँ छत पर सो जाते हैं।

उन्होंने कहा- नहीं, यहाँ ज्यादा मच्छर काटेंगे।

मैंने कहा- ठीक है, कमरे में ही सोयेंगे।

फिर मेरे पेट में दर्द उठा तो जीजा जी ने पूछा- क्या हुआ?

मैंने कहा- पता नहीं क्यों आज पेट दुःख रहा है।

जीजाजी ने पूछा- कही पीरियड तो नहीं आने वाले हैं?

मैं शरमा गई, मैंने कहा- नहीं !

उन्होंने कहा- दर्द की गोली ले ली।

वो मुझे एक दर्द की गोली देने लगे, मैंने ना कर दिया, वो झल्ला कर बोले- नींद की गोली नहीं है, दर्द की है।
फिर मैंने गोली ले ली !

फिर हम लेट गए, दोपहर की तरह आड़े और दूर दूर ! कमरे का दरवाज़ा खुला था।

हम बातें करने लगे। जीजा जी ने लुंगी लगा रखी थी, मैंने मैक्सी पहन रखी थी। मैं लेटी लेटी बातें कर रही थी और जीजा जी हाँ हूँ में जबाब दे रहे थे।

मेरी बात करते हाथ हिलाने की आदत है, मेरे हाथ कई बार उनके हाथ के लगे, उन्होंने अपने हाथ पीछे कर लिए और कहा- अब सो जाओ, नींद आ रही है।

रात के ग्यारह बज गए थे, जीजाजी को नींद आ गई थी, मैं भी सोने की कोशिश करने लगी और मुझे भी नींद आ गई !

रात के दो ढाई बजे होंगे कि अचानक मेरी नींद खुली, मुझे लगा कि मेरे जीजा जी मेरी चूत पर अंगुली फेर रहे हैं। मेरी मैक्सी और पेटीकोट ऊपर जांघों पर था, मैंने कच्छी पहनी हुई थी।

मेरा तो दिमाग भन्ना गया, मैं सोच नहीं पा रही थी कि मैं क्या करूँ !

मेरे मन में भय, गुस्सा, शर्म आदि सारे विचार आ रहे थे। मैंने अपनी चूत पर से उनका हाथ झटक दिया और थोड़ी दूर हो गई…पर आगे दीवार आ गई, वो भी मेरे पीछे सरक गए और मुझे बांहों में पकड़ लिया।

वो धीमे धीमे कह रहे थे- मुझे नींद नहीं आ रही है प्लीज !

और मेरे चेहरे पर चुम्बनों की बौछार कर दी। मैं धीमी धीमी आवाज में रो रही थी, उन्हें छोड़ने का कह रही थी, पर वो नहीं मान रहे थे।

मैंने पलटी मार कर उधर मुँह कर लिया, उनकी बांहे मेरे शरीर पर ढीली थी पर उन्होंने छोड़ा नहीं था मुझे। उन्होंने अपनी एक टांग मेरे टांगों पर रख दी, मेरे कांख के नीचे से हाथ निकाल कर मेरे स्तन दबाने लगे, कभी नीचे वाला और कभी ऊपर वाला।

जीजाजी मेरी गर्दन पर भी चुम्बन कर रहे थे और फुसफुसा रहे थे- मुझे कुछ नहीं करना है, सिर्फ तुम्हें आनन्द देना है !

मैं मना कर रही थी- मुझे छोड़ दो !

पर वो कुछ भी नहीं सुन रहे थे, जोर से मैं बोल नहीं सकती थी कि कहीं मकान मालिक सुन ना लें, मेरी बदनामी हो जाती कि पहले तो जयपुर बुलाया, कमरे में सुलाया तो अब क्या हुआ?

मैं कसमसा रही थी ! आज मुझे पता चला कि जीजाजी में कितनी ताकत है, मुझे छुड़ाने ही नहीं दिया। ऐसे दस मिनट बीत गए, मैं थक सी गई थी, मेरा विरोध कमजोर पड़ने लगा, उन्होंने जैसे अजगर मुर्गे को दबोचता, वैसे मुझे अपनी कुंडली में कस रहे थे धीरे धीरे !

उन्हें कोई जल्दी नहीं थी ! वो बराबर मुझे समझा रहे थे- चुपचाप रहो, मजा लो ! तुम्हारे पति को गए साल भर हो गया है, क्यों तड़फ रही हो? मैं सिर्फ तुम्हें आनन्द दूँगा, मुझे कोई जरुरी नहीं है ! और आज अब मैं तुम्हें छोड़ने वाला नहीं हूँ !

मैं कुछ नहीं सुन रही थी, में तो कसमसा रही थी और छोड़ने के लिए कह रही थी। वो थोड़ा मौका दे देते तो मैं कमरे के बाहर भाग जाती पर उन्होंने मुझे जकड़ रखा था।

फिर उन्होंने मेरे स्तन दबाने बंद किए और अपना हाथ नीचे लाये, मेरी कच्छी नीचे करने लगे।

मैं तड़फ कर उनके सामने हो गई, मेरी आधी कच्छी नीचे हो गई पर मैंने उनका हाथ पकड़ लिया और ऊपर कर दिया।

वो मेरे पेट को सहलाने लगे फिर दूसरे हाथ से मेरे हाथ को पकड़ लिया और पहले वाले हाथ से फिर कच्छी नीचे करने लगे, साथ साथ मुझे सहयोग करने का भी कह रहे थे।

मैंने नहीं माना और मैंने उनके सामने लेटे लेटे अपनी टांगें दूर दूर करने के लिए एक टांग पीछे की पर एक टांग मुझे उनकी टांगों के उपर रखनी पड़ी !

वे अपना हाथ मेरी गाण्ड की तरफ लाये जहाँ कच्छी आधी खुली थी और खिंच रही थी। उनकी अंगुलियों को गाण्ड के पीछे से चड्डी में घुसने की जगह मिल गई। उन्होंने पीछे से चड्डी में हाथ डाला और मेरी चूत सहलाने लगे जिसे अब वो सीधे छू रहे थे, वे मेरी चूत के उभरे हुए चने को रगड़ रहे थे। मैं फिर कसमसा रही थी पर उन्होंने मुझ पर पूरी तरह काबू पा लिया था, एकदम जकड़ा हुआ था, अब तो मैं हिल भी नहीं पा रही थी। उन्होंने 5 मिनट तक मेरी चूत के दाने को पीछे से रगड़ा, मेरी छोटी सी चूत में पीछे से अंगुली डालने की असफल कोशिश भी कर रहे थे !

मैं कुछ भी करने की स्थिति में नहीं थी, मेरी सारी मिन्नतें बेकार जा रही थी, इतनी मेहनत से हम दोनों को पसीने आ रहे थे, पर पता नहीं आज जीजाजी का क्या मूड था, मैं उन्हें यहाँ आने का कह कर और होटल में नहीं जाने का कह कर पछता रही थी। अगर मेरे बस में काल के चक्र को पीछे करने की शक्ति होती तो मैं पीछे कर उन्हें यहाँ नहीं सुलाती !

खैर अब क्या होना था, मैंने जो इज्जत तीस साल में संभाल कर रखी थी, आज जा रही थी और मैं कुछ भी नहीं कर पा रही थी मैंने अपने सारे देवताओ को याद कर लिया कि जीजाजी का दिमाग बदल जाये और वो अब ही मुझे छोड़ दें, पर लगता है देवता भी उनके साथ थे।

फिर अचानक वो थोड़े ऊँचे हुए एक हाथ से मुझे दबा कर रखा और दूसरे हाथ से मेरी चड्डी पिंडलियों तक उतार दी और एक झटके में मेरी एक टांग से बाहर निकाल दी। अब चड्डी मेरे एक पांव में थी और मेरी चूत पर कोई पर्दा नहीं था।

उन्होंने मेरी दोनों टांगों को सीधा कर अपने भारी पांव से दबा लिया, फिर वे एक झटके से उठे और नीचे हुए, उनका लम्बा हाथ मुझे उठने नहीं रहा था, मेरी टांगें चौड़ी की, एक इस तरफ और दूसरी उस तरफ।
मैं छटपटा रही थी कि अचानक उन्होंने अपना मुंह मेरी चूत पर लगा दिया। बस मुंह लगाने की देर थी कि में जम सी गई, मेरा हिलना डुलना बंद !

आज तक किसी ने मेरी चूत नहीं चाटी थी, पिछले एक साल से मैं चुदी नहीं थी, पिछले आधे घंटे से मैं मसली जा रही थी ! मेरी चूत पर जीजा का मुँह लगते ही मैं धराशाई हो गई, सब सही-गलत भूल गई, मेरे शरीर में आनद का सोता उमड़ पड़ा, मुझे बहुत आनन्द आने लगा।

जीजाजी जोर-जोर से मेरी चूत चूस रहे थे, चाट रहे थे, हल्के-हल्के कट रहे थे, मेरे चने को दांतों और जीभ से चिभाल रहे थे, मेरी चूत की फ़ांकों को पूरा का पूरा अपने मुँह में भर रहे थे, अपनी जीभ लम्बी और नोकीली बना कर जहाँ तक जाये, वहाँ तक मेरी चूत में डाल रहे थे।

मेरे चुचूक कड़े हो गए थे, मेरे मुँह से सेक्सी आहें निकल रही थी, मैं उनके सर पर हाथ फेर रही थी, उनके आधे उड़े हुए बालों को बिखेर रही थी !

उन्हें मेरी आहों और उनके बालो में हाथ फेरने से पता चल गया कि अब मुझे भी मजा आ रहा है, उन्होंने मेरे कमर के पास अपने दोनों हाथ लम्बे करके मेरे दोनों स्तन पकड़ लिए और मसलने लगे।

मुझे और ज्यादा मजा आने लगा, मैंने उनके मुंह को इतनी जोर से आपनी जांघों में भींचा कि उनकी साँस रुकने लगी और उन्होंने मेरे स्तन जोर से भींचे और मेरी चूत में काटा कि मैंने जांघें ढीली कर दी। वो इतनी बुरी तरह से मेरी चूत को चूस रहे थे कि उनकी लार बह कर नीचे बिस्तर तक पहुँच रही थी।

मैंने जितनी टांगें ऊपर उठा सकती थी, उठा ली और जोर जोर से सिसकारने लगी, मैं उन्हें जोर से चाटने का कह रही थी।

इस सब को करीब 15 मिनट हुए होंगे कि मेरा पानी उबल पड़ा, उन्होंने मुँह नहीं उठाया और चाट कर मेरा पूरा पानी निकाल दिया, मैं ठंडी पड़ गई, मुझे जिन्दगी का पहला आनन्द, परम आनन्द मिल गया।

वो अब भी चाट रहे थे, मुझे उन पर दया आ गई, मैंने उन्हें अपने ऊपर खींचना चाहा पर वो बोले- मुझे सिर्फ तुम्हें आनन्द दिलाना था, मेरी कोई जरुरत नहीं थी।

पर मैंने कहा- नहीं, आप आओ मेरे ऊपर ! आपने मुझे इतना आनन्द दिया, अब मैं भी आपको आनन्द देना चाहती हूँ !

अब मैं मुस्कुरा रही थी, हंस रही थी !

जो जीजा थोड़ी देर पहले मेरी नफरत का केंद्र था, अब मुझे सारी दुनिया से प्यारा लग रहा था !

तब जीजाजी ने कहा- पहले बाथरूम जाकर आओ !

मैंने कहा मुझे जाने की जरुरत नहीं है आप मुझे कर लो !

उन्होंने कहा- मैं जाकर आता हूँ, फिर तुम जा आना !

मैंने कहा- ठीक है !

वो गए, फिर मैं गई।

जिसने कभी किसी पर-पुरुष को देखा नहीं, उसने 2010 जब 30 साल की थी तब जीजाजी जो 46 साल के थे उनको कैसे समर्पित हो गई ! सब वक़्त की बात है।

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चुदाई का कार्यक्रम

मैं पहले से शहर में किराये का मकान में रहता था, शादी के 2 माह बाद मैं बीवी को लेकर उसी मकान में आ गया। जिस मकान में मैं ऊपर की मंजिल में रहता था, वहाँ एक और दंपत्ति किराये पर रहने कुछ समय पहले ही आये थे, पति रमेश, पत्नी नीतू और एक 5 वर्ष का बच्चा मोनू।
हम दोनों किरायेदारों के पास 2-2 कमरे थे, आगे की ओर छत थी जिस पर एक बाथरूम एक टोयलेट बना था जिसे हम दोनों किरायदार इस्तेमाल करते थे, छत की सफाई भी मिलकर एक एक दिन करते थे। छत पर हमारे कमरों का मुख्य दरवाजा खुलता था जो आगे के कमरा का था दरवाजे के साथ खिड़की भी थी जिससे रोशनी और हवा आती रहती थी। हमारे पड़ोसी किरायेदार रमेश स्कूल में टीचर थे, बच्चा मोनू नर्सरी में पढ़ता था, नीतू घर का काम देखती थी।
नीतू लगभग 24 वर्ष की बहुत ही सुन्दर महिला थी जिसका फिगर 34-28-36 होगा। जितने बड़े मोम्मे उनसे बड़े गाण्ड के बड़े बड़े खरबूजे, जो चलते समय ऐसे मटकते थे कि दिल की धड़कन थम जाये। रंग गोरा, नैन कजरारे लेकिन शक्ल से भोली होने के बाद भी नीतू थी बहुत ही चालाक, अपना काम निकालना उसे बहुत अच्छी तरह आता था।
अक्सर नीतू मुझसे रूपये उधार मांगने आ जाती, मेरे पास अगर हुए तो दे दिए नहीं तो मना कर दिया। परन्तु उसको इसमें कभी शर्म महसूस नहीं हुई। वो मेरी बीवी के पास भी आकर बैठी रहती थी, कभी कभी मुझसे भी बात कर लेती, कभी हल्की-फुल्की मजाक भी कर लेती, जबकि उसका पति बहुत ही सीधा और शरीफ है। नीतू लालची किस्म की औरत थी अक्सर मियां-बीवी में रूपये-पैसे को लेकर झगड़ा होता रहता था, रमेश नीतू की मांग कभी पूरी नहीं कर पाता था।
मेरी बीवी से भी खूबसूरत होने के कारण मेरा मन हमेशा नीतू के दीदार को तरसता रहता था, उसको चोदने के सपने खुली आँखों से देखता रहता था।
उसका मर्द सुबह साढ़े सात बजे बच्चे को स्कूल लेकर जाता और दोपहर 1:30 पर घर लौटता।
एक दिन सुबहे दस बजे मैं नहाने जा रहा था, मेरी बीवी बोली- मैं बजरिया से सब्जी लेकर आती हूँ !
मैंने कहा- ठीक है ! नहाकर बाथरूम से बाहर निकला तो बाहर ही नीतू खड़ी थी, मैं तौलिया लपेटे था, कुछ झिझक सी लगी पर सोचा कि मौका अच्छा है, मैं उसे देख कर हंस दिया तो वो हंस कर बोली- रोनी जी फेरी वाला बहुत ही अच्छी साड़ी लेकर आया है, आप भाभी जी के लिए खरीद लो।
तो मैंने मना कर दिया तो बोली- मुझे साड़ी पसंद है, प्लीज़ मुझे हज़ार रूपये उधार दे दो, तीन चार दिन में इनकी तनख्वाह मिलेगी तो लौटा दूंगी।
मैंने मौका देखकर कहा- अन्दर आओ, देता हूँ !
लेकिन वो दरवाजे के बाहर ही खड़ी रही, अन्दर नहीं आई।
मैंने सोचा था कि रूपये देते वक्त तौलिया खिसका दूँगा, मुझे नंगा देखकर कुछ बात बन जाएगी पर वो तो अन्दर ही नहीं आई। मैंने रूपये बाहर आकर दे दिए, उसने साड़ी खरीद ली।
तब तक मैं कपड़े पहन चुका था, मेरी बीवी को आने में 20-25 मिनट लग सकते थे तो मैं सीधा नीतू के कमरे चला गया, पूछा- ले ली साड़ी?
वो बोली- हाँ !
और साड़ी दिखाने लगी।
मैंने कहा- भाभी जी, पहन कर दिखाओ तो कोई बात है !
तो कहने लगी- तुम्हें क्यूँ दिखाऊँ? अपने पति को दिखाऊँगी !
मैं अपना सा मुँह लेकर आ गया, उसने मेरी और कोई तवज्जो नहीं दिया। मैंने ठान लिया कि चाहे कोई भी रास्ता अपनाना पड़े, इसकी चूत मारकर ही रहूँगा। उस दिन से ही योजना बनाने लगा कि कैसे इसे नंगा करूँ और इसके यौवन का रसपान करूँ।
रक्षाबंधन पर मेरी बीवी मायके चली गई 6-7 दिन के लिए। दो दिन तो योजना बनाने में निकल गए। हाँ, इन दो दिनों मैंने खिड़की की झिरी से उसे झाड़ू लगाते हुए देखा, उसे लगता था कि मैं सोया हुआ होऊँगा तो वह छत पर झाड़ू लगाते वक्त पूरी निश्चिंत रहती थी कि उसे कोई देख नहीं रहा होगा इसलिए बड़े ही लापरवाह तरीके से पल्लू को कमर में लपेट कर साड़ी को ऊपर चढ़ाकर कमर में खोंस कर छत की सफाई करती थी। बड़े गले के ब्लाऊज़ से उसके दिखते हुए बड़े बड़े दूध संतरे से बड़े आकार के थे, घुटनों तक चढ़ी हुई साड़ी से उसकी मखमली जांघें देखकर मेरा मन ललचा जाता।
जब वो चली जाती तो मैं बाथरूम में घुस जाता और मुठ मारकर ही बाथरूम से बाहर आता था। आखिर मैंने एक तरकीब सोच ही ली, अब जो होगा देखा जायेगा।
मैंने एटीएम से 2500 रूपये निकाले। 500 के 5 नोट थे वो भी सीरियल नंबर के। रात को घर में आकर योजना बनाने लगा। सुबह साढ़े सात पर रमेश बच्चे को लेकर स्कूल चले गए। उनके जाते ही मैंने अपने मोबाइल के वीडियो कैमरा को ऑन करके खिड़की पर इस तरह लगा दिया कि छत का दृश्य कैमरे में आ जाये। मुझे मालूम था कि नीतू अब छत साफ़ करने आएगी। मैंने उन 500 के 5 नोटों में से दो ऊपर के नंबर छोड़कर तीसरा नोट निकला यानि बीच का नोट और उसको तह करके कैमरा की पकड़ वाली जगह गिरा दिया और बाथरूम में घुस गया, झिरी में से देखने लगा। जब नीतू झाड़ू लगाने आई तो उसके चूचों को देखते हुए अपना समय बिताने लगा।
जब वह झाड़ते हुए हमारे खिड़की के पास आई और उसने नोट देखा तो फ़ौरन उठाकर अपने ब्लाऊज़ में अपने स्तनों के बीच में रख लिया और अपने काम में लग गई।जैसे ही वह सफाई करके अपने कमरे में गई, मैं बाथरूम से निकलकर अपने कमरे में आया, मोबाईल का कैमरा बंद किया और उसके कमरे में चला गया। मैंने कहा- भाभी जी, मेरा 500 का नोट गिर गया है, क्या आपको मिला?
तो नीतू बोली- नहीं ! यही तो मैं चाहता था, मैंने कहा- शायद छत पर ही गिरा था, घर में तो कहीं नहीं मिला। तो वो कुछ गुस्से से बोली- जहाँ गिरा है, वहाँ ढूंढो, मुझसे क्यों पूछ रहे हो?
मैंने कहा- तुमने ही अभी सफाई की है, इसलिए पूछ रहा हूँ !
तो वह अपना पल्लू ठीक करने लगी और अपने ब्लाऊज़ को ढकने लगी।
मैंने फ़ौरन कहा- भाभी जी, आपके ब्लाऊज़ में मेरे को 500 का नोट दिख रहा है, प्लीज़ मेरा नोट लौटा दो !
तो बोली- नहीं मेरे ब्लाऊज़ में कुछ नहीं है !
मैंने कहा- लेकिन मेरे को दिख रहा है।
तो बोली- यह तो मेरा है, रमेश ने दिया था।
मैंने कहा- मेरे पास इस बात का सबूत है कि तुमने वह नोट उठाया है।
तो बोली- क्या सबूत है?
मैंने कहा- आओ दिखाता हूँ !
मैंने मोबाइल मे वो वीडियो चला कर उसे दिखाया जिसमें उसने नोट को उठाकर ब्लाऊज़ में रखा था।
उसे देखकर भी उस पर कोई फर्क नहीं पड़ा, बोली- मेरा यह नोट शायद छत पर गिर गया होगा सो मिल गया है, मैंने रख लिया।
बहुत ही घाघ औरत थी वह इसीलिए मैंने भी दूसरा सबूत भी बना रखा था, मैंने आखिरी दाव खेला- नीतू, यदि तुम ऐसे नहीं मानोगी तो मैं तुम्हारे पति से शिकायत करूँगा और मकान मालिक से कहूँगा कि तुम चोरी करती हो ! इस बात का दूसरा सबूत भी मेरे पास है।
बोली- क्या सबूत है?
मैंने कहा- वो तो अब सबके सामने ही बताऊँगा !
तो बोली- बताओ क्या सबूत है?
मैंने कहा- इस नोट को निकालो !
उसने नोट निकाला।
मैंने कहा- इसका नंबर पढ़ो ! इसके पहले और बाद के नंबर के नोट मेरे पास हैं।
मैंने उसे बाकी के चार नोट दिखा दिए तो उसका चेहरा फक से रह गया, बोली- मुझे माफ़ कर दो !मैंने कहा- तुम झूठ क्यूँ बोल रही थी?
बोली- मुझे रूपये की जरुरत थी।
मैंने कहा- मुझसे बोलना था, 500 क्या 10000 दे देता !
तुरंत बेशर्मों की तरह बोली- सच?
मैंने भी कह दिया- हाँ !
और एक और नोट उसके हाथ में थमा दिया।
फिर मैंने हिम्मत करके कहा- इसके बदले में मुझे क्या मिलेगा?
बोली- तुम्हें क्या चाहिए?
मैंने भी आंख मारते हुए कह दिया- तुम !
बोली- क्या मतलब?
मैंने कहा- कभी-कभी जरुरत पर मैं तुम्हारा काम चला दिया करूँगा, तुम मेरा चला दिया करो ! मैं तुम्हें रूपये की जरुरत पूरी कर दिया करूँगा, तुम मेरी बीवी की कमी को पूरा कर दिया करो !
नीतू का चेहरा मुरझा गया, बोली- मैं ऐसी औरत नहीं हूँ, किसी को पता चल गया तो दो परिवार ख़राब हो जायेंगे।
वो रूपये लौटाने लगी।
मैंने कहा- अभी रख लो, सोच कर जबाब देना, यदि मंजूर न हो तो रूपये लौटा देना और इस बात को 
यहीं ख़त्म कर देना, न मैं किसी से कुछ कहूँगा न तुम किसी से कुछ कहना।
और मैं अपने कमरे में आ गया।
मैं समझ गया कि तीर निशाने पर लग चुका है, अब जो करना है वही करेगी।
कमरे में आकर देखा साढ़े आट बज गए हैं, उस दिन मुझे ठेकेदारी की साईट पर भी कोई काम नहीं था क्यूंकि मिस्त्री और मज़दूर सभी छुट्टी पर थे। मैं अन्दर वाले कमरे मैं टीवी ऑन करके समाचार देखने लगा।
तभी बगल के कमरे का दरवाजा खुलने की आवाज़ आई, शायद नीतू बाहर निकली होगी। सोचकर समाचार पर अपना ध्यान लगाये रहा।
मुझे अपने कमरे में किसी के आने का अहसास हुआ। दीवार परछाई देखकर पर मैं टी वी की तरफ ही देखता रहा। दो मिनट बाद फिर किसी के बाहर जाने का अहसास हो गया।
मैंने अंदाज लगाया कि नीतू ही होगी, कुछ कहने आई होगी, फिर हिम्मत नहीं हुई तो वापस चली गई होगी यह सोचकर कि रोनी ने देखा नहीं।
लेकिन मैं जानता था कि अगर वो कुछ कहने आई थी तो दोबारा जरूर आएगी और कहेगी भी जरूर जो कहना चाहती है।
यह सोचकर कि बस अब दिल्ली ज्यादा दूर नहीं है, मेरे लण्ड खड़ा हो गया था आँखों में सुरूर सा महसूस हो रहा था, सारा बदन तपने लगा था पर मजबूर था क्यूंकि अब सारा दारोमदार नीतू के हाथों में था, उसकी ओर से इशारा मिलने दी देर थी।
दस मिनट बाद जब मेरी बैचेनी बढ़ने लगी तो उठा अपने कमरे से बाहर आया। नीतू बाहर छत पर कुर्सी डालकर बैठी कुछ सोच रही थी, मुझे देखकर कुछ झेंप गई।
मैं तौलिया लेकर बाथरूम में घुस गया दरवाजे की झिरी से नीतू को देखने लगा शायद वो कुछ ज्यादा ही सुन्दर लग रही थी, चेहरे पर पाउडर, होंठों पर हल्की लिपस्टिक लगाई थी, सलीके से साड़ी पहनी थी।
मेरे लण्ड में तनाव बढ़ गया था तो मैंने जांघिया निकाल दिया और नीतू की जांघ, चूचियाँ, चूत और गाण्ड की कल्पना कर लण्ड को सहलाने लगा। पांच मिनट में ही मैं चरम पर पहुँच गया। फिर तेजी से मुठ करते हुए सारा माल निकाल दिया और नहाकर अपने कमरे में चला गया। क्यूंकि मन और तनाव शांत हो चुका था तो सोचने लगा मैं भी क्या गलत करने की सोच रहा था, अच्छा हुआ जो कुछ किया नहीं, और मैं अपने आप को सामान्य करने में लग गया यह सोचकर कि चलो कहीं घूम कर आते हैं।
उस समय साढ़े नौ बजे थे, मैंने कपड़े पहने, तैयार होकर ताला उठाया और बाहर आ गया।
तो नीतू कहने लगी- भाई साब, कहीं जा रहे हो?
मैंने कहा- हाँ, कोई काम है?
बोली- हाँ…..
मैंने कहा- बोलो !
तो कहने लगी- थोड़ी देर पहले आपके पास आई थी तो आप टीवी देखने में व्यस्त थे।
मैं वापस अपने कमरे में आ गया, पीछे से नीतू आ गई, उसकी आँखें एकदम लाल हो रही थी, होंठ जैसे बोलना चाह रहे थे पर शब्द नहीं नहीं निकल रहे थे, हाथों का कम्पन साफ दिखाई दे रहा था।
उसने मुश्किल से इतना ही कहा- आप हमसे क्या चाहते हो?
मैं चूँकि नियंत्रित था, होश में था, मैंने कहा- कुछ नहीं, बस ऐसे ही मजाक कर रहा था।
मैंने अपनी नजरें नीचे कर ली लेकिन तब तक तक देर हो चुकी थी, नीतू को बहुत समय मिल चुका था, चुदने को तैयार तो वह पहले ही हो चुकी थी, बस नखरे दिखा रही थी।
उस पर मैंने ज्यादा तवज्जो नहीं दी लेकिन इतने समय में उसने अपनी कल्पना में कितने रंग भरे और उड़ानें भरी होंगी, यह तो वही जानती होगी, एकदम कामुक और चुदास हो रही थी वो, सांस लेने में उसके उभार और उभर उभर कर दिखाई दे रहे थे।
समझ नहीं आ रहा था कि यह रूपये का असर है या मेरी बातों का और या उसकी जरुरत का !
मैंने कह दिया- कुछ काम से जा रहा हूँ।
उसने मेरी बातों पर ध्यान नहीं दिया और पल्लू को नीचे गिरा दिया। अब मेरे आँखों के सामने एक फुट की दूरी पर वो संतरे थे जिन्हें दबाकर, निचोड़कर जिनका रस पीने के सपने कई दिनों से देख रहा था। पल्लू गिरते ही समझ आया कि साड़ी भी उसने नाभिदर्शना पहनी है। पतली कमर पर गहरी नाभि देखकर मेरे लण्ड ने सलामी देना शुरु कर दिया, हर पल ऐसे उठ रहा था जैसे ट्रक को जैक लगते समय ट्रक उठता जाता है।
अब मेरा मन बदलने लगा इच्छा होने लगी कि इस ट्रक को सामने वाली की गैराज में रखना ही ठीक होगा, किराया तो दे ही चुका हूँ।
मैंने पहले ही बताया था कि मैं सेक्स का शौकीन हूँ ! प्यासा तो था ही, जब कुंआ खुद मेरे पास आ गया है तो पीने में क्या हर्ज है।
मेरे शरीर में भी वासना भड़कने लगी, मैंने अपने दोनों हाथ उसके कंधे पर रख दिए और अपनी ओर खींचा तो वह अमरबेल की तरह मुझसे लिपट गई, उसके दोनों हाथ मेरी पीठ पर लिपट गए और मुझे भींचकर अपने स्तनों को मेरे सीने से दबाने लगी। उसका सर मेरे कंधे पर था, होंठ और नाक मेरी गर्दन पर गरम साँस छोड़ रहे थे जो मुझे रोमांचित कर रहे थे। फिर दोनों हाथों से मैं उसका सर थाम कर गालों पर माथे पर फिर होंठों पर चुंबन करने लगा अपने होठो में उसके होंठ दबाकर मसलने लगा। अब उसके सिसकारने की आवाज कमरे की शांति भंग कर रही थी, उसका शरीर ऐसे ढीला पड़ गया था कि यदि मैं उसे छोड़ देता तो वह रस्सी की तरह नीचे गिर जाती।
मैंने एक हाथ से उसकी साड़ी खोल दी और गोद में उठा लिया। उसने दोनों बाहें मेरे गले में डाल दी, उसे ले जाकर अन्दर के कमरे में पलंग पर लिटा दिया मैंने, फिर बाहर आकर उसके कमरे पर बाहर से ताला डाला और अपने कमरे को अन्दर से बंद कर लिया, वो इसलिए की यदि कोई उसके यहाँ आये तो यही समझे कि शायद नीतू कही गई होगी, हमारे यहाँ किसी के आने का कोई सवाल ही नहीं था, अब मैं निश्चिंत होकर कमरे में गया और पलंग पर पड़ी नीतू जो पलंग में सर को छुपाकर उलटी सो रही थी, यानि पीठ और गाण्ड ऊपर थी।
मैं अपने कपड़े उतारकर सिर्फ जांघिए में पलंग पर आकर उसके पास आकर लेट गया और उसकी पीठ को चूमने लगा, एक हाथ से उसके साये को ऊपर खींचकर उसके उन्नत और मांसल नितम्ब सहलाने लगा जो उसनी पेंटी में समा नहीं रहे थे।
अगर मैं गाण्ड मारने का शौकीन होता तो, तो सबसे पहले गाण्ड ही मारता लेकिन मैंने दोनों नितंबों को सहलाने और मसलने के साथ उनको पप्पी करने लगा।
अब फिर उसकी आह निकलने लगी।
फिर नीतू को चित्त लेटाकर उसका ब्लाऊज़ निकाल दिया, काली ब्रा में उसके मस्त बड़े बड़े स्तन हीरोइन नीतूसिंह के चूचों को भी मात दे रहे थे।
मैं उनको सहलाने लगा, उसने अपना हाथ आँखों पर रख लिया, शायद पहली बार उस बेशर्म को शरमाते देखा था।
फिर उसके होंठों को चूमते हुए कान और गले के आसपास गर्म होंठों से जो चुम्मे लिए तो वो मछली की तरह तड़पने लगी।
फिर मैंने उसकी ब्रा को अलग करके एक हाथ से एक संतरे को दबाकर निचोड़ना शुरु किया, दूसरे हाथ से साये के ऊपर से ही चूत का नाप लेने लगा।
काफी फूली हुई थी उसकी चूत, एकदम डबलरोटी की तरह !
दूसरे संतरे को मुंह में लेकर चूसने लगा तो वो मेरे गर्दन और पीठ पर जोरों से हाथ रगड़ने लगी।
फिर मैंने साये का नाड़ा खोलकर जैसे ही शरीर से उसे अलग किया तो उसकी चिकनी, बेदाग, दूधिया गठी हुई जांघों को देखकर तो मैं अपने होश ही खो बैठा, लगा कि इसकी चूत मारने से पहले ही लण्ड वीर्य की पिचकारी मार देगा। गनीमत थी कि कुछ देर पहले ही मुठ मार ली थी तो अब इतने जल्दी होने का डर नहीं था।
मैंने संतरों को छोड़ जांघों पर चुम्बन करना शुरु किया तो पैर के अंगूठे तक पूरा ही चूम डाला। फिर पेंटी के बगल से ही चूत पर उंगली फिराने लगा। किशमिश जैसे दाने को उंगली से रगड़ने लगा तो नीतू ने हाथ बढ़ाकर मेरी चड्डी अलग करके मेरा सात इंच का लण्ड हाथ में पकड़ लिया और उसे जोर से भींचने लगी।
मैंने कहा- नीतू जानू, जरा धीरे से पकड़ो, नहीं तो यह घायल हो जायेगा।
फिर वह धीरे धीरे सहलाते हाथ को ऊपर-नीचे करने लगी, बोली- यह तो मोटा है, मुझे दर्द होगा !
मैंने कहा- तुम चिंता मत करो ! तुम्हें दर्द का अहसास भी न होगा !
अब मैंने उसकी पेंटी को निकाल दिया और 69 की अवस्था में आकर उसकी चूत को देखने लगा। चूत एकदम गोरी थी उस पर चावल के दाने जितने लम्बे बाल थे, शायद 6-7 दिन पहले ही बनाये होंगे, ज्यादे घने नहीं थे सो गोरी खाल पर बड़े ही सुन्दर दिख रहे थे। चूत पर दाना बाहर को निकलता हुआ दिख रहा था, नीचे की फांकें ऐसे लग रही थी जैसे रस में सराबोर मुरब्बा हो !
मैंने उंगली से किशमिश जैसे दाने को छेड़ना चालू किया तो नीतू ने मेरे लिंग को जीभ से चाटना शुरु कर दिया। मैंने धीरे से दूसरे हाथ की उंगली को फांकों पर फिराते हुए उंगली को चूत के गुलाबी छेद में डाल दिया। नीतू की सीत्कार निकल गई।
अब एक हाथ से मणिमर्दन करते हुए दूसरे हाथ की उंगली छेद में अन्दर-बाहर करने लगा, उधर नीतू ने कब मेरे लण्ड को अपने मुँह में लेकर लॉलीपोप की तरह चूसना चालू कर दिया मुझे पता ही नहीं चला।
अब मेरे लण्ड ने ठुमके मारना चालू कर दिया था, नीतू बहुत गर्म और उत्तेजित हो गई थी, कहने लगी- रोनी, अब मुझसे रहा नहीं जाता, प्लीज़ डाल दो अन्दर और फाड़ दो मेरी बुर को !तो मैं घूम कर अपने चेहरे को नीतू के चेहरे के करीब ले आया और उसके रसभरे होंठों पर अपने होंठ सटा दिए, जीभ उसके मुँह में डाल दी, एक हाथ से लण्ड को पकड़कर सुपारा नीतू की चूत की गीली रसयुक्त फांकों पर फिराकर चिकना किया, फिर दाने पर रगड़ने लगा।
अब नीतू नीचे से गाण्ड उठाकर लण्ड को अपनी चूत में डालने की कोशिश करने लगी।
फिर मैंने लण्ड को चूत के छेद पर टिका करके धीरे से झटका लगाया तो नीतू की हल्की चीख निकल गई, बोली- जरा धीरे से डालो ! दर्द होता है !
मैं दूध दबाते हुए चूसने लगा, दो मिनट बाद मैंने एक जोर का झटका लगाया तो लण्ड जड़ तक चला गया।
अबकी बार नीतू दर्द को बर्दाश्त करके बोली- इतना मोटा रमेश का नहीं है, इसलिए जरा सा दर्द हो रहा है।
मैंने कहा- जानेमन, तुम्हारी चूत इतनी भी नाजुक नहीं है, यह तो इससे दोगुना मोटा लण्ड भी निगल सकती है।
अब उसका दर्द ख़त्म हो गया और गाण्ड को उचकाने लगी। मैंने भी अन्दर-बाहर करना शुरू कर दिया, साथ ही चुचूक को, जो पहले ज्यादा तनकर कड़क हो गए थे, मुँह में लेकर चूस रहा था।
उसकी सीत्कार तेज, और तेज होती जा रही थी। 2-3 मिनट में ही वो अपनी टांगें मेरी कमर से लपेटकर बदन को अकड़ाने लगी, बोली- रोनी, बहुत ही अच्छा लग रहा है ! मैं जाने वाली हूँ !
और बल खाती हुई मुझसे लिपट गई।
मैं रुक कर उसके ऊपर पसर गया, दो मिनट बाद मैंने उसको घोड़ी बनाया और गाण्ड को इस तरह से चौड़ा किया कि चूत उभर कर दिखने लगी जिसमें से रस बहकर जांघों तक आ रहा था। अपने लण्ड को उसमे चुपड़कर चूत के छेद पर रखा, फिर दोनों हाथ से मोटी चिकनी गाण्ड को पकड़कर जोर का धक्का लगा दिया। नीतू की हल्की सिसकारी के साथ पूरा का पूरा लण्ड अन्दर चला गया। मैं उसकी गाण्ड पर अपनी जांघों की ठोकर लगते हुए चोदन करने लगा, फिर एक हाथ से उसके स्तन को मसलने लगा, दूसरे हाथ से उसकी चूत के दाने को सहलाने लगा।
लण्ड का अपना काम जारी था, 4-5 मिनट में वह दूसरी बार झड़ गई और वैसी की वैसी पलंग पर गिर गई। मैं भी वैसे ही उसके ऊपर पसरा रहा। लण्ड अभी भी उसकी भोसड़ी में तन्नाया हुआ घुसा था।
मैंने उसको लेकर पलटी लगाई, अब मैं नीचे और नीतू ऊपर !
मैंने कहा- आगे अब तुम करो !
तो वह मेरे दोनों और पैर डालकर घुटने मोड़कर बैठ गई और अपने चूतड़ों को उठा-उठा कर चुदाई करने लगी।
अबकी बारी मेरी थी, मैंने कहा- नीतू, मैं जाने वाला हूँ।
तो बोली- रुको !
फिर वह चित्त लेट गई और अपने पैरों को ऊपर उठा लिया, बोली- तुम ऊपर आ जाओ और अन्दर ही डालकर झरना !
मैंने उसकी टांगों को अपने कंधे पर रखकर जो तीव्रगति से चुदाई की तो दोनों एक साथ स्खलित हो गए और एक-दूसरे से ऐसे लिपट गए जैसे दो बदन और एक जान हो। पूरी चुदाई का कार्यक्रम 20 मिनट चला होगा, लग रहा था जन्मों की प्यास बुझ गई !
थोड़ी देर बाद दोनों अलग हुए, अपने आप को साफ करने के बाद पलंग पर लेट गए, बातें करते हुए एक-दूसरे के अंगों का स्पर्शानन्द ले रहे थे, नीतू मेरा लण्ड सहला रही थी।
दस मिनट बाद मेरा लण्ड फिर खड़ा हो गया, दोनों ने एक बार फिर से चुदाई का कार्यक्रम चालू कर दिया। अबकी बार चुदाई 30 मिनट तक लगातार चली।
नीतू बोली- तुम्हारे साथ मुझे बहुत आनन्द आया और संतुष्टि मिली ! रोनी, तुम्हारा चुदाई करने का तरीका बहुत अच्छा लगा। दोपहर का समय हो रहा है, मैं अपने कमरे जा रही हूँ, रमेश के आने का समय होने वाला है।
यह कह कर वह कपड़े पहन कर चली गई।
मैं भी फिर से नहा कर रमेश के आने से पहले घूमने निकल गया।
उसके बाद मेरी बीवी के लौटने तक हम दोनों रोज छककर चुदाई करते रहे। रमेश के जाते ही नीतू मेरे पास आ जाती मेरे लण्ड से खेलते हुए अपनी चुदाई जी भर के करवाती लेकिन अपनी फरमाइश जरूर बताती और उस हिसाब से मुझसे रूपये ले जाती।मेरी बीवी के आने के बाद जब कभी भी मौका मिलता हम लोग ऐसा मौका कभी नहीं छोड़ते थे।

लेकिन मादर चोद मत बन

हमारे परिवार के सभी सदस्य एक विवाह में शरीक होने अपने गांव गये थे, हम तीन भाई-बहन और मां-बाबूजी। मैंने 12वीं की बोर्ड की परीक्षा दी थी और परिणाम का इंतज़ार कर रहा था।

मैं तीनो भाई बहन में सबसे बडा हूं। उस समय मैं 18वें साल में था और अन्य लडकों की तरह मुझे भी चूची और चूत की तलाश थी। लेकिन उस समय तक एक भी औरत या लडकी का मज़ा नहीं लिया था। बस माल को देखकर तरसता रहता था और लंड हिलाकर पानी निकाल कर संतुष्ट हो जाता था। दोस्तों के साथ हमेशा चूची और चूत की बातें होती थी। मुझसे छोटी बहन, माला है और उससे छोटा एक भाई।

मां का नाम मीना है और उस समय वो 34-35 साल की भरपूर जवान औरत थी। बाबूजी 40 साल के मजबूत कद-काठी के मर्द थे जो किसी भी औरत की जवानी की प्यास को बुझा सकते थे। बाबूजी की तरह मैं भी लम्बा और तगड़ा था लेकिन पता नहीं क्यों मुझे लड़कियों से बात करने में बहुत शरम आती थी, यहाँ तक कि मैं अपनी 16 साल की मस्त जवान बहन के साथ भी ठीक से बात नहीं करता था।

गांव में शादी में बहुत से लोग आये थे। चचेरी बहन की शादी थी, खूब धूमधाम से विवाह सम्पन्न हुआ। विवाह के बाद धीरे-धीरे सभी मेहमान चले गये। मेहमानों के जाने के बाद सिर्फ घरवाले ही रह गये थे। पांच भाईयों में से सिर्फ मेरे बाबूजी गांव के बाहर काम करते थे, बाकी चारों भाई गांव में ही खेती-बाड़ी देखते थे। गांव की आधी से ज्यादा जमीन हमारी थी।

बाबूजी की छुट्टी खत्म होने को थी, हम लोग भी एक दिन बाद जाने वाले थे। हम वहाँ 17-18 दिन रहे। बहुत लड़कियों को चोदने का मन किया, बहुत औरतों की चूची मसलना चाहा लेकिन मैं कोरा का कोरा ही रहा। मेरा लन्ड चूत के लिये तरसता ही रह गया। लेकिन कहते हैं कि ‘देर है लेकिन अन्धेर नहीं है’

उस दिन भी ऐसा ही हुआ। उस समय दिन के 11 बजे थे। औरतें घर के काम में व्यस्त थीं, कम उम्र के बच्चे इधर-उधर दौड़ रहे थे और आंगन में कुछ नौकर सफाई कर रहे थे। मेरे बाबूजी अपने भाईयों के साथ खेत पर गये थे। मैं चौकी पर बैठ कर आराम कर रहा था। तभी माँ मेरे पास आई और बगल में बैठ गई। मेरी माँ मीना ने मेरा हाथ पकड़ कर एक लड़के की तरफ इशारा करके पूछा,”वो कौन है?” वो लड़का आंखें नीची करके अनाज को बोरे में डाल रहा था। उसने सिर्फ हाफ-पैंट पहन रखा था।


“हां, मैं जानता हूँ, वो गोपाल है.. कंटीर का भाई !” मैंने माँ को जवाब दिया।

कंटीर हमारा पुराना नौकर था और हमारे यहा पिछले 8-9 सालों से काम कर रहा था। माँ उसको जानती थी।
मैंने पूछा,”क्यों, क्या काम है उस लड़के से?”

मां ने इधर उधर देखा और बगल के कमरे में चली गई। एक दो मिनट के बाद उसने मुझे इशारे से अन्दर बुलाया। मैं अन्दर गया और मीना ने झट से मेरा हाथ पकड़ कर कहा,”बेटा, मेरा एक काम कर दे…”
“कौन सा काम माँ !”

फिर उसने जो कहा वो सुनकर मैं हक्का बक्का रह गया।

“बेटा, मुझे गोपाल से चुदवाना है, उसे बोल कि मुझे चोदे…!”

मैं मीना को देखता रह गया। उसने कितनी आसानी से बेटे के उम्र के लड़के से चुदवाने की बात कह दी…..
“क्या कह रही हो…..ऐसा कैसे हो सकता है….” मैंने कहा।

“मैं कुछ नहीं जानती, मैं तीन दिन से अपने को रोक रही हूँ, उसको देखते ही मेरी बुर गरम हो जाती है, मेरा मन करता है की नंगी होकर सबके सामने उसे अपने अन्दर ले लूँ !” माँ ने मेरे सामने अपनी चूची को मसलते हुए कहा,”कुछ भी करो, बेटा गोपाल का लन्ड मुझे अभी चूत के अन्दर चाहिए !”

मीना की बातें सुनकर मेरा माथा चकराने लगा था। मैंने कभी नहीं सोचा था कि मां, बेटे के सामने इतनी आसानी से लण्ड और बुर की बात करेगी। मुझे यह जानकर अचम्भा हुआ कि मैं 18 साल का होकर भी किसी को अब तक चोद नहीं पाया हूँ तो वो गोपाल अपने से 20-22 साल बडी, तीन बच्चे की माँ को कैसे चोदेगा। मुझे लगा कि गोपाल का लन्ड अब तक चुदाई के लिये तैयार नहीं हुआ होगा।

“मां, वो गोपाल तो अभी छोटा है.. वो तुम्हें नहीं चोद पायेगा….” मैंने माँ की चूची पर हाथ फेरते हुए कहा,”चल तुझे बहुत मन कर रहा है तो मैं तुम्हें चोद दूंगा ..!”

मैं चूची मसल रहा था, माँ ने मेरा हाथ अलग नहीं किया। यह पहला मौका था कि मेरे हाथ किसी चूची को दबा रहा था और वो भी एक मस्त गुदाज़ औरत की, जो लोगों की नजर में बहुत सुन्दर और मालदार थी।
“बेटा, तू भी चोद लेना, लेकिन पहले गोपाल से मुझे चुदवा दे…अब देर मत कर ….बदले में तू जो बोलेगा वो सब करुंगी… तू किसी और लड़की या औरत को चोदना चाहता है तो मैं उसका भी इंतज़ाम कर दूंगी, लेकिन तू अभी अपनी माँ को गोपाल से चुदवा दे.. मेरी बुर एकदम गीली हो गई है।”

मीना ने सामने से चुदाई की पेशकश की है तो कुछ ना कुछ तो करना ही पड़ेगा। मैंने जोर जोर से 3-4 बार दोनों मस्त मांसल चूचियों को दबाया और कहा,” तू थोड़ा इन्तज़ार कर….मैं कुछ करता हूँ !” यह कहकर मैंने माँ को अपनी बांहों में लेकर उसके गालों को चूसा और बाहर निकल कर आ गया। दिन का समय था, सब लोग जाग रहे थे, किसी सुनसान जगह का मिलना आसान नहीं था। मैं वहाँ से निकल कर ‘कैटल-फार्म’ में आ गया जो आंगन से थोड़ी ही दूर पर सड़क के उस पार था। वहाँ उस समय जानवरों के अलावा और कोई नहीं था। वहाँ एक कमरा भी था नौकरों के रहने के लिये। उस कमरे में भी कोई नहीं था। मैंने सोचा क्यों ना आज माँ की

चुदाई इसी कमरे में की जाये।

कमरे में एक चौकी थी और उस पर एक बिछौना भी था। मैं तुरंत आंगन वापस आया। मीना अभी भी बाहर ही बैठी थी और गोपाल को घूर रही थी। मैं उसके बगल में बैठ गया और कहा कि वो दस मिनट के बाद उस नौकर वाले कमरे में आ जाये। वहाँ से उठ कर मैं ग़ोपाल के पास आया और उसकी पीठ थप-थपा कर मेरे साथ आने को कहा। वो बिना कुछ बोले मेरे साथ आ गया। मैंने देखा कि मां के चेहरे पर मुस्कान आ गई है।

गोपाल को लेकर मैं उस कमरे में आया और दरवाज़ा खुला रहने दिया। मैं आकर बिछौने पर लेट गया और गोपाल से कहा कि मेर पैर दर्द कर रहा है, दबा दे.. यह कहते हुये मैंने अपना पजामा बाहर निकाल दिया। नीचे मैंने जांघिया पहना था। ग़ोपाल पांव दबाने लगा और मैं उससे उसके घर की बातें करने लगा। वैसे तो गोपाल के घरवाले हमारे घर में सालों से काम करते हैं फिर भी मैं कभी उसके घर नहीं गया था। गोपाल की दादी को भी मैंने अपने घर में काम करते देखा था और अभी उसकी माँ और भैया काम करते हैं। गोपल ने बताया कि उसकी एक बहन है और उसकी शादी की बात चल रही है। वो बोला कि उसकी भाभी बहुत अच्छी है और उसे बहुत प्यार करती है।

अचानक मैंने उससे पूछा कि उसने अपनी भाभी को चोदा है कि नही। ग़ोपाल शरमा गया और जब मैंने दोबारा पूछा तो जैसा मैंने सोचा था, उसने कहा कि उसने अब तक किसी को चोदा नहीं है।
मैंने फिर पूछा कि चोदने का मन करता है या नहीं?

तो उसने शरमाते हुये कहा कि जब वो कभी अपनी माँ को अपने बाप से चुदवाते देखता है तो उसका भी मन चोदने को करता है। ग़ोपाल ने कहा कि रात में वो अपनी माँ के साथ एक ही कमरे में सोता है । लेकिन पिछले एक साल से माँ की चुदाई देख कर उसका भी लन्ड टाईट हो जाता है।

“फिर तुम अपनी माँ को क्यों नहीं चोदते हो…” मैंने पूछा, लेकिन गोपाल के जबाब देने के पहले मीना कमरे में आ गई और उसने अन्दर से दरवाजा बन्द कर दिया। ग़ोपाल उठकर जाने लगा तो मैंने उसे रोक लिया। गोपाल ने एक बार मीना के तरफ देखा और फिर मेरा पैर दबाने लगा।

“क्या हुआ मां?”

“अरे बेटा, मेरा पैर भी बहुत दर्द कर रहा है, थोड़ा दबा दे !” मीना बोलते बोलते मेरे बगल में लेट गई। मेरा दिल जोर जोर से धड़कने लगा, डर से या माँ को चोदने के खयाल से , मालूम नहीं। मैं उठ कर बैठ गया और माँ को बिछौने के बीचोंबीच लेटने को कहा।

मैं एक पैर दबाने लगा । ग़ोपाल चुपचाप खड़ा था।

“अरे ग़ोपाल, तुम क्यों खड़े हो, दूसरा पांव तुम दबाओ !” मैंने ग़ोपल से कहा लेकिन वो खड़ा ही रहा।
मेरे दो-तीन बार कहने के बाद गोपाल दूसरे पांव को दबाने लगा। मैंने माँ को आंख मारी और वो मुस्कुरा दी।
“मां, कहां दर्द कर रहा है?”

“अरे पूछ मत बेटा, पूरा पाव और छाती दर्द कर रहा है, खूब जोर से पैर और छाती को दबाओ।”

मां ने खुल कर बुर और चूची दबाने का निमंत्रण दे दिया था। मैं पावं से लेकर कमर तक एक पर को मसल मसल कर मजा ले रहा था जब कि गोपाल सिर्फ घुटनों तक ही दबा रहा था। मैंने गोपाल का एक हाथ पकड़ा और माँ की जांघों के ऊपर सहलाया और कहा कि तुम भी नीचे से ऊपर तक दबाओ। वो हिचका लेकिन मुझे देख देख कर वो भी मीना लम्बी लम्बी टांगों को नीचे से ऊपर तक मसलने लगा।

2-3 मिनट तक इस तरह से मजा लेने के बाद मैंने कहा,”मां साड़ी उतार दो…तो और अच्छा लगेगा…”
“हां, बेटा, उतार दो…”

“गोपाल, साड़ी खोल दो।” मैंने गोपाल से कहा।

उसने हमारी ओर देखा लेकिन साड़ी खोलने के लिये हाथ आगे नहीं बढ़ाया।

“गोपाल, शरमाते क्यों हो, तुमने तो कई बार अपनी माँ को नंगी चुदवाते देखा है…यहां तो सिर्फ साड़ी उतारनी है, चल खोल दे।” और मैंने गोपाल का हाथ पकड़ कर साड़ी की गांठ पर रखा। उसने शरमाते हुये गांठ खोली और मैंने साड़ी माँ के बदन से अलग कर दी। काले रंग के ब्लाऊज़ और साया में गजब की माल लग रही थी।
“मालकिन, आप बहुत सुन्दर हैं…” अचानक गोपाल ने कहा और प्यार से जांघों को सहलाया।
“तू भी बहुत प्यारा है..” मीना ने जबाब दिया और हौले से साया को अपनी घुटनों से ऊपर खींच लिया। माँ के सुडौल पैर और पिंडली किसी भी मर्द को गर्म करने के लिये खाफी थे। हम दोनों पैर दबा रहे थे लेकिन हमारी नजर मीना की मस्त, गोल-गोल, मांसल चूचियों पर थी। लग रहा था जैसे कि चूचियां ब्लाऊज़ को फाड़ कर बाहर निकल जायेंगी। मेरा मन कर रहा था कि फटाफट माँ को नंगा कर बूर मे लन्ड पेल दूं। मेरा लंड भी चोदने के लिये तैयार हो चुका था। और इस बार घुटनों के ऊपर हाथ बढा कर मैंने हाथ साया के अन्दर घुसेड़ दिया और अन्दरुनी जांघों को सहलाते हुये जिन्दगी में पहली बार बुर को मसला। एक नहीं, दो नहीं, कई बार बुर मसला लेकिन माँ ने एक बार भी मना नहीं किया। माँ साया पहने थी और बुर दिखाई नहीं पर रही थी। साया ऊपर नाभि तक बंधा हुआ था। मैं बुर को देखना चाहता था। एक दो बार बुर को फिर से मसला और हाथ बाहर निकाल लिया।

“मां, साया बहुत कसा बंधा हुआ है, थोड़ा ढीला कर लो.. ”

मैंने देखा कि गोपाल अब आराम से मीना की जांघों को मसल रहा था। मैंने गोपल से कहा कि वो साया का नाड़ा खोल दे। तीन चार बार बोलने के बाद भी उसने नाड़ा नहीं खोला तो मैंने ही नाड़ा खींच दिया और साया ऊपर से ढीला हो गया। मैं पांव दबाना छोड़कर माँ की कमर के पास आकर बैठ गया और साया को नीचे की तरफ ठेला। पहले तो उसका चिकना पेट दिखाई दिया और फिर नाभि। कुछ पल तो मैंने नाभि को सहलाया और साया को और नीचे की ओर ठेला।

अब उसकी कमर और बुर के ऊपर का चिकना चिकना भाग दिखाई पड़ने लगा। अगर एक इंच और नीचे करता तो बुर दिखने लगती।

“आह बेटा, छाती बहुत दर्द कर रहा है..” मीना ने धीरे से कहा । साया को वैसा ही छोड़कर मैंने अपने दोनों हाथ माँ की मस्त और गुदाज चूचियों पर रखे और दबाया। गोपाल के दोनों हाथ अब सिर्फ जांघो के ऊपरी हिस्से पर चल रहा था और वो आंखे फाड़ कर देख रहा था कि एक बेटा कैसे माँ की चूचियां मसल रहा है।

“मां, ब्लाउज खोल दो तो और अच्छा लगेगा।” मैंने दबाते हुए कहा।

“खोल दे ” उसने जबाब दिया और मैंने झटपट ब्लाउज के सारे बटन खोल डाले और ब्लाउज को चूची से अलग कर दिया।

मां की गोल-गोल, उठी हुई और मांसल चूची देख कर माथा झनझना गया। मुझे याद नहीं था कि मैंने आखरी बार कब माँ की नंगी चूची देखी थी। मैं जम कर चूची दबाने लगा।

“कितना टाईट है, लगता है जैसे किसी ने फ़ुटबाल में कस कर हवा भर दी है।” मैंने घुन्डी को कस कर मसला और ग़ोपाल से कहा,” क्यों गोपाल कैसा लग रहा है?” मैं जोर जोर से चूची को दबाता रहा।

अचानक मैंने देखा कि गोपाल का एक हाथ माँ की दोनों जांघों के बीच साया के ऊपर घूम रहा है। एक हाथ से चूची दबाते हुए मैंने गोपाल का वो हाथ पकड़ा और उसे माँ की नाभि के ऊपर रख कर दबाया।

“देख, चिकना है कि नहीं?” मैं उसके हाथ को दोनों जांघों के बीच बुर की तरफ धकेलने लगा। दूसरे हाथ से मैं लगातार चूचियों का मजा ले रहा था। मुझे याद आया कि बचपन में इन चूचियों से ही दूध पीता था। मैं माँ के ऊपर झुका और घुन्डी को चूसने लगा।

तभी माँ ने फुसफुसाकर कान में कहा,”बेटा, तू थोड़ी देर के लिये बाहर जा और देख कोई इधर ना आये..”
मैं दूध पीते पीते गोपाल के हाथ के ऊपर अपना हाथ रख कर साया के अन्दर ठेला और गोपाल का हाथ माँ के बुर पर आ गया। मैंने गोपाल के हाथों को दबाया और गोपाल बुर को मसलने लगा । कुछ देर तक हम दोनों ने एक साथ बुर को मसला और फिर मैं खड़ा हो गया। ग़ोपाल का हाथ अभी भी माँ की बुर पर था लेकिन साया के नीचे। बुर दिख नहीं रही थी।

मैंने अपना पजामा पहना और गोपाल से कहा,”जब तक मैं वापस नहीं आता, तू इसी तरह मालकिन को दबाते रहना। दोनों चूचियों को भी खूब दबाना।”

मैं दरवाजा खोल कर बाहर आ गया और पल्ला खींच दिया। आस पास कोई भी नहीं था। मैं इधर उधर देखने लगा और अन्दर का नजारा देखने का जगह ढूंढने लगा। जैसा हर घर में होता है, दरवाजे के बगल में एक खिड़की थी। उसके दोनों पल्ले बन्द थे। मैंने हलके से धक्का दिया और पल्ला खुल गया। बिस्तर साफ साफ दिख रहा था।

मीना ने गोपाल से कुछ कहा तो वो शरमा कर गर्दन हिलाने लगा।मीना ने फिर कुछ कहा और गोपाल सीधा बगल में खड़ा हो गया। मीना ने उसके लन्ड पर पैंट के ऊपर से सहलाया और ग़ोपाल झुक कर साया के ऊपर से बुर को मसलने लगा। एक दो मिनट तक लंड के ऊपर हाथ फेरने के बाद मीना ने पैंट के बटन खोल डाले और गोपाल नंगा हो गया। मीना ने झट से उसका टनटनाया हुआ लंड पकड लिया और उसे दबाने लगी।

मां को मालूम था कि मैं जरुर देख रहा हूँ, उसने खिड़की के तरफ देखा। मुझसे नजर मिलते ही वो मुस्कुरा दी और लंड को दोनों हाथों से हिलाने लगी। गोपाल का लंड देख कर वो खुश थी। उधर गोपाल ने भी बुर के ऊपर से साया को हटा दिया था और मैंने भी पहली बार एक बुर देखी वो भी अपनी माँ की, जिसे मेरी आंखों के सामने एक लड़का मसल रहा था।

मीना ने कुछ कहा तो गोपाल ने साया को बाहर निकाल दिया। वो पूरी नंगी थी। उसकी गठी हुई और लम्बी टांगें और जांघ बहुत मस्त लग रही थी। बुर पर बहुत छोटे छोटे बाल थे, शायद 6-7 दिन पहले झांट साफ किया था। मीना लंड की टोपी खोलने की कोशिश कर रही थी। उसने गोपाल से फिर कुछ पूछा और गोपाल ने ना में गर्दन हिलाई। शायद पूछा हो कि पहले किसी को चोदा है या नहीं। मीना ने गोपाल को अपनी ओर खींचा और खूब जोर जोर से चूमने लगी और चूमते-चूमते उसे अपने ऊपर ले लिया।

अब मुझे मीना की बुर नहीं दिख रहा था। मीना ने हाथ नीचे की ओर बढ़ाया और अपने हाथ से लंड को बुर के छेद पर रखा। मीना ने गोपाल से कुछ कहा और वो दोनों चूची पकड़ कर धीरे धीरे धक्का लगा कर चुदाई करने लगा।

गोपाल अपने से 20 साल बड़ी गांव की सबसे मस्त और सुन्दर माल की चुदाई कर रहा था। मैं अपने लंड की हालत को भूल गया और उन दोनों की चुदाई देखने लगा। गोपाल जोर जोर से धक्का मार रहा था और मीना भी चूतड़ उछाल उछाल अपने बेटे की उम्र के लड़के से चुदाई का मजा ले रही थी। यूँ तो गोपाल के लिये चुदाई का पहला मौका था लेकिन वो पिछले साल से हर रात अपनी माँ को नंगी देखता था, बाप से चुदवाते।
मैं देखता रहा और गोपाल जम कर मेरी माँ को चोदता रहा और करीब 15 मिनट के बाद वो माँ के ऊपर ढीला हो गया। मैं 2-3 मिनट तक बाहर खड़ा रहा और फिर दरवाजा खोल कर अन्दर आ गया। मुझे देखते ही गोपाल हड़बड़ा कर नीचे उतरा और अपने हाथ से लंड को ढक लिया। लेकिन मीना ने उसका हाथ अलग किया और मेरे सामने गोपाल के लंड को सहलाने लगी।

मां बिल्कुल नंगी थी। उसने दोनों टांगों को फैला रख्खा था और मुझे बुर का फांक साफ साफ दिख रहा था। लंड को सहलाते हुये मीना बोली,”बेटा, गोपाल में बहुत दम है…मेरा सारा दर्द खत्म हो गया।” फिर उसने गोपाल से पूछा,”क्यों, कैसा लगा..?”

मैं उसकी कमर के पास बैठ कर बुर को सहलाने लगा। बुर गोपाल के रस से पूरी तरह से गीली हो गई थी।

“बेटा, साया से साफ कर दे।”

मैं साया लेकर बुर के अन्दर बाहर साफ करने लगा और उसने गोपाल से कहा कि वो गोपाल को बहुत पसन्द करती है और उसने चुदाई भी बहुत अच्छी की। उसने गोपाल को धमकाया कि अगर वो किसी से भी इसके बारे में बात करेगा तो वो बड़े मालिक (मेरे बड़े काका) से बोल देगी और अगर चुप रहेगा तो हमेशा गोपाल का लंड बुर में लेती रहेगी। गोपाल ने कसम खाई कि वो किसी से कभी मीना मालकिन के बारे में कुछ नहीं कहेगा। मीना ने उसे चूमा और कपड़े पहन कर बाहर जाने को कहा।

ग़ोपाल बहुत खुश हुआ जब माँ ने उससे कहा कि वो जल्दी फिर उससे चुदवायेगी। मैंने गोपाल से कहा कि वो आंगन जाकर अपना काम करे। गोपाल के जाते ही मैंने दरवाजा अन्दर से बन्द किया और फटाफट नंगा हो गया। मेरा लन्ड चोदने के लिये बेकरार था। माँ ने मुझे नजदीक बुलाया और मेरा लन्ड पकड़ कर सहलाने लगी।

“हाय बेटा, तेरा लौड़ा तो बाप से भी लम्बा और मोटा है…, लेकिन अपनी माँ को मत चोद। तू घर की जिस किसी भी लड़की को चोदना चहता है, मैं चुदवा दूंगी.. लेकिन मादरचोद मत बन।”
मैंने अपना लंड अलग किया और माँ के ऊपर लेट गया। लंड को बुर के छेद से सटाया और जम कर धक्का मारा…

“आह्ह्ह्ह्ह……”

मैं माँ के कन्धों को पकड़ कर चोदने लगा।

“साली, अगर मुझे मालूम होता कि तू इतनी चुदासी है तो मैं तुझे 4-5 साल पहले ही चोद डालता, बेकार का हत्तू मार कर लौड़े को तकलीफ नहीं देता।” कहते हुये मैंने जम कर धक्का मारा.. “आअह्ह्ह्ह्ह्ह….मजा आआआअ ग…याआअ..”

मां ने कमर उठा कर नीचे से धक्का मारा और मेरा माथा पकड़ कर बोली,”बेटा, वो तो गोपाल से चुदवाने के लालच में आज तेरे सामने नंगी हो गई, वरना कभी मुझे हाथ लगाता तो एक थप्पड़ लगा देती।

मैंने धक्का मारते मारते माँ को चूमा और चूची को मसला।

“साली, सच बोल, गोपाल के साथ चुदाई में मजा आया क्या?” मेरा लौड़ा अब आराम से अपनी जन्मभूमि में अन्दर-बाहर हो रहा था।

“सच बोलूं बेटा, पहले तो मैं भी घबरा रही थी कि मैं मुन्ना के उम्र के लड़के के सामने रन्डी जैसी नंगी हो गई हूँ लेकिन अगर वो नहीं चोद पाया तो !” माँ ने गोपाल को याद कर चूतड़ उछाले और कहा,” गोपाल ने खूब जम कर चोदा, लगा ही नहीं कि वो पहली बार चुदाई कर रहा है.. मैं तो खुश हो गई और अब फिर उससे चुदवाउंगी।”

“और मैं कैसा चोद रहा हूँ मेरी जान ?” मैंने उसके गालों को चूसते हुये पूछा।

“बेटा, तेरा लौड़ा भी मस्त है और तेरे में गोपाल से ज्यादा दम भी है….मजा आ रहा है….”
और उसके बाद हम जम कर चुदाई करते रहे और आखिर में मेरे लंड ने माँ के बुर में पानी छोड़ दिया। हम दोनों हांफ रहे थे। कुछ देर के बाद जब ठण्डे हो गये तो हमने अपने कपड़े पहने और बिस्तर ठीक किया।
“बाप रे, सब पूछेंगे कि मैं इतनी देर कहा थी, तो क्या बोलूंगी…” माँ अब दो दो लंड खाने के बाद डर रही थी।
मैंने उसे बांहों में जकड़ कर कहा, “रानी, तुम डरो मत। मैं साथ हूँ ना… किसी को कभी पता नहीं चलेगा तुमने बेटे और नौकर से चुदवाया है।” मैंने माँ के गालों को चूमा और उससे खुशामद किया कि वो दो-ढाई घंटे के बाद फिर इस कमरे में आ जाये जिसमें से कि मैं उसे दुबारा चोद सकूँ।

“एक बार में मन नहीं भरा क्या..?” उसने पूछा..

“नहीं साली, तुमको रात दिन चोदता रहूँगा फिर भी मन नहीं भरेगा… जरुर आना..”

“आउंगी..लेकिन एक शर्त पर…!” माँ ने मेरा हाथ अपनी चूची पर रखा।

“क्या शर्त?” मैंने चूची जोर से मसला…

“गोपाल भी रहेगा ….” माँ फिर गोपाल का लौड़ा चाहती थी।

“साली, तू गोपाल की कुतिया बन गई है… ठीक है, इस बार मैं अपनी गोदी में लिटा कर गोपाल से चुदवाउंगा।
“तो ठीक है, मैं आउंगी….”

आंगन के रास्ते में मैंने उससे पूछा कि वो पहले कितने लौड़े खा चुकी है.. तो उसने कहा कि बाद में बतायेगी।
आंगन में पहुंचते ही बड़ी काकी ने पूछा- माँ को लेकर कहां गया था। सब खाने के लिये इंतजार कर रहे हैं।
मैंने जबाब दिया कि मैं माँ को गाछी (फार्म हाउस) दिखाने ले गया था। फिर किसी ने कुछ नहीं पूछा।

चूत चालीसा

मैं उस समय बीए सेकेंड ईयर में पढ़ता था, उम्र यही कोई अठारह साल थी। उस समय लण्ड का आकार सात इंच हो चुका था। तने होने पर पैंट के ऊपर से इसे साफ़ महसूस किया जा सकता था और सुबह के वक्त तो यह चड्डी को बिल्कुल तम्बू बना देता था इसीलिए मैं हमेशा चादर ले कर सोता था।
गर्मियों की बात थी, मेरी सगी मौसी मेरे घर आई हुई थी। मम्मी की सबसे छोटी बहन…. नाम है निम्मी।
मौसी की शादी पास के ही एक गाँव में हुई थी और मौसा जी खेती करते थे।मौसी अक्सर किसी न किसी काम से लखनऊ आती थी तो वह हमारे घर जरूर आती थी। पर मैं पिछले कुछ महीनों से देख रहा था कि वो मम्मी से अकेले में बड़ी देर तक अपना दुःख सुनाती थी। मैंने उनको कहते हुए सुना था कि मौसा जी का गाँव की किसी विधवा औरत से चक्कर चल रहा था और वो मौसी में बिल्कुल रुचि नहीं लेते थे। वे अक्सर रात को खेत की रखवाली के बहाने उस औरत के घर पर पड़े रहते थे। मौसी अपनी 12 साल की बेटी के साथ अक्सर घर में अकेले रात बिताती थी।

सच में किसी के पति का लण्ड उसकी सूखी चूत को हरी करने की बजाये किसी गैर औरत की चूत में घुसे, यह उस औरत के लिए अपमान की बात है।माँ के कहने से मौसी ने मौसा जी को बहुत समझाया, दुआ-तावीज़ भी कराया पर उल्टे कई बार मौसा ने उनकी पिटाई कर दी थी। अब तो मौसी ने जैसे हालात से समझौता कर लिया था, वो कई कई दिन हमारे घर रहती थी, गाँव से आती थी तो एक-आध दिन रुक कर ही जाती।

हाँ वो जब भी मुझे मिलती थी तो पकड़ कर गालों पर बहुत चुम्मी लेती थी, मेरा मुन्ना कह कर ! और मुझे उनकी साँसों की गंध ऐसी बुरी लगती कि मैं उनसे हाथ छुड़ा कर भागता- अरे मौसी, अब मैं बड़ा हो गया हूँ !
यह देख मेरी माँ हंस देती।
ऐसे ही गर्मी की वो रात थी, माँ, पिताजी और मेरा छोटा भाई छत पर खुली हवा में सोते थे, केवल मैं रात देर रात तक पढ़ाई के कारण नीचे सोता था। उस दिन भी देर
रात तक पढ़ कर मैं अपने कमरे में पड़े तख्त पर सो गया।
रात को अचानक मेरी नींद खुल गई जब मुझे लगा कि कोई मेरा हाथ पकड़ कर खींच रहा है। अँधेरे में मैं समझ गया कि यह मौसी थी वो मेरा हाथ खींच कर अपने चूचियों पर रख कर ऊपर से अपने हाथ से दबा रही थी। मेरे बदन में करेंट सा लगा। मौसी अपने ब्लाउज के बटन आगे से खोले थीं, उनके बड़े बड़े चुच्चे मेरी हथेलियों के नीचे थे, उस पर मौसी का हाथ था और वो अपने हाथ से मेरी हथेली दबा दबाकर अपने चुच्चे मसल रही थी और हल्के से कराह भी रही थी।
मेरे लण्ड में आंधी-तूफ़ान चलने लगा, मैं बंद आँख से भी मौसी की खूब गोल-गोल भरी भरी चूचियों को महसूस कर सकता था, कई बार ब्लाउज से आधी बाहर झांकती देख चुका था उनको ! पर आज जाने क्या को रहा था मुझे? कामवासना का भूत मेरे सर चढ़ चुका था। मन तो किया कि ऊपर चढ़ कर मैं खुद मौसी की चूचियों को रगड़ कर रख दूँ और उनकी टांगों को फैलाकर उनकी चूत का सारा रस पी लूँ और उनकी टांगें फैला कर बुर में ऐसा लण्ड पेलूँ कि वो वाह-वाह कर उठें औररात भर अपनी टांगें न मिला सकें। लेकिन मेरे मन में डर था कि कहीं मौसी इतना सब कुछ न करना चाहती हों और वो घर में सब को बता दें तो?
यही सोच कर मैं सोने का नाटक करने को मजबूर होकर तड़पता रहा। मौसी ने मेरे हाथों को पकड़ कर अपने चुच्चे खूब मसलवाये फिर मुझे पकड़ कर अपनी और घुमा लिया और मेरे ओंठों को अपने अपने होंठों में लेकर चूसना शुरू कर दिया।
मैं अभी भी आँखें बंद किये था, मेरा लण्ड झटके पर झटके खा रहा था मेरे लण्ड की हालत समुन्दर में प्यासे मगर्मच्छ के जैसी थी। तभी मौसी ने अपनी एक टांग उठा कर मेरे ऊपर ऐसे रखी कि मेरा लण्ड उनकी गर्म-गर्म रान के नीचे दब गया।
मैंने महसूस किया कि उनकी मैक्सी कमर तक ऊपर थी। जीवन में पहली बार इतनी चिकनी टांग मैंने अपनी टांग पर सटी हुई महसूस की, बहुत ही गर्म और केले की जैसे चिकनी बेहद नरम जांघें थी, शायद एक भी बाल नहीं होगा उन पर।
मेरे लण्ड का पानी छूटने को हो गया पर डर गया कि मौसी सब जान जायेंगी कि मैं जग रहा हूँ। मैंने पूरी ताकत लगा कर लण्ड को कंट्रोल में किया हुआ था। अब मौसी की चूचियाँ मेरे सीने से रगड़ रही थी, मेरे होंठ उनके होंठों के बीच में थे, उनकी एक बांह मेरे ऊपर से होते हुई मेरी पीठ को सहला रही थी। मेरे कुंवारे लण्ड की अग्नि परीक्षा हो रही थी और मैं ससम्मान इसमें उत्तीर्ण होने का भरसक प्रयास कर रहा था। अचानक मेरे ऊपर उनकी नंगी टांग और चढ़ गई। मैंने धधकती चूत की गर्मी को अपने लण्ड के बिल्कुल करीब महसूस किया। मुझे कहने में कोई शर्म नहीं कि जीवन में पहली चूत का स्पर्श मुझे मेरी मौसी जी ने दिया। मेरी चड्डी में खड़े लण्ड का लालच मौसी से रोका न गया वो मेरे सात इंच के लण्ड पर चड्डी के ऊपर से ही हाथ फिराने लगी थी और लण्ड पर हाथ रखते ही वो कराह उठीं जैसे उनके सारे जिस्म के दर्द की दवा उन्हें मिल गई हो।
मेरा दिल बड़े जोर से धधक-धड़क रहा था, मेरे लण्ड में फड़कन को मौसी ने बखूबी महसूस किया था इसीलिए उन्होंने मेरे फड़कते लण्ड को कस कर अपने हाथों में मजबूती से जकड़ लिया। दोस्तो, यह मेरी सहनशीलता का चरम था। बड़ी बड़ी झांटों वाली गद्दीदार पाव रोटी जैसी बुर का गर्म एहसास अपनी जांघ पर पाकर बड़ी बड़ी चूचियों से सटे होकर एक औरत के हाथ में लण्ड कितनी देर बर्दाश्त करता। मैंने भी सारी शर्म त्याग दी और चड्डी के अन्दर ही मौसी के हाथों में कसे कसे लण्ड ने पूरी धार से पानी छोड़ दिया। मैं ऊँ ऊ ऊं.. करके उनकी बाहों में एक बार मचला, फिर शांत हो कर लण्ड को आख़िरी बूँद तक झड़ने देता रहा।

मौसी अभी यही समझ रहीं थीं कि मैं उत्तेजित होकर नींद में ही झड़ा हूँ। उन्होंने मेरा लण्ड कस कर पकड़े रखा जब तक मैं पूरा झड़ नहीं गया। उनका हाथ चड्डी के ऊपर से गीला हो चुका था, मैंने अपनी जांघ पर उनकी चूत का गीलापन साफ़ महसूस किया वो भी झड़ चुकी थी। अपने हाथ में लगे मेरे लण्ड के पानी को चाट रही थी वो ! चुद तो नहीं सकी थी पर एक युवा मर्द के संपूर्ण अंगों से खेलने का सुख शायद उनको बहुत समय बाद मिला था। वो बिस्तर पर मेरा किसी औरत के स्पर्श का पहला अनुभव था और औरत के जिस्म का सही पहला सुख…

मैं मौसी को उस रात चोद तो न सका, शायद अनाड़ीपन और शर्म के कारण ! पर अपने कसरती जिस्म का जो चस्का मैंने मौसी जी को लगा दिया था उससे मुझे पता था कि आने वाली सैकड़ों रातों में वो मेरे बिस्तर पर खुद आने वाली थी और मैंने भी सोच लिया था कि मौसी की सालों से बंजर पड़ी चूत के खेत में अपने लण्ड से न सिर्फ कस कर जुताई करनी थी बल्कि खाद पानी से उसे फिर से हरा भरा करना था। मौसी को कस कर पेलने का अरमान दिल में लिए मैं गीली चड्डी में चिपचिपेपन को बर्दाश्त करता हुआ सो गया।
अगले दिन सुबह मौसी मेरे साथ इस तरह सामान्य थी जैसी रात में कुछ हुआ ही न हो।
मैं शुरू में तो उनसे आँख चुरा रहा था पर उनका बर्ताव देख कर मैं भी कुछ सामान्य हो गया पर.
मौसी अभी यही समझ रहीं थीं कि मैं उत्तेजित होकर नींद में ही झड़ा हूँ। उन्होंने मेरा लण्ड कस कर पकड़े रखा जब तक मैं पूरा झड़ नहीं गया। उनका हाथ चड्डी के ऊपर से गीला हो चुका था, मैंने अपनी जांघ पर उनकी चूत का गीलापन साफ़ महसूस किया वो भी झड़ चुकी थी। अपने हाथ में लगे मेरे लण्ड के पानी को चाट रही थी वो ! चुद तो नहीं सकी थी पर एक युवा मर्द के संपूर्ण अंगों से खेलने का सुख शायद उनको बहुत समय बाद मिला था।


दिमाग पर मौसी का गदराया जिस्म छाया हुआ था। जीवन में पहली बार मैंने मौसी जी को दिन के उजाले में कामवासना की नज़र से देखा था। उनके एक एक अंग की रचना को पढ़ने की कोशिश कर रहा था और उससे मिलने वाले सुख की कल्पना कर रहा था।

उनकी गोल बड़ी बड़ी मस्त चूचियाँ, उठे उठे भारी चूतड़ हिलते हुए कूल्हों से लपकती दिखती गाण्ड की मोटी दरार… आज सब अंग सेक्स को आमंत्रण दे रहे थे।

सुबह के ग्यारह बज रहे थे, पापा ऑफिस चले गए थे और मम्मी स्कूल। छोटा भाई ड्राइंग रूम में कार्टून फिल्म देख रहा था। मैंने मौसी से कहा- मौसी, मैं बाथरूम में नहाने जा रहा हूँ ज़रा आप आकर मेरी पीठ मल देंगी क्या?

“हाँ हाँ ! क्यों नहीं? … तुम चलो, मैं आती हूँ !” वो हंस कर बोली।

मैं बाथरूम में चला गया, मेरा मन मौसी के स्पर्श के विचार से खुशी से धड़क उठा। मैं सिर्फ फ्रेंची में था, पानी में भीग कर तना हुआ लण्ड बिल्कुल मूसल दिख रहा था।

मैं ऐसे बैठा था कि मौसी जी की नजर आते ही मेरे लण्ड पर पड़े !

और वैसा ही हुआ, मैंने देखा दूर से आती मौसी की नज़र जैसे ही मुझ पर पड़ी, वो मेरे लण्ड पर ही जाकर अटक गई।

“आइए.. मौसी जी… !” मैं उनकी नज़र को अनदेखा करते हुए बोला- मेरी पीठ पर अच्छे से साबुन लगा कर मल दीजिये, अपने हाथ से बढ़िया से नहीं हो पाता है ना..

“अरे, तुम बैठे रहो, मैं देखना कितना बढ़िया से मलती हूँ…. !” कह कर मौसी मेरी पुष्ट पीठ को मलने लगी।
मेरे लण्ड में सनसनी शुरू हो गई, खड़े लण्ड को मौसी रह-रह कर निहार लेती थी। पीठ रगड़ते हुए वह बोली- लाओ, अब जब हाथ लगाया ही है तो पूरा ठीक से रगड़ देती हूँ ! अपने पैर इधर करो ! कह कर वो मेरे सामने बैठ गई।

मैं बिल्कुल उनके सामने था, वो मेरी जांघों को साबुन लगाकर मलने लगीं, अब वे मेरे तने और फूले लण्ड को खुल कर देख सकती थी और उनका हाथ पैरों को रगड़ते रगड़ते मेरी चड्डी तक पहुँच जाता था, उनकी उंगलियाँ मेरे लण्ड को स्पर्श कर लौट जाती थी। नहाने में इतना मज़ा पहली बार आ रहा था, उनसे लण्ड छुवाने का मेरा मकसद तो पूरा हो रहा था वो भी मेरे लण्ड को उजाले में नंगा देखने को आतुर थी।

मौसी ने पानी डाल कर कर मुझे खूब नहलाया। मैं तौलिया लपेट कर चड्डी उतारने लगा लेकिन जानबूझ कर चड्डी उतारते समय तौलिया गिरा दिया, मौसी जी सामने ही खड़ी थी। मेरा मूसल जैसा लण्ड देख कर उनके होश उड़ गए, वे आँखें फाड़ फाड़ कर मेरा विशाल लण्ड देखती रही।

मैं बोल पड़ा- ओह… वेरी सारी मौसी जी…सारी…

“अरे बस..बस.. बचपन में कई बार देखा है तुम्हें ऐसे.. शर्माने की कोई बात नहीं है ! जाओ बैठो, मैं नाश्ता देती हूँ।”

“आप जाइए, मैं चड्डी धोकर डाल दूँ, फिर आता हूँ.. ” मैंने कहा।

मैं कर दूँगी, तुम जाओ…” वो बोली और मेरी चड्डी उठाकर साबुन लगाने लगी..

मैंने देखा कि चड्डी में वीर्य के दाग साफ़ चमक रहे थे पर मौसी तो सब जानती थी इसलिए वो मुझसे बिना कुछ पूछे उन दागों को रगड़ने लगी।

मेरा लण्ड फिर झटके लेने लगा था… पर तभी काम वाली आ गई थी इसलिए अब तो मुझे बेचैनी से रात का इंतज़ार था जब मौसी जी मेरे पास लेटने वाली थी ! दोपहर में मम्मी पर आ गई इसलिए मैंने अपने एक दोस्त के घर जाकर ब्लू फिल्म देखी, शाम को खाना खाकर जैसे ही सब सोने के लिए ऊपर छत पर गए तो मैंने थोड़ी देर के लिए किताब खोली पर मन कहीं ओर था इसलिए जल्दी ही किताब एक ओर रख कर मैंने लाईट बुझा दी और लण्ड हाथ में पकड़ कर मैं लेट कर मौसी के आने का इन्तज़ार करने लगा।

मैंने वैसलीन की शीशी पहले से सिरहाने रख ली थी, मुझे पूरा विश्वास था कि आज मेरे मूसल जैसे लण्ड को देखने के बाद मौसी की चूत में खुजली जरूर हो रही होगी।

ऊपर मौसी की बातें करने और हंसने की आवाजें आ रही थी, मैं बेचैन सा करवटें बदल रहा था। करीब एक घंटे के बाद मैंने किसी के छत से उतरने की आवाज सुनी। मेरे कमरे का दरवाजा खुला, मौसी ही थी !
उन्होंने कमरे की बत्ती जलाई, एक नज़र मुझे देखा और मुस्कुराई।

मैंने आँखें बंद किये हुए चोरी से देखा, वो गुलाबी मैक्सी में थी, उनके बड़े बड़े चूतड़ और मस्त बड़ी बड़ी चूचियाँ साफ़ चमक रही थी। मेरे लण्ड ने झटके लेने शुरू कर दिये, मौसी ने लाइट बुझाई और बाथरूम में घुस गई। उनके मूतने की आवाज रात के सन्नाटे में कमरे में साफ़ सुनाई दी। मन तो किया बाथरूम में मूतते हुए पकड़ कर उनको अध-मूता ही चोदना शुरू कर दूँ या उनके नमकीन मूत से तर बुर को भीतर तक जबान डाल कर चाटूँ।


लेकिन चुदने से पहले औरत खुल कर मूत ले तो अच्छा रहता है।

मौसी मूत कर मेरे बिस्तर पर आकर मेरे ही पास लेट गई, मेरा दिल जोर जोर से धडकने लगा। मैंने अपने फड़कते हुए टन्नाये लण्ड को अपनी दोनों टांगों के बीच दबा लिया। मैं चाहता था कि शुरुआत मौसी की तरफ से हो।

दो मिनट बीते थे कि मैंने अपने सीने पर मौसी जी का हाथ रेंगते हुए महसूस किया। वो मेरे सीने में आ रहे हल्के-हल्के बालों सो सहलाते हुए अपना हाथ मेरे लण्ड की तरफ ले जाने लगी, मैं समझ गया कि मेरे लण्ड का जादू इन पर चल गया है लेकिन मैं अपने खड़े लण्ड को उनको अभी पकड़ाना नहीं चाहता था इसलिए मैं उनकी तरफ पीठ करके घूम कर लेट गया मैं ने फ्रेंची और कट वाली बनियान पहन रखी थी। मौसी ने भी मेरी तरफ करवट लेकर अपनी मैक्सी पेट तक उठा कर अपनी फूली हुई दहकती चूत को मेरे पिछवाड़े से सटा दिया वो मेरे चूतड़ों को सहलाते हुए हल्के से कराह रही थी।


उन्होंने दूसरे हाथ से मेरा चेहरा अपनी ओर घुमाया और मेरे होंठों पर चुम्बन करने लगी। मेर लिए अब बर्दाश्त करना असंभव था, मैंने उनकी और करवट बदली अब मैं और वो आमने-सामने थे। उन्होंने मेरा हाथ पकड़ कर अपनी चूचियों को मलना शुरू किया और मेरे होंठ अपने होंठों में ले लिए।


मैंने बिना देर किए उनकी चूचियों को मैक्सी के ऊपर से हौले हौले मसलना शुरू कर दिया और उनके होंठों को भी चूसने लगा। मौसी तो जैसे मस्ती में मदहोश थी, मेरे चूची दबाने से मिलने वाले सुख में वो इतना डूबीं थी कि वो भूल गईं कि मैं जाग रहा हूँ।

उनके होंठ चूसते हुए मैंने अपना दूसरा हाथ उनकी गर्म चूत पर रख दिया, ऐसा लगा जैसे हाथ को किसी हीटर पर रख दिया हो ! मौसी मीठा सा कराह रही थी, उनकी मदहोशी का फायदा उठाते हुए मैंने एक उंगली उनकी चूत में घुसेड़ दी।

मौसी को अब करेंट लगा था, चौंक कर उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया- मुन्ना… ओ.. ओ मुन्ना…? वो फ़ुसफुसाई। मैंने उनकी चूचियों को कसकर मसल दिया और होंठों को अपने होंठों में लेकर कस कर चूसा। मौसी के मुँह से एक सीत्कार निकली।

“नहीं… बस… और कुछ मत बोलो मेरी जान !” मैंने उनके कान में कहा। उनको मुझसे ऐसे जवाब की उम्मीद नहीं थी पर उनको उत्तेज़क जवाब अच्छा जरूर लगा- माही… मैं हूँ मौसी...


“हाँ ! पर दिन के उजाले में… रात को अब तुम सिर्फ मेरा माल हो… मेरी जान..! कल रात तुमने मुझे अपना गुलाम जो बनाया है…!”

“तो क्या कल रात तुम?”… वो चौंक पड़ी।

“हाँ, मैं जाग रहा था और तड़पता रहा सारी रात ! पर अब नहीं… !” कह कर मैं मौसी के ऊपर आ गया और एक झटके में उनकी मैक्सी को पूरा ऊपर करते हुए उनकी गोल-गोल चूचियों को कस कर पकड़ कर जो मसलना शुरू किया तो मौसी ना नहीं कर पाई- “हाय धीरे माही… तुम नहीं जानते मैं कितना अकेली हूँ ! इसीलिए मैं कंट्रोल नहीं कर पाई और तुमको…!”

“अरे नहीं, आपने बिल्कुल सही नंबर डायल किया है, किसी को पता भी नहीं चलेगा और आपकी पूरी सेवा भी…!” “बस अब बातें नहीं… प्यार… बहुत प्यार चाहिए मुझे ! मैं बहुत प्यासी हूँ…!” कह कर उन्होंने मेरे होंठ अपने होंठों में लेकर चूसना शुरू कर दिया।काम का ज्वर दोनों के जिस्मों पर हावी था मेरे कसरती बाजुओं ने मौसी को कसकर जकड़ लिया, उनकी दोनों चूचियाँ मेरे कठोर सीने में पिस रही थी, उन्हें दर्द हो रहा था पर वो काम ज्वर का दर्द था।


मौसी के मुँह में मैंने अपनी जीभ डाल दी, उन्होंने मेरी जीभ को खूब चूसा। मैंने अपनी जीभ से उनके मुँह का आकार टटोल डाला। वो लगातार तड़प रही थी। मैं अब चूचियों से नीचे आकर उनकी टांगों के बीच में घुटनों के बल बैठ गया और अपना मुँह उनकी लहराती चूत पर रख दिया।

मौसी इसके लिए तैयार नहीं थी, वो सिसक उठीं और नीचे से कमर उठाते हुए अपनी महकती चूत मेरे मुँह से चिपका दी। उनकी चूत पानी से तर थी खुश्बूदार नमकीन पानी का स्रोत सामने हो और कामरस झर रहा हो तो कौन प्यासा रहना चाहेगा, मैंने अपने हाथ उनकी चूचियों पर फिट कर दिए और उन्हें दबाते हुए अपनी लपलपाती जीभ से उनकी बुर की दोनों फांकों को अलग कर दिया।

मौसी हाय कर उठी, मेरे बालों को पकड़ कर अपनी चूत उठाकर उन्होंने मेरे मुँह में दे दी। मैंने पूरी जीभ नुकीली करके उनकी बुर में जितना अन्दर डाल सकता था, डाल दी। अन्दर कामरस का भण्डार था, सब मैंने अपनी जीब से लपर-लपर चाट लिया। बरसों से रुका दरिया था, शायद मेरी नाक तक कामरस से तर हो रही थी।
मौसी चूत उठा-उठा कर मेरे मुँह पर मार रही थी, वे चूतड़ उठा-उठा कर पूरी ताकत से ऐसा कर रही थी, वो चाहती थी कि उनकी चूत से निकलने वाली एक एक बूँद मैं पी लूँ। मैं भी बचपन का प्यासा था तो मजा दोनों को ख़ूब मिल रहा था।

अचानक मैंने मौसी की चूत का ऊपरी हिस्सा चुटकी से दबा कर चूत का छेद और छोटा कर दिया फिर दोनों होंठों से चूत के नीचे का पूरा हिस्सा होंठों से भर कर ऐसा खींचा जैसे कोई बच्चा आम मुँह में लगा कर चूसता हो।

मौसी पागल हो उठी, बहुत थोड़ी सी खुली चूत के रास्ते उनका कामरस आम के रस के जैसा खिंचकर मेरे मुँह में क्या आया, मौसी गनगना उठी और उन्होंने अपनी टांगों से मेरे सर को कस लिया और बोली- …. हाय राजा ! यह सब कहाँ से सीख लिया? मैं पागल हो जाऊँगी ! अब तो बस चोद मुझे… आज फाड़कर ही हटना मर्द है तो !
मैंने बिना देर किये अपने लण्ड से उनकी चूत को निशाना बनाया जिसे मैंने चूस चूस कर लाल कर दिया था। बुर पर मोटा लाल सुपारा फनफना रहा था। मैंने बुर की दोनों फंकों के बीच ढेर सारा थूक दिया और फिर लाल सुपारे को जोरदार धक्का लगाया। लण्ड दो इंच अन्दर धंस कर रुका।

मौसी काफी दिनों से चुदी नहीं थी तो उनकी चूत नई लौंडिया के जैसी कसी थी, चूत के दोनों पाटों ने लण्ड के वार को रोकने की असफल कोशिश की- आअऽऽ …हा ऽऽ … आ ..ऽऽऽ करके रह गई पर अगले धक्के में लण्ड ने चूत की जड़ को छू लिया।

मौसी की दबी सी चीख निकल गई- अ आ आ…

वो धनुष बन गई। दोनों टांगें मेरे सीने के पीछे से ले जाकर वो मुझे लपेटे थी, उनकी आँखें वासना के ज्वर से बंद हो गईं थी, उनकी नाजुक कमर मेरी मजबूत बाजुओं में जकड़ी हुई थी। वो अपनी गाण्ड उठा-उठा कर लण्ड अन्दर लेने की कोशिश कर रही थी।

पूरा लण्ड बाहर तक खींच कर मैंने एक जोर का धक्का मारा और मौसी आआ..हा कर उठी।
मेरे मखमली बिस्तर पर घमासान मचा हुआ था। मौसी को मैंने कमर से ऐसे जकड़ रखा था जैसे अजगर अपना शिकार पकड़ता है। धधकते लाल लण्ड के सुपारे ने चूत का मुँह फाड़ दिया था।

मौसी छटपटा उठी थी पर सेक्स का मंत्र है कि चोदते समय चूत पर कोई रहम नहीं करना चाहिए, सो मैंने अपनी चड्डी जिससे मौसी की गीली चूत को कई बार पौंछा था को उठा कर मौसी के मुँह में ठूंस दिया और सुपारे को पूरा चूत के मुँह तक खींच खींच कर गिनते हुए चालीस शाट मारे।

मौसी गूं… गूं …करती रही पर चुदती रही। चूतड़ों की लय बता रही थी कि उनको मस्ती आ रही थी। चूत चालीसा पूरा होते होते मौसी का पानी छूट गया, उनकी आँखें जो बड़ी बड़ी फ़ैली हुई थीं अब खुमारी से बंद हो गई थी। मैं भी पक्का था इसलिए झड़ने से पहले लण्ड को रोक कर बाहर निकाल लिया।

“आःह ….और चोद मेरे राजा… भोसड़ा बनने तक रुक मत…. उस्सीह ….आअ…अह्हा…” वो मुँह खुलते ही बोली।

“मेरी जान, सब्र तो करो….!” मैं बोला- अगर मेरी चोदी मादा सुबह लंगडा कर ना चले तो मेरा मर्द होना बेकार समझता हूँ मैं ! ….फिर आपकी तो मूतने की आवाज ही बदल दूंगा मैं सुबह तक !” उनकी टांगों को अपने दोनों हाथों से पूरा चीरता हुआ मैं बोला।

वो फिर गनगना उठी, उनकी दोनों टांगों को ऊपर ले जाकर उनके घुटनों को उनकी चूचियों से लगा दिया उनकी टपकती चूत और गाण्ड बिल्कुल मेरे सामने खुले मैदान की तरह हो गई।
आह्हा… क्या करेगा …????? वो कराह उठी।

“तुमको पीना है….पर नीचे से…. ! मैं उनके कान में फुसफुसाया और ताजी चुदी गर्म चूत को अपने दोनों होंठों में भर लिया।

“हाय माँ…लुट गई मैं !” वो कराह उठी।

“चुप मादरचोद…. ! अभी तो तुझे सारी रात लुटना है…. ! कल से तू अपने को सोलह साल की समझेगी…ऐसा कर दूंगा तुझको… !”

मौसी और उत्तेजित हो उठी- ले साले…पी जा मेरी !

कमर उठा कर अपने हाथों से मेरा सर पकड़ कर चूत में घुसेड़ दिया।
नाक तक चूत में धंस गई मेरी। मैंने उनके रसभरे फूल को होंठों से दबा लिया, वो तड़पने लगी।

“अरे, अब जल्दी चूस चाट के चोद दे अपने पानी से मुझे सींच दे …. रा…जा…” वो नागिन सी कमर लहरा रही थी और मैं कमर को जकड़े घुटनों के बल बैठा चूत में मुँह डाले नमकीन पानी चाटता जा रहा था। मदहोश करने वाली चूत की महक मेरे नथुनों में घुस कर मेरे लण्ड तक पहुँच रही थी।

करीब पांच मिनट तक चूत का रस चूसने के बाद मैंने उनकी चूत को छोड़ा और एक तकिया उनकी कमर के नीचे रख दिया। गीली चूत और लण्ड को उनकी चड्डी से पौंछ कर फिर उनके मुँह में डाल दी।

वो ऊओं…ऊँ…कर उठी पर बेरहमी से मैंने सूखे लण्ड का तना सुपारा उनकी चूत की दोनों फांकों को एक हाथ से चौड़ा करते हुए बीच में फिट कर दिया।

उनके पैरों के ऊपर से जोर लगाते हुए इस बार करारा धक्का मारा, सूखे लण्ड ने चूत को कस कर रगड़ दिया और यह मुझे कसी और नई चूत को चोदने जैसा लगा।

मौसी की हालत बिन पानी के मछली जैसी हो गई। चूत के नीचे तकिया था सो दूसरे ठोकर में लण्ड ने मौसी की बच्चेदानी को स्पर्श किया। मौसी फिर धनुष हो गई …

इस बार चुदाई पंद्रह मिनट चली।

वो मचलती रही… सिसकती रही… ऊओं… गों… गों.. करती रहीं पर लण्ड को पूरा अन्दर लेती रहीं। उनकी टांगों में बहता पानी गवाह था कि वो पूरा मज़ा लूट रही थी।

बीच में एक बार झड़ी भी थी। आखिर वो समय आ गया, मेरी नसों का सारा खून एक जगह खींचता सा लगा, मैं बोल उठा- जान मेरा सब लूट लो आज ! लो मेरा गर्म पानी मेरी रानी…वाह…

मौसी को इसी का इन्तज़ार था जैसे !

अपने होंठों से उन्होंने मेरे होंठ भर लिए, टागें मेरी पीठ पर कस लीं.. मेरी पीठ को सहलाते हुए वो गीलेपन के उस एहसास को महसूस करने की कोशिश करने लगी जो बरसों के बाद उन्हें नसीब हुआ था।

मैं झड़ रहा था.. कतरा…कतरा… एक मादा के आगोश में…. एक ऐसे खुमार में जो उम्र और रिश्तों की हदों से परे था… सिर्फ उनके एक मदमस्त मादा होने का..

मेरी पहली चुदाई

बात बहुत पुरानी है लेकिन मेरी पहली चुदाई की है। इससे पहले मैं रात में अपनी चड्डी गन्दी करता था। फ़िर एक बार दोस्तों के साथ ब्लू फ़िल्म देखी थी.. तब भी हाथ से दबाने से ही मेरी लंड से बहुत सारा चिपचिपा गाढ़ा गाढ़ा सफ़ेद जूस निकल गया था..

तो दोस्तो, किस्सा इस तरह हुआ :

हम लोग पुणे में रहते थे, तब मैं हाई स्कूल में था। हमारे घर में एक नौकरानी थी जिसका नाम पूनम था और उसकी उम्र 30 साल थी फिगर 36-30-38 था। वह बहुत सेक्सी लगती थी पर उसका रंग सांवला था और चून्चियां तो ऐसी थी कि मेरे दोनों हाथों में एक भी ना आये और हमेशा ऐसा लगता था जैसे कहती हो- आओ मुझे चूसो ! प्यार करो, दबाओ !

उसकी शादी हो चुकी थी पर उसके कोई बच्चा नहीं था। मैं बहुत नासमझ, डरपोक और शर्मीला था।
एक दिन मैं स्कूल के दोस्तों के साथ जा रहा था तो दोस्तों ने कहा- एक पिक्चर लगी है ! देखोगे?
मैंने कहा- नहीं !

तो वो बोले- चल यार, किसी को पता नही चलेगा !

और वो मुझे “तेरी बाँहों में” दिखाने ले गए जोकि ब्लू लगून पर बनी थी। पिक्चर मुझे अच्छी लगी और मुझे
कुछ कुछ होने लगा मेरा लण्ड पैंट मे खड़ा हो गया। मैंने उसे ऊपर से दबाया और मसला तो पैंट में ही मेरा सब जूस निकल गया। मुझे बहुत शर्म आई, लेकिन मुझे अलग महसूस हुआ और मैं औरतों की तरफ़ खीचने लगा।
मेरे मकान मालिक की एक बेटी थी, नाम किरण था और वो मुझे अच्छी लगने लगी जोकि इन्टर में पढ़ती थी और मैं उसकी चून्चियों की तरफ़ ही देखता था। इसके बारे में अगली कहानी में लिखूंगा, अभी सिर्फ़ पूनम !
मैं हमेशा पूनम की तरफ़ नज़र बचा के देखता था पर एक दिन पूनम ने मुझे पकड़ लिया और कहा- क्या देख रहे हो संजू बाबा ?

तो मैं बोला कुछ नहीं। वो हँसी और कहा- आजकल गन्दी पिक्चर भी देखते हो और पैंट ख़राब करते हो..
मैं चुप रहा और वो अपना काम करने लगी। फिर मैं डर गया और उसकी तरफ़ भी नहीं देखता था।
एक बार वो घर में दो दिन तक नहीं आई तो मम्मी ने मुझे उसके घर भेजा पता करने के लिए ! मैं उसके घर पहुँचा और घंटी दबाई तो पूनम ने दरवाजा खोला।

देखता क्या हूँ कि वो सिर्फ़ पेटीकोट और ब्लाउज में थी। एक तो वो गरीब बाई थी और सेक्सी बहुत थी। उसका पेटीकोट सामने से फटा था जिसमें से उसकी झांटें साफ दिख रही थी। उसने तुरंत अपना पेटीकोट ऊपर खोंसा और मुझे अन्दर आने को कहा।

मैं अन्दर गया और पूछा- तुम आ क्यों नहीं रही हो?

वो बोली- कुछ नहीं, मेरा पति आया था और आज चला गया है, कल से आऊंगी।

तभी उसका पेटीकोट फिर गिर गया और वो शरमा गई। क्योंकि लगातार मेरी नज़र उसकी चूंची पर थी और वो काफी बड़े थे और उसमें से उसके निपल दिख रहे थे क्योंकि वो ब्रा नहीं पहने थी। उसने मुझे बिठाया और अन्दर चली गई और साड़ी पहन आई। मैं अभी भी उसकी चूची देख रहा था।

तभी वो बोली- कोई बात है क्या ?

मेरी मुँह से निकला- तुम्हारी टांगों के बीच इतने बाल क्यों हैं?

वो हड़बड़ाई और मुझे घूरने लगी। मैं घबरा गया और बाहर निकल आया। डर भी गया कि कहीं वो मम्मी से ना कह दे।

मैं शाम में उसके घर में गया और बेल बजाई। उसने दरवाज़ा खोला मुझे देख अन्दर बुलाया, बोली- क्या है ?
मैंने बोला- मैंने जो पूछा था उसे मम्मी से नहीं कहना ! तो वो बोली- कहूँगी !

मैं डर गया और रोने लगा। वो हँसने लगी, बोली- डरो नहीं ! नहीं बोलूंगी !

उसने मुझे बुलाया और बोली- तुम पिक्चर देखने गए थे तो कहा क्या ?

मैं उसे देखता रहा और उसने मेरे दोनों गालों को चूमा और बोली- कैसी लगी थी पिक्चर? तो मैंने कुछ नहीं कहा, तो मुस्कुरा कर बोली- कोई बात नहीं … बता तो दो !! फिर मेरे गाल को नोचा।

मैंने कहा- अच्छी थी ! पर कुछ समझ नहीं आई क्योंकि कुछ भी दिखा नहीं और दोस्त कह रहे थे कि ब्लू फ़िल्म है।

उसने मेरे चूतड़ पर थपकी दी और नोचा और कहा- अभी भी नहीं जानते हो कि उस पिक्चर में क्या था?
मैंने उसकी तरफ़ देखा और बाहर आ गया फिर घर चला आया।

अगले दिन मम्मी सुबह तैयार हो कर मौसी के यहाँ जाने लगी तो मुझसे बोली- पूनम जब आए तो बर्तन साफ करा लेना और खाना खा लेना।

छोटी बहिन स्कूल चली गई थी और भइया मुम्बई में थे। मैंने स्कूल की किताब निकाली और पढ़ने लगा। हमारे घर में बाहर छोटा सा बगीचा था और उसमें मैंने फूलों के पौधे लगाये थे और बकरियाँ उसे चर जाती थी।
तभी पूनम की आवाज़ आई- संजू जल्दी आओ ! मैंने बकरी पकड़ी है, गेट बंद करो !

मैं तेज़ी से आया और गेट बंद किया तो देखा बकरी के थन काफी नीचे लटके थे और पूनम बकरी को पकड़े थी। वो बकरी को पकड़ कर अन्दर ले आई और उसके मुँह पर कपड़ा बाँध दिया ताकि वो चिल्लाये नहीं, और मुझसे बोली- संजू यहाँ आओ !

फ़िर मुझसे बोली- मैं जरा बर्तन साफ कर लूँ !

मैं उसके पास गया और पूछने लगा- बकरी क्यों पकड़ी है?

तो मेरी ओर मुस्कुरा कर बोली- एक काम के लिए !

और मेरी नज़र उसकी चूची पर पड़ी और ठहर गई। उसने मेरी ओर देखा और साड़ी खिसका दी ताकि मुझे और साफ दिख सके।

मैं खड़ा रहा क्योंकि उसका ब्लाउज बगल से फटा था और उसमें से उसका बदन दिख रहा था। उसने जल्दी से काम खत्म किया और मुझे देख कर बोली- आओ !

और बकरी को पकड़ कर अन्दर कमरे में ले आई। फिर नीचे बैठ गई और बकरी के थन सहलाने लगी और बोली- दूध पियोगे ?

मैंने कहा- बकरी का ?

तो बोली- नहीं तो क्या मेरा !

फिर बकरी के थन चूसने लगी और बोली- लो अब तुम पियो !और मुझे गोद में बिठा कर दूध पिलाने लगी और मेरे गाल चूमने लगी। मुझे लगा कि जैसे मेरा लंड कड़क होकर टूट जाएगा क्योंकि वो एकदम खड़ा हो कर अन्दर मुड़ गया था। मुझे अच्छा लग रहा था।

उसने मुझसे पूछा- मजा आया?

मैंने कहा- हाँ !

फिर वो बोली- आओ अंदर चलें बेड पर !

मैंने कहा हाँ !

वहाँ उसने अपनी साड़ी उतार दी और ब्लाउज और पेटीकोट में मेरे सामने आ गई। मेरा लंड तन गया और मैं अपने लंड को दबाने लगा।

उसने कहा- क्या है ? लाओ मैं देखूं !

उसने मेरी पैंट उतार दी और अंडरवियर में से लंड को निकाल कर देखने लगी, धीरे धीरे सहलाने लगी। मेरे तो होश उड़ गए। फिर उसने मेरे लंड को मुँह में ले लिया और चूसने लगी।

मैं हैरान था और बोला- क्या कर रही हो?

वो बोली- तुम्हें पिक्चर समझा रही हूँ !

और उसने मेरे लंड को कस कस कर दबाया और बोली- मेरे भोले राजा ! बहुत घूरते हो औरतों को ? आज तुम्हारी हर इच्छा पूरी कर दूँगी !

और उसने मेरा हाथ अपनी बहुत बड़ी बड़ी चूंचियों पर रख लिया और मेरा लंड झटका खा गया। मैंने पहली बार किसी चूची को छुआ था। मैंने कस कर उसकी चूची पकड़ ली और दबाता चला गया। वो चिल्ला पड़ी- बस करो नहीं तो टूट जाएँगी !

मैंने उसकी चूची को ब्लाउज के ऊपर से चूसना शुरू किया तो बोली- ब्लाउज तो उतार लो ! मैंने एक एक कर के बटन खोले और जैसे मेरे सामने दोनों दूद्दू खुले, मैं उससे चिपक गया। मेरा लंड उसके फटे हुए पेटीकोट के अन्दर था और उसकी बुर को छू रहा था। उसने मेरा हाथ अपनी दोनों चूचियों पर रखा और बोली- लो मेरा दूध पियो !

और मैं चालू हो गया, एक एक कर के दोनों को चूसने लगा। आधे घंटे चूसने-चाटने के बाद वो बोली- बस करो ! क्या खा ही जाओगे !

मैं रूका, उसने अपना पेटीकोट उतारा और मुझे अपनी बुर दिखाई और बोली- कभी देखी है ?
मैंने कहा- नहीं !

तो बोली- लो इसको चाटो !

मैंने तुरंत उस पर अपनी जबान रखी और चाटने लगा तो उसके झांटे मेरे मुँह में जाने लगी तो मैंने कहा- इसे साफ तो करो !

उसने पापा का शेविंग बॉक्स लाने को कहा। मैंने पहले कैंची से उसकी झान्ट को छोटा किया और फ़िर साबुन का झाग बने ब्रश से झाग बनाया और फ़िर एक रेज़र से सारे बाल साफ कर दिए। उसकी चूत एकदम गुलाबी हो गई, थोड़ा सांवला रंग था लेकिन चूत की जगह एकदम गोरी थी क्योंकि वो जगह बालों से ढकी थी। मैंने वहाँ हाथ फेरा, वो सी सी करने लगी।

यह मेरा पहला अनुभव था, उसकी चूत में से थोड़ा थोड़ा कुछ पानी जैसा निकल रहा था। मैंने हाथ लगाया, वो चिपचिपा था। अब उसकी आंखें भी बंद थी और मुझे भी मजा आ रहा था क्योंकि मैंने तो पहली बार ऐसा किया था।

अब उसने कहा- साले, मेरी चूत को चाट.. !
उसकी गाली सुन कर मैं तो हैरान हो गया.. लेकिन मुझे मज़ा आया। मैंने उसकी चूत में अपना मुँह लगाया, मै उसकी बुर को चाटता रहा उसने मुझे 69 अवस्था में लिया और मेरा लंड चूसने लगी। 5 मिनट में मेरा जूस निकलने लगा। यह मेरा पहली बार था। मै तो डर गया कि यह क्या हो रहा है।

मैंने कहा- पूनम, मुझे कुछ हो रहा है !

तो बोली- क्या हो रहा है?

मैंने कहा- मेरे लंड से कुछ निकलेगा ! शायद पेशाब !

उसने कहा- कोई बात नहीं ! मेरे मुँह में होने दे ! तू अपना काम करता रह !

तभी मैंने कहा- मुझे दूद्ध पीना है !

वो बोली- आज से जब मन चाहे दूध पियो ! मैं नहीं रोकूंगी !

मैंने कहा-ठीक है।

लेकिन तब तक मेरा जूस उसके मुँह में निकल चुका था…

मुझे ऐसा लगा कि मेरे लंड से पिचकारी निकल रही है। उसने लंड का सुपारा अपने जीभ पर रखा था, लंड का फव्वारा उसके सर तक गया। जब पिचकारी खत्म हुई तो उसने लंड को मुँह में ले लिया और चूसने और चाटने लगी। फ़िर बोली- संजू, तू तो बहुत मजबूत है ! तेरा पहली बार है न, इसलिए जल्दी निकल गया ! तू लम्बी रेस का घोड़ा है !

अब मैं भी सीधा हो कर लेट गया। उसने मेरे होठों को चूमा, मैं भी उसे चूमने लगा और चूमते हुए उसकी चूची तक आया। फ़िर उसके दूध पर दांत गड़ा दिए।

वो चिल्ला पड़ी- मत करो ! लगता है ! फिर बोली- क्या मुझे चोदना चाहते हो ?

मैंने कहा- यह कैसे होता है?

बोली- जब इतना सिखा दिया है तो वो भी सिखा दूँगी मेरे राजा ! और उसने मुझे कहा- जब मैं कहूं तो अपना लौड़ा मेरी बुर में डाल देना।

उसने मुझे अपने ऊपर से हटाया और उठ कर ठीक से लेट गई। मुझसे कहा- ये दो तकिये मेरे गांड के नीचे रखो ! अपनी गांड उठाते हुए उसने जगह बनाई।

मैंने देखा- उसकी गांड भी करारी थी।

अब उसने मेरे लण्ड को फ़िर से सहलाना शुरू किया। वो फ़िर सख्त होने लगा। आज मैंने देखा कि उसकी लम्बाई और मोटाई कुछ ज्यादा ही लग रही थी और बड़े ही जोर से फनफना रहा था। उसने मेरा एक हाथ अपने टांगों के बीच चिकनी हो गई चूत पर रखा, पूरी गीली थी, उसने अपने दाने पर मेरा हाथ लगाया और कहा- इसको थोड़ा रगड़ !

फ़िर वो ख़ुद मेरे लंड को चाटने लगी। बीच बीच में होठों में चूसती भी थी। वो कहने लगी- संजू, इतनी सी उमर में इतना लंबा और मोटा लण्ड है तेरा ! जिस कुंवारी लड़की को चोदेगा, उसकी चूत का तो सत्यानाश हो जाएगा। मुझे तो लगता है मेरी चूत भी नहीं सहन कर पायेगी इसको ! मेरी चूत भी मेरे मरद के पतले और नुन्नी जैसे लंड से चुदती है। लेकिन मैं कितना भी चिल्लाऊँ, तू रुकना मत अन्दर डाल के ! बिल्कुल बेरहमी से चोदना और दनादन धक्का लगना !

बस फिर क्या था, उसकी चूत भी तैयार हो गई थी लेकिन फ़िर भी हम क़रीब 15 मिनट तक और चूमा चाटी करते रहे। उसकी चूत से जूस बह कर गांड की तरफ़ जा रहा था। उसने मुझे अपने पैर फैला के ऊपर उठाते हुए उसके बीच में आने को कहा। मैं घुटने मोड़ कर वह बैठ गया। गांड के नीचे तकिया होने से चूत ऊपर उठ गई थी और उसका मुँह भी थोड़ा खुल गया था जिसमें से अन्दर की लाली दिख रही थी।

उसने अपनी चूत को थोड़ा और आगे खिसकाया और अपने हाथ से मेरे लंड को पकड़ कर चूत के ऊपर घिसने लगी। उसने मुझसे कहा- यह तो कोई मुश्किल नहीं है ना?

लेकिन उसकी चूत के छोटे से छेद में मुझे लंड डालना है, यह सोच कर मैं परेशान था।
इसी तरह घिसने के बाद उसने छेद पर लंड को लगाया फिर उसने मुझे खींचा और मेरे लंड को बुर पर रखा और इशारा किया। मैंने जैसे ही धक्का मारा, वो चिल्ला पड़ी। मैंने उसके होटों पर कब्जा किया और धक्के पर धक्का मारता रहा। लंड फिसलता हुआ अन्दर जा रहा था।

पूनम अपने चूतड़ उछाल-उछाल कर चीख रही थी- अह्ह्ह.. शी शी शी..उफ़ …उफ़.. गऊ ऊ , गा आ आ आ आ, उ .ऊऊ.ऊ.उ.., अआया.अ.आह.ह.हह…हह.ह. ह.हह.., मेरे रे र ऐ राजा , मेरे यार मेरे प्यारे ..क्या मूसल जैसा लंड है.. और .. चोदो मुझे मेरी चूत को फाड़ डालो .. मुझे. माँ.बना.. ..दो. अपने बच्चे की .. माँ ! मेरे मरद के लौड़े मे ताकत ही नहीं है..आह्ह..

मैंने पूछा- वो भी ऐसे ही चोदता है क्या?

अरे नहीं मेरे राजा .. वो होता तो अभी उसका पानी निकल जाता .. मुझे रेत डालो मुझे चूस डालो .. मसल दो मुझे .. मेरी जवानी बेकार हो रही थी .. मुझे चोदो… और जोर से.. पूरा लंड अन्दर तक डालो.. अच्छा लगता है जब इसका सुपारा मेरी बच्चेदानी को दबाता है, आह्ह्ह..दर्द हो रहा…रुको नहीं … मारो..मेरी चूंची को मसलो ..घुंडी को मुँह मे ले कर चूसो..

वो जैसा कह रही थी, मैं वैसा ही कर रहा था।

अहह हह.ह.हह.हह.हह. लग.. रहा. ..हैईईईईइ.., और. करो. ना…. मुझे आज गाभन कर दो..मेरे पेट मे तेरा बच्चा डाल दे संजू..

मैंने एक हाथ उसकी गांड के नीचे डाला और उछलती हुई गांड में मैंने ऊँगली कर दी..

उईईई …तुझे मेरी गांड भी दूंगी मेरे राज्जा…वो कुंवारी है.. मेरे मरद ने कोशिश की लेकिन उसका लंड कमजोर है अन्दर ही नहीं गया.. तेरा मोटा..और लंबा भी है.. साथ में लोहे जैसा सख्त.. तू जरुर मेरी गांड फाड़ देगा.. तूने तो चूत भी फाड़ दी है मेरी.. आह्ह..रंडी बना दो मेरी गांड मार लो मेरा मुहँ काला कर दो ….मेरी… इज़्ज़त… लूट… लो…

और न जाने क्या क्या चिल्लाती रही। मेरा लंड पिस्टन जैसा अन्दर बाहर हो रहा था.. बीच में तीन बार वो झड़ गई.. मुझे चिपटा लिया। उसके झड़ने से चूत और चिकनी हो गई थी। क़रीब 45 मिनट बाद मेरा लंड झड़ने लगा और लंड मैंने पूरी गहराई में डाल दिया। मै एकदम थक सा गया था, मैंने उसकी बुर में ही सब निकाल दिया। वो भी थक गई थी, बोली- मज़ा आ गया राजा, इस चुदाई को याद रखूंगी, तुमने तो मेरी जवानी खिला दी, बहुत बड़ा लंड रखे हो कहाँ छुपा रखा था ?

मैंने कहा- पूनम, क्या यही चुदाई है?

बोली- हाँ राजा ! तुमने अपनी पूनम रानी को चोद दिया . अब तुम जहाँ बोलो, जब बोलो मैं चुदवाउंगी .

और फिर एक बार मैंने उसकी चूची को चूसा फिर मेरा खड़ा हो गया। इस बार पूनम ने मुझे नीचे लेटने को कहा और मेरे ऊपर चढ़ कर उसने अपने हाथ से लंड को अपनी चूत में डाला। लेकिन जैसे ही उसने अपनी गांड मेरे लंड पर दबाई तो फ़िर से चीख पड़ी- अईई..मर गई.. आह्ह..आह..

ऐसा करते हुए उसने गांड ऊपर नीचे करना शुरू किया। क़रीब 20 मिनट करने के बाद मैंने उसे पकड़ के अपने नीचे ले लिया था और मैं फिर पूनम पर चढ़ गया और उसे पेलने लगा। वो मना कर रही थी, कह रही थी- बहुत दर्द हो रहा है..

असल में वो फ़िर से दो बार झड़ गई थी। पर मैं नहीं माना और जब मैं फिर झड़ा तो वो बोली- राजा तुम तो बड़े वो हो? मेरे मना करने पर भी मेरी चूत को चोद दिया। मैं तो तुम्हें बच्चा समझ रही थी, तुम तो बड़े चोदू निकले ?

और वह मेरे लंड को चाटने लगी। मैंने कहा- मुझे पेशाब आई है।

वो बोली- चलो करा दूँ !

वहाँ उसने मेरा सारा पेशाब मुँह में लेकर पी लिया और बोली- चलो आज ही तुम्हें चोदना सिखा दिया। अब तुम मेरी कुंवारी गांड मार लो !

मैंने कहा- यह क्या होता है?

उसने अपना चूतड़ मुझे दिखाया और बोली- यह छोटा सा छेद जिसमें तुम ऊँगली डाल रहे थे, इसे गांड कहते हैं। मगर इसे मारने में दर्द होगा।

मैंने उसकी गांड पर हाथ मारा- लो मार दी !

वो हँसने लगी और मेरे होटों को चूसते हुए बोली- मेरे संजू राजा जी ! इसमें अपना लंड तो डालिये, जैसे मेरी चूत में डाला था।

मैंने जब यह सुना तो बिना सोचे समझे उसकी गांड के छेद पर लंड को टिकाया और दबाने लगा। गांड थोड़ी गीली थी क्योंकि उसकी चूत का जूस और मेरे लंड की मलाई बह कर गांड तक आ गई थी इसलिए थोड़ा सा सुपारा अन्दर घुसा

मैंने और धक्का मारा, वो चिल्लाई- राजा पहले तेल तो लगाओ नहीं तो मुझे बहुत दर्द होगा और यह मोटा लंड अन्दर जाएगा भी नहीं !

मैंने कहा- तो तुम ले आओ तेल !

वो उठी और नंगी ही तेल लेने गई। उसके मोटे चूतड़ ऐसे हिल रहे थे कि मेरा दिमाग हिल गया। मैंने दौड़ कर उसे पीछे से पकड़ लिया और आँगन में ही उसे कुतिया बना कर उसके हाथ से तेल लिया और अपने लंड पर और उसकी गांड पर तेल लगाया और उसकी गांड पर लंड रख दिया।

वो बोली- अन्दर चलो !

पर मैं नहीं माना और धक्का मार दिया, जरा सा अन्दर गया था कि वो चीख उठी- ..अरे मार डाला रे.. आह्ह्ह मेरी माँ… मेरी गांड फट जायेगी.. निकालो..बाहर निकालो..

और वो रोने लगी- नहीं डालो ! दर्द हो रहा है !

मैंने पूछा- क्या पहली बार है ?

वो बोली- हाँ मैंने सुना था कि दीदी जीजा से गांड मरवाती है, मैं भी अपने पति से मरवाना चाहती थी लेकिन उसका लंड तो एकदम मरियल है। पहली रात में उसका लंड मेरी चूत में ही नहीं घुस रहा था। घुसने के पहले दो बार बाहर ही पानी निकल गया था। इसलिए मैंने उससे गांड मरवाने का कोई इरादा नहीं किया, लेकिन आज तुम्हारे इस मूसल और लोहे जैसे सख्त लंड को देख कर मेरी फ़िर से इच्छा हो रही थी इसलिए तुमसे कहा। पर तुम्हारे इस मोटे लंड से इतना दर्द हो रहा है, मैं सहन करना चाहती हूँ पर बहुत दर्द हो रहा है ! मत करो ..

तो मैंने कहा- हो सकता है अभी दर्द हो बाद में नहीं ! और मज़ा भी बहुत आये..?

वो बोली- ठीक है, जो चाहे करो ! मारो मेरी गांड राजा जी, आपकी ही चीज़ है जैसे चाहे इस्तेमाल करो !
मैंने दूसरा धक्का लगाया, वो चिल्लाई ! फिर तीसरा ..जो कि जबरदस्त था और पूरा 8″ लंड फ़चाक की आवाज़ के साथ अन्दर !

मेरे गोटे उसके चूतड़ से टकराए, मैंने हाथ बढ़ा कर उसकी नीचे लटकी चून्चियाँ पीछे से पकड़ ली और फ़िर मैंने मारा धक्के पे धक्का !

वोह चिल्लाती रही- बस कर ! फट गई मादरचोद .. बेहनचोद. ..बेटिचोद.. मार… डाला… अब… रहने… दो…. मत. करो… मार… डालोगे…

और न जाने क्या क्या बोलती रही।

मैंने देखा कि मेरे लंड पर खून लग गया था। उसकी गांड सच में फट गई थी लेकिन मैं रुकने की हालत में नहीं था.. वो रोक रही थी.. पर मैं नहीं माना..

अब मैंने उसकी चूत में ऊँगली डाल दी और चूत को ऊँगली से चोदने लगा।

वो आह्ह..उह्ह .. कर रही थी। मैंने लंड आधा निकाला..और बचा हुआ तेल उस पर डाला.. इससे लंड अब आराम से अन्दर जाने लगा.. इधर उसकी चूत भी ऊँगली से चुदवा रही थी.. और 15 मिनट में वो मज़ा लेने लगी उसका दर्द कम हो गया था… कुतिया जैसे उछलने लगी, गाना गा रही थी- गांड मारे सैयां हमार ! मोटे से लौड़े पे खून लाल लाल ! गांड मारे सैयां हमार

और भी अजीब अजीब हरकत कर रही थी और उसकी चूत झड़ गई..

मैंने भी अब स्पीड बढ़ा दी.. लेकिन मेरा लंड झड़ने का नाम नहीं ले रहा था। क़रीब आधे घंटे गांड मारने के बाद मुझे लगा कि मेरा लंड झड़ने वाला है और 8-10 धक्के जोर से लगाने के बाद पूरा लंड अन्दर डाल कर मैं झड़ गया..

तो वो बोली- राजा जी, आज तो मैं फ़िर से जवान हो गई ! मज़ा आ गया है ! दिलखुश हो गया !
मैंने भी कहा- मुझे भी बहुत मजा आया !

मैंने उसकी गांड से लंड बाहर निकाला, उस पर खून लगा हुआ था। और जैसे ही बाहर खींचा..पक की आवाज़ हुई और मैंने देखा कि उसकी गांड खुली ही रही अंग्रेज़ी के O जैसे

और उसमें से मेरी मलाई बाहर निकलने लगी थी ..

हम दोनों ने बाथरूम में साफ किया और कमरे में आ गए और वैसे ही नंगे सो गए। क़रीब एक घंटे के बाद वो उठी। मेरी मम्मी के आने का वक्त हो गया था।

उसने कहा- संजू राजा .. आज तो तुम भी जवान हो के मर्द बन गए हो..

मैंने उसे फ़िर से चोदने के लिए कहा।

उसने कहा- आज नहीं ! बहुत दर्द कर रहा है ! बाद में ..

मेरी मम्मी ने आने के बाद कहा कि कल वो मौसी के साथ नासिक जाने वाली हैं। पूनम को कुछ काम समझाया और मुझे कुछ हिदायत दी।

तब पूनम ने मुझसे कहा- मेरे राजा, कल और मौका है !

दूसरे दिन की चुदाई तो घमासान थी..

वो फ़िर कभी ! क्योंकि उस चुदाई के बाद पूनम दो दिन काम पर नहीं आई थी..

और मैं जब उसके घर गया था तो उसने मुझे अपनी फूली हुई चूत दिखा कर कहा था- तुमने क्या हालत की है मेरी.. देख लो मुझसे चला भी नहीं जाता..

लेकिन बाद में वो काम पर आई..

तो दोस्तो और ऐसे मैंने पहली चुदाई की जो मेरी सेक्सी पूनम ने सिखाई..

बाद में मैं उसे दो साल तक चोदता रहा और उसे आज बच्चा भी है जो मेरा है उसकी आंखें और नाक मेरे से मिलते हैं और वो बहुत खुश है, मुझसे वो अपने घर बुला कर भी चुदवाती थी

Simran with maid’s husband

Simran hesitated just for an instant before pulling her panty down and stepping out of it fully nude. She was still in her dressing room. She had read about the benefits of massage in a number of newspapers and journals but could perhaps never muster the courage to go to a parlour. All sorts of doubts would appear to cloud her mind. How could she strip fully before complete strangers! And if the masseuse turned out to be a man! God! She would certainly die due to sheer embarrassment. And if she insisted on having a lady to do the job, perhaps the parlour owners would smirk at her prudishness.

However when her maid servant Lakshmi had once mentioned that she too had lived in Kerala and had picked up that art, Simran decided that the time had come to indulge in what she had been wanting to do for so long. For the lady to be seen nude by a maid servant was, well, natural. The only thing was the initial hesitation because till now Simran had only been topless in front of Lakshmi and that too only once. The admiration that was reflected in Lakshmi’s eyes at that time was not lost on Simran. So when she broached the topic of getting herself massaged by Lakshmi, her response was more than enthusiastic.

Lakshmi and her husband Bhavdeep had been with them for almost one year. While Bhavdeep worked as a driver, Lakshmi looked after the kitchen and whatever sundry work was assigned to her. Lakshmi was dark and in her early thirties whereas Bhavdeep, though of a similar age was fairer and looked slightly younger. In fact so fair was his complexion that an ignorant visitor could have been excused for assuming that he was a member of the family.

At 26, Simran had a body that would give many established models a run for their money. Generous and firm 34 B size breasts complimented her 5 feet 7 inches body that was tall by Indian standards. Before stepping out from the dressing room she permitted herself some vanity and admired her nude self. The slender neck, the flawless satin skin, the shapely breasts capped by chocolatish brown nipples with small aerola, the sparse hair in the shaped pussy which did not do much to hide the lips of the labia, the long and lovely legs and the nail polished bare feet. There was a long and black beauty spot not unlike the shape of a heart, that was situated at the top of her right thigh. It had been a matter of some consolation to Simran that the mark was situated so high that it would be visible only if she went nude and the chances of that were remote. Her nude body was a sight that could have stopped anyone in his tracks. A light golden chain in the neck, appropriately designed bangles on her wrists and a cute pair of anklets only served to accentuate her well toned body.

A suitable mat had been spread on the floor. Lakshmi had locked the door and was waiting for Simran with a bottle of oil in her hand.. This bottle had been purchased by Simran herself with the fond hope that someday she would be making use of it. That day had finally arrived.

She finally took a deep breath and stepped out of the dressing room. She was feeling very self conscious but had braced herself by telling her own self that if she wanted a massage she had to strip, so it was best to act confident. As Lakshmi saw her Mem Sahib nude for the first time, she just stood mesmerised. If she had found Simran to be beautiful from above the waist, she was absolutely gorgeous from below the waist. Lakshmi also noted that Simran had recently got her belly button pierced and a dainty golden ring there, despite its small size was arousing tremendous passion in whosoever beheld that sight. Lakshmi was fully aware of the employer/employee relations between herself and Simran but she couldn’t help thinking that if the sight of Simran’s nude body could have such a powerful impact on her, what impact would it have on a male?

Simran acted nonchalant as if this was not at all a big deal for her. She closed her eyes, took a deep breath and lay there ready for Lakshmi to start. The first touch made her jump but she soon relaxed as Lakshmi poured warm oil over her back. The smoothing of the oil on her body was delicious, the firm yet soft hands soothing her, first her shoulders, arms then lower back and when her buttocks trembled slightly under Lakshmi’s touch she felt a sense of letting go… almost a submission to her maid.

‘Mem Sahib. may I say something?’ Lakshmi asked.

‘Yes.’ Simran answered.

‘You are very beautiful.’ Lakshmi said in a husky tone. After all, it was not everyday that one got to work with a beautiful lady and it was even rarer to see her nude.

‘Hmm.’she mumbled not knowing how exactly to respond to a compliment being paid by a maid.

‘Mem Sahib. You are so hairless here. Just this little line of vertical hair looks very pretty.’ Lakshmi carried on pointing to Simran’s shaped pussy with her eyebrows. ‘Sahib must be very happy to see you that you put in so much effort to give it such a proper shape.’

Simran felt that the most appropriate response would be to keep quiet. She felt that Lakshmi was overstepping her limits but the compliments were such that she was actually enjoying listening to them. Her legs and feet were coated with the oil and Simran’s body felt so relaxed….so out of her control… that when Lakshmi parted her legs to coat her inner thighs, she moaned softly and felt a familiar wetness beginning to form in her most sensitive spot between her thighs.

‘Mem Sahib. This dark spot that you have right here is very beautiful’ Lakshmi said running her slick fingers over the smooth skin on the inner thigh. Simran knew that in the state of nudity,the spot would be so visible that it would definitely be noticed. ‘Even Bhavdeep has a similar spot.’ Lakshmi continued.

‘Where?’ Simran asked sleepily and regretted it almost immediately. The massage had had a twin impact on her: she had started feeling drowsy and aroused at the same time.

‘Very close to where you have it. It is long and carries on upto where his……. starts.’ Lakshmi said blushing furiously.

Even Simran was blushing. It felt odd to be discussing birthmarks of the maid’s husband situated in private parts. Despite that she felt a tingling in the lips of her pussy and immediately dismissed all erotic thoughts. How could she feel aroused thinking about a maid’s husband?

For a moment the feeling of embarrassment persisted and then faded away. So she relaxed, not bothering to close her legs when Lakshmi had coated them and, with the oil on her body, she couldn’t tell what was oil and what was her body’s reaction to the hands that stroked her. However, she dreamily thought that it was good that Lakshmi is so adept at her job and it was such a pleasure to be treated like a queen. Lakshmi smiled down at Simran’s naked body lying on the table before her and admired the gleaming skin. It had shades of a beautiful golden brown all over except for the pink undersides of her feet.

Everything appeared to be going dreamily when Simran heard loud noises outside. What on earth could have been going on, she wondered. The voices were that of her husband and he appeared to be very angry.

‘Lakhmi, I must go and see. Amit appears to be very upset.’ Simran said.

‘Okay, Mem Sahib. As you say.’ Lakshmi said winding up the massage by rubbing the remaining oil in Simran’s body by gently pulling her buttock cheeks apart and rubbing her oily fingers in the crack. For a fraction of a second they lingered on teasingly at the entry of her ass and then it was over.

Simran hurriedly put on the gown that she had discarded over her body and emerged from the room.. She was quite perturbed and it did not bother her that her ample cleavage could be seen. With Lakshmi close on her heels she proceeded towards the place from where the voice was emanating and were just in time to hear the sound of a resounding slap. Both Simran and Lakshmi were aghast to see that the recipient of the slap was none other than Lakshmi’s husband Bhavdeep.

‘What is going on here?’ Simran asked no one in particular.

‘Ask this man. He is so thankless. We have employed both of them. Not only is he not sincere he answers back.’ Amit bellowed.

Bhavdeep stood transfixed to the ground and did not utter a single word.

‘Whatever the case may be you should learn to keep your temper under control.’ Simran spoke to her husband. She somehow felt bad at this crass display of crude power by her husband and that too in front of Lakshmi. What would a wife feel when she saw her husband being slapped!

‘I am fed up. You also lecture me.’ Amit spoke in an exasperated tone and marched out of the room..

Simran felt like consoling Bhavdeep and just as she approached him, she became conscious that her robe had just been tied with a cord and that under the robe she was completely nude. Her bare legs could be seen through the slit in the gown just as her cleavage. As she was becoming conscious of her state and was contemplating withdrawing, her eyes met that of Bhavdeep. She expected to find a feeling of hurt; instead she found a lusty feeling, a desire that was at the same time scary and endearing. By way of reflex action, Simran looked down at her feet and turning around swiftly walked to the privacy of her room. Somehow she felt a trifle disturbed. What disturbed her even more was that she did not feel contempt for the husband of her maid. This is preposterous, she told herself as she looked at herself in the mirror. Her skin was glowing from the massage and it was hardly Bhavdeep’s fault that he had forgotten all about the insults heaped on him by her husband. Simran shuddered, and peeled off the gown over her slender shoulders. For a while she looked at her bare self in the mirror. As she saw her own birthmark hidden so tastefully by nature, she recalled what Lakshmi had told her about a similar mark’s existence on Bhavdeep’s cock. Even within the solitary confines of her room, Simran blushed and went to the bathroom for a shower.

That night Amit returned very late and was too tired and drunk to do anything. Simran wanted to speak to him but found that there was no point in trying. She expected Lakshmi to be sulking the next day but was pleasantly surprised to find that she was present in the house, in time. Simran was wearing the same gown that she had worn the previous evening. It was a gown that she was very fond of and although her mother-in-law had once or twice made disparaging comments about the fact that it revealed more than it hid, it was still a favourite of Simran.

‘I am sorry about yesterday.’she said in a small voice.

‘Why, Mem Sahib?’ Lakshmi appeared to be quite normal.

‘I mean Amit did not really behave the way he should have.’ Simran elaborated.

‘Oh, that. It is okay Mem Sahib. Bhavdeep is a very nice person. He likes Sahib a lot.’ Lakshmi said. ‘And you too.’ She added.

‘What?’ Simran was surprised.

‘Nothing, Mem Sahib. And you won’t believe what happened. At night, I told him that you are really beautiful and that you too have a birth mark like he does. He asked me how did I know and I told him that I had massaged you, that was how.’ Lakshmi said excitedly.

‘You told him that you had seen me nude?’ Simran was aghast.

‘Yes, Mem Sahib. What is wrong? I am a woman and I thought that it was perfectly okay to tell him that I had seen you nude. Did I do something wrong?’ Lakshmi asked innocently.

Simran did not know as to how to explain things to Lakshmi. First she goes and tells her husband that she has seen Mem Sahib nude, then she also tells him that he and Mem Sahib have a similar birthmark and that too in their private parts.

‘Nothing wrong. But what is the need to say such things?’ Simran said absent mindedly.

The day passed uneventfully. Amit was grumpy all throughout. He hardly had anything for breakfast and was busy throughout the day. He had taken another driver and Bhavdeep was left behind. Lakshmi too therefore went early but returned after two hours saying that since Bhavdeep had gone away because of some important work, she did not know what to do.

That night Simran wanted to please Amit, so she put on her sexiest nightie. It was a peach coloured one brought by Amit from one of his sojourns abroad. She applied erotic perfume on her pussy and underarms and on the back of her knees before wearing a diaphanous bra and G string panty which left little for the viewer’s imagination. She put on a dainty pair of silver anklets which were just right for a nice round of lovemaking, subtle enough to highlight Simran’s feminity. Tastefully applied nailpolish on her toes and hands made her look absolutely ravishing.

Amit did arrive at around 11 at night. He had to attend a party with some colleagues and did not appear to be in the best mood. However seeing his wife in such a lovely attire did lift his spirits a little. He went to the bathroom for a shower and by the time he returned, Simran had slid between the cold and crisp white sheets in anticipation of what should have followed.

Just as Amit was easing himself into the bed there was a sound from the drawing room. This appeared to be strange. The servants lived in the outhouse and there was no reason for anybody’s presence in the house. It could perhaps have been a cat or a mouse. This suspense lasted for barely a minute when Simran was appalled to see a well built man in a mask intruding into the bedroom. Simran was almost nude but thankfully in the bed.. The mask was black in colour and hid the entire face except for the eyes and the lips. He was armed with a revolver.

‘Come to the drawing room. Both of you.’ He said, his voice a menacing whisper.

‘I, well……….’ Simran stammered.

‘Out of the bed. Now.’ he said, his voice absolutely cold. Simran looked at Amit but he offered no advice. Not because he didn’t want to but he did not appear to be in a position to do so. Seeing that there was absolutely no alternative, Simran got out of the bed and saw the pupils of the intruder’s eyes widen as they drank in the sight of her body through the transparent nightie. Somehow they did not seem to be unfamiliar. Neither Amit nor Simran had any choice; so they meekly followed him, both of them too scared to do anything but obey. The fear in the living room was thick and palpable as Amit was made to sit meekly on a straight chair. Amit tried to assert himself but after a hectic day and the liberal pegs of whiskey he was in no position to take on the intruder. He was tied down firmly with a plastic rope brought by the intruder who also slammed down a handkerchief suffused with something on Amit’s mouth which made him even more drowsy within no time. The intruder had obviously done his homework. What exactly he had in mind was beyond Simran. She was however feeling very awkward at being so scantily clad in front of the man.

‘Now take this nightie off nice and slow. Please’ The man’s voice was a whisper. Simran bit her lip as she looked over at her husband and knew she had very little choice in the matter so she hesitantly took off her necklace Amit given her as a birthday present and dropped it on the floor.

‘I’ll do whatever you say if you let us go and promise not to hurt me or my husband,’ Simran said, tears falling down her cheeks.

‘Come on, please be quick. We assure you that if you behave you won’t be hurt.!’ The man commanded, his eyes blazing with lust. Simran felt her face flush self-conciously as she tentatively, almost seductively, took her beautiful nightie off. The hungry look in his eyes made her try to cover her glorious bra-covered C-sized breasts, but thought better of it and pulled them away and unhooked her bra, dropping it to the floor. Her breasts felt nice and free in the open air and her brownish nipples were hard, like bullets from the fear and cold. One thing many guys found attractive about her was the fact her breasts stuck out and didn’t bounce as much as most women’s did. The only problem was most people that had seen her breasts (which wasn’t very many, only other girls), thought that this meant that she undergone some expensive surgery, which wasn’t true. As Simran stepped out of the nightie leaving it crumpled on the floor, she felt an odd sensation enter her body. She couldn’t describe it beyond knowing that this man, besides her husband, was perhaps the only one who was seeing her virtually nude.

‘I did what you said. Please take what you want and let us be.’ Simran said, afraid that he would force her to take her panties off as well.

‘Not quite yet,’ The man said as he came up to her with a wide cruel smirk. He took the initiative in pulling her lace panties down right to her bare feet exposing her beautifully shaped pussy. It was his casual demeanour that Simran found chilling.

‘Look, this is nothing personal, but it is a fantasy of all rich persons to see their wives have pleasure. All sorts of pleasure.’

‘W..what does that mean?’ Simran asked suddenly terrified.

‘Don’t be afraid.’ He said almost patronizingly. ‘I am sure you know how pretty you are. Surely this beauty needs to be shared with persons who are not as fortunate as he is.’ He said pointing towards Amit.

‘Please, please…….’ Simran burst into tears.

‘You somehow think that I want to hurt you. Not if you cooperate. You,’ he said addressing Amit. ‘Tell her to co-operate and enjoy; if you do not want to get seriously hurt.’

He was so much in command of the situation that he kept the revolver on one side and stepped out of his trouser. He wore no underwear and out sprang an uncircumcised cock that was surprisingly fair and well built. Simran had always imagined that the burglars were always the dark skinned ones but this was to her, even in that state of terror, a surprise. The head looked like a helmet, oozing white stuff that she knew had to be precum. It was the raw power behind it that truly frightened her.

‘Please don’t do this to us. If it is money that you are after, we are prepared to let you have whatever you want.’Simran said. Simran’s please seemed to have no effect on him, rather it seemed that he was getting a kick out of her discomfiture. Looking over at her husband, still in bondage, Simran was horrified to notice he was now recovering from the effects of the tranquillizer that he had smelt.

‘Please don’t force me to be rough with you. Surely you realize that I can get what I want by being nasty. If that is what you want, so be it. Should I start by breaking his teeth?’ he said in a matter of fact manner while proceeding to switch off the light. ‘It won’t do for others to wonder as to why the light in the room is on at this time of the night but the light that is coming in from your bedroom should keep us going nicely. Now, you well, what does a girl do when she sees a cock? Obviously sucks it. So do it. But wait, I think I need to do you a favour.’

The man knelt between her legs rubbing his own cock which had assumed a full throbbing erection by then. ‘That’s nice, God I wish I had a camera at a time like this.’ He laughed quietly at the possible humiliation she would feel. Then he leaned in on her and with one hand squeezed her breasts. He took the other hand to his mouth and put one finger inside it. Once it was properly wet and dripping from his saliva he began sliding it in and out of Simran’s pussy.. Just up to the knuckle to get her wet, but she was already wet and he worked in the whole finger and started fucking her with it the other hand teasing her nipples. She closed her eyes and rolled her head back trying to ignore what he was doing to her, but Amit could see Simran bite her lip and start to hump back. He worked in a second finger and got a bit more energetic and she turned her head left and the right taking deep breaths. When he started thumbing her clit at the same time she lost it. No longer could she control what her body was going through. Her chest heaved and both her husband and the intruder saw the ripples run down her abdomen with each contraction. Her thigh twitched and her whole body shook with the power of her orgasm. Before she could think, the man was leaning down on top of her. She could feel his hard-on against her belly and knew it would be inside soon. He worked it against her skin to get used to her body and began searching for her wet pussy. This was not the way she wanted this to happen. She had to stall him somehow.

और अन्त समय आ गया था

बात उन दिनों की है जब मेरा दाखिला कॉलेज में हुआ ही था। भैया अधिकतर काम के सिलसिले में बाहर ही रहते थे। उन्होंने अपने पास मुझे शहर में बुला लिया था। उनके आये दिन बाहर रहने से भाभी बहुत परेशान रहने लगी थी। ऐसे में वो मेरा साथ पाकर खुश हो गई थी।

भाभी को रात को सोते में बड़बड़ाने की आदत थी। कभी कभी तो वो रात को उठ कर चलने भी लगती थी। भैया भी इसकी वजह से बहुत परेशान रहते थे। इसी लिये जब वे बाहर रहते थे तो वो अपनी नौकरानी को अधिक वेतन दे कर रात को घर में ही सुलाते थे। पर मेरे आने से अब उन्हें आराम हो गया था।

तो आइए आपको मैं अब भाभी के विचित्र करनामे बताता ही। यह सब कपोल कल्पित नहीं है, वास्तविक है। कैसे अब हमारे बीच खुलापन आ गया था, और कैसे उनकी यह आदत छूट गई।

मैं भाभी के कमरे में एक कोने में अपना पलंग लगा कर सोता था, ताकि मैं उनकी हरकतों पर नजर रख सकूँ। एक रात को मेरी नींद अचानक ही खुल गई। मुझे अपने ऊपर एक बोझ सा महसूस हुआ। भाभी नींद में मेरे बिस्तर पर आ गई थी और जैसे मर्द औरत को चोदता है उस मुद्रा में वो मेरे ऊपर सवार थी। उन्होंने मेरे कूल्हों पर पूरा जोर डाल रखा था। उनकी सांसें मुझे अपनी गर्दन पर महसूस

होने लगी थी। उन्होंने चोदने की स्टाईल में अपने कूल्हे मेरे लण्ड पर मारना आरम्भ कर दिया था। शायद वो नींद में मुझे चोदने का प्रयास कर रही थी। मुझे तो मजा आने लगा था। मैंने उन्हें यह सब करने दिया।

तभी वो लुढ़क कर मेरी बगल में गिर सी गई और खर्राटे भरने लगी। शायद वो झड़ गई थी। मुझसे लिपट कर वो ऐसे सो गई जैसे कोई बच्चा हो।

मैंने धीरे-धीरे लण्ड मसल कर अपना लावा उगल दिया। ढेर सारे वीर्य से मेरा अण्डरवियर पूरा ही गीला हो गया। मैं तो भाभी को लिपटाये हुये उसी गीलेपन में सो गया।

सुबह जब उठा तो भाभी मेरे पास नहीं थी। पर मुझसे वो आंख भी नहीं मिला पा रही थी।

“गुल्लू, वो जाने मैं कैसे रात को आपके बिस्तर पर आ गई? देखो, अपने भैया को बताना नहीं !”

“अरे नहीं भाभी, ऐसी कोई बात नहीं थी, आप बस नींद में मेरे पास सो गई थी बस, और क्या?”

‘ओह, फिर ठीक है, प्लीज बुरा ना मानना, यह मेरी नींद में चलने की आदत जाने कैसे हो गई !”

मैंने भी सोचा कि बेचारी भाभी खुद ही परेशान है उसकी मदद ही करना चाहिए, सो मैंने उन्हें दिलासा दिया, और समझाया कि आप निश्चिन्त रहें, सब ठीक हो जायेगा।

पर अगली रात फिर से वही हरकत हुई। मैं रात को देर तक कोई सेक्सी कहानी पढ़ रहा था। मेरा लण्ड भी तन्नाया हुआ था। तभी वो उठी। मैं सतर्क हो गया। भाभी सीधे सोते हुए मेरी तरफ़ आने लगी।

मैं अपने लण्ड को दबा कर नीचे करने कोशिश करने लगा। पर हाय रे ! वो तो और ही भड़क उठा।

वो सीधे मेरे बिस्तर पर आ गई और बिस्तर पर चढ़ गई। मैं हतप्रभ सा सीधा लेटा हुआ था। भाभी ने अपनी एक टांग ऊपर उठाई और मेरी जांघों पर चढ़ गई।

फिर वो ऊपर खिसक कर मेरे खड़े लण्ड पर बैठ गई और उसे अपनी चूत के नीचे दबा लिया। मेरे मुख से एक सुख भरी आह निकल गई। फिर वो मेरे ऊपर लेट गई और अपनी चूत को मेरे लण्ड पर घिसने लगी। तभी शायद वो झड़ गई, मैंने भी आनन्द के मारे लण्ड पर मुठ लगाई और अपना माल निकाल दिया।

भाभी एक बार फिर से मेरे से बच्चों की भान्ति लिपट कर गहरी निद्रा में चली गई।

मेरा मन खुश था कि चलो बिना किसी महनत के मेरे मन की अभिलाषा पूरी हो रही थी। भाभी ऊपर चढ़ कर मुझे आनन्दित करती थी, फिर बस मुझे अपना माल ही तो त्यागना था। भाभी रोज ही मुझसे पूछती थी कि उनके द्वारा मुझे कोई तकलीफ़ तो नहीं हुई। मैं उन्हें प्यार से बताता था कि भाभी के साथ सोना तो गहरे प्यार की निशानी है और बताता था कि वो मुझे कितना प्यार करती हैं।

भाभी मेरी बात सुन कर खुश हो जाया करती थी।

मेरे दिल में अब हलचल होने लगी थी। भाभी तो मेरे लण्ड के ऊपर अपनी चूत घिस-घिस कर झड़ जाती थी और मैं ? बिना कुछ किये बस नीचे पड़ा तड़पता रहता था।

आज मैंने सोच लिया था कि मजा तो मैं पूरा ही लूँगा।

मैं रात को देर तक भाभी का इन्तज़ार करता रहा। पर आज वो नहीं उठी। मैं उनकी आस में बस तड़पता ही रह गया। दिन भर मैं यह सोचता रह गया कि आज क्या हो गया? आज क्यों नहीं उठी वो ?

अगली रात को भी मैं देर तक जागता रहा। आज भाभी रात को नींद में उठी। मैं चौकन्ना हो गया। मैंने तुरन्त अपना पजामा और बनियान उतार दिया, बिल्कुल नंगा हो कर सीधा लेट गया। लण्ड चोदने के लिये उत्सुकता से भर कर कड़क हुआ जा रहा था।

भाभी जैसे ही मेरे बिस्तर पर चढ़ी, मैंने जल्दी से उनका पेटिकोट ऊपर कर दिया। उनकी नंगी चूत की झलक सी मिल गई। मेरी नंगी जांघों पर उनके नंगे नितम्ब मुलायम सी गुदगुदी करने लगे।

फिर उन्होंने अपनी चूत उठाई, मैंने अपने लण्ड को हाथ से सीधा पकड़ लिया और भाभी के बैठने का इन्तज़ार करने लगा। जैसे ही वो नीचे बैठने लगी, मैंने लण्ड को सीधा कर चूत के निशाने पर साध लिया। भाभी ने धीरे से अपनी चूत को मेरे लण्ड पर रख दिया। गीली चूत ने लण्ड पाते ही उसे अपनी गुफ़ा में ले लिया। मैं एक असीम सुख से भर गया।

अब मुझे नहीं, सभी कुछ भाभी को करना था। मुझे आज एक अति-सुखदायक आनन्द की प्राप्ति हो रही थी। भाभी के धक्के मेरे लण्ड को मीठी गुदगुदी से भर रहे थे। मैं भी अब जोश में आ कर नीचे से लण्ड को उछाल कर उनकी योनि में अन्दर-बाहर करने में भाभी को सहयोग दे रहा था।

इस सब कार्य में मैंने नोट किया कि भाभी की आँखें बन्द ही थी।

फिर मुझे लगा कि जैसे वो झड़ गई है। वो मेरी बगल में ढुलक कर लेट गई और खर्राटे भरने लगी। मुझ से अब सहन नहीं हो पा रहा था। मैंने भाभी को सीधा लेटाया और मैं उनके ऊपर भाभी की टांगें चौड़ी करके बैठ गया। फिर अपना कड़क लण्ड चूत में घुसा दिया। पहले तो धीरे धीरे उन्हें चोदता रहा फिर जैसे मुझ पर कोई शैतान सवार हो गया। मैंने भाभी के स्तन भींच लिये। मैं पूरी तरह से उन पर लेट गया और उन्हें चोदने लगा।

मैंने महसूस किया कि भाभी के मुख से भी आनन्द भरी सिसकारियाँ फ़ूट रही हैं, उनके होंठ थरथरा रहे हैं, उनके जिस्म में कसावट भर रही थी। भाभी मेरी कमर को अपनी तरफ़ खींचने लगी थी।

मैंने उन्हें देखा तो उनकी बड़ी बड़ी आँखें मुझे ही बहुत ही आसक्ति से देख रही थी।

“भाभी … !”

“आह, … श … श्…” भाभी ने मेरे मुख पर अपनी अंगुली रख दी और चुप रहने का इशारा किया। उनकी कमर नीचे से तेजी से उछल रही थी, लण्ड को पूरा पूरा निगल रही थी।

भाभी का तमतमाया चेहरा जैसे कोई काम की देवी की तरह लग रहा था। हम दोनों की गति तेज हो गई थी।

… और अन्त समय आ गया था… कमरे में तेज चीखें उभरने लगी थी, भाभी तेज आवाज में सीत्कारें भर रही थी। मैं भी सुख में भरा जोर जोर से आहें भर रहा था।

और अह्ह्ह्ह्ह्ह … मेरे जिस्म ने जवाब दे दिया। साथ भाभी ने भी मुझे जोर से कस लिया। मेरा वीर्य भाभी की चूत में ही निकल पड़ा। हम दोनों एक दूसरे से चिपट कर लेट गये। तेज सांसों को नियंत्रण में करने में लगे थे।

हमारी नींद जाने कब लग गई, यह तो सवेरा होने पर ही पता चला।

सवेरे भाभी बड़ी चपलता से सारे काम निपटा रही थी। उनके चेहरे पर आज गजब की चमक थी। वो मुझे बार बार मुस्करा कर देख रही थी। वो आज बहुत खुश थी। अपनी खुशी उन्होंने मुझे मेरा मन पसन्द भोजन बना कर जताई। सब कुछ निपटा कर दोपहर में भाभी ने मुझे मेरे बिस्तर पर ही फिर से दबा लिया, मेरे गुप्त अंगों से खेलने लगी, बार बार मुझे प्यार करती रही।

“गुल्लू, तू तो बहुत अच्छा है, अब तो बस यहीं रह जा !”

“भाभी, भैया को मालूम हो गया तो?”

“तू भी मत बताना और मैं भी नहीं बताऊँगी ! बस, फिर कैसे पता चलेगा?”

“भाभी, रात को आपको चलने की आदत है?”

“नहीं तो, पर हाँ कई बार मैं अपने आप को अपने बिस्तर पर नहीं पाती हूँ, पर कल तो मैं जान कर के तेरे पास आई थी !”

“अरे ! क्यूँ भाभी?”

“क्योंकि, परसों मेरी नींद तेरे बिस्तर पर ही खुल गई थी, जब मैं जाने कैसे तेरे ऊपर चढ़ गई थी।”

“ओह ! तो फिर?”

“फिर क्या, मुझे पता चला कि तू तो मस्त हो रहा है, बस मैंने सोच लिया कि तू तो गया अब !” भाभी हंस पड़ी।

“धत्त, भाभी, मेरे लण्ड को चूत से रगड़ोगी तो मस्ती आयेगी ही ना?”

“तो आज मस्त से चुद ली … और क्या? अब तू कुछ और भी करेगा मेरे साथ या नहीं?”

मैंने भाभी को प्यार से चूमते हुए उनके एक स्तनाग्र को अपने मुख में भर लिया और चूसने लगा। बस भाभी ने तो जैसे हाय तौबा मचा कर मस्ती ही ला दी। फिर नीचे सरकता हुआ भाभी की चूत को पूरा ही चूस डाला, दाना भी हौले हौले जीभ से खूब कुचला। इसी बीच वो झड़ भी गई। अब भाभी ने मेरे मुख का चूम कर स्वाद लिया और मेरे तने हुये लण्ड को अपने मुख श्री में प्रवेश कर के उसे चूसने लगी।

नरम नरम सा मुख, गीला गीला सा कोमल स्पर्श, फिर पुच पुच की आवाजें माहौल को गर्म करने लगी थी।

मुझे अचानक जाने क्या सूझा, मैंने झट से क्रीम उठाई और भाभी को उल्टी करके उनकी गाण्ड में भर दी।

वो सिसकरी भरने लगी, उनकी गाण्ड का छेद लप लप करता हुआ ढीला पड़ने लगा।

मैंने झट से अपने को व्यवस्थित किया और अपने सख्त लण्ड को भाभी की गाण्ड के छेद से लगा दिया।

मैंने सधा हुआ जोर लगाया।

पहले तो मुश्किल आई पर भाभी ने मेरा साथ दिया और लण्ड उस तंग छेद में प्रवेश कर गया। इतना कसा हुआ, लगा मेरा सुपाड़ा पिचक कर टूट जायेगा। पर एक तेज मजा आया, मैंने कोशिश की और थोड़ा और अन्दर सरका दिया।

आह्ह्ह, एक बार अन्दर गया तो फ़ंसता हुआ अन्दर उतरता ही गया।

तेज मीठा सा, मस्ती भरा रंग चढ़ने लगा। गाण्ड में इतना मजा आता है, इतनी मस्ती आती है, यह तो आज ही पता चला।

भाभी के गाण्ड का छेद काला और चमकीला घिसा हुआ सा था। यानि भाभी गाण्ड मराने की शौकीन भी थी। भाभी पीछे मुड़ मुड़ कर मुझे आह भरती हुई देख रही थी। मेरी मस्ती के अहसास से वो भी

मस्त होने लगी।

कसे छिद्र का कमाल था कि मस्ती तेज होने लगी।

भाभी चूत भी रस से भर गई। प्रेम की बूंदे उसमें से रिसने लगी।

भाभी ने अपनी चूत की तरफ़ इशारा किया तो मुझे उसकी बात माननी ही पड़ी। उन्होंने धीरे से अपने चूतड़ ऊपर उठा लिये और गाण्ड को ऊपर कर लिया। उनकी गुलाबी चूत सामने से खिली हुई नजर आने लगी थी।

मैंने अपना लण्ड उसकी चूत में डाल दिया। प्यासी चूत को लण्ड मिल गया। भाभी चिहुंक उठी।

लण्ड सर सर करता हुआ, पूरा ही अन्दर बैठ गया। भाभी किलकारियाँ मार कर अपने आनन्द का परिचय दे रही थी। कसी हुई गाण्ड से निकला हुआ लण्ड उसकी मुलायम चूत में बड़ी सरलता से आ-जा रहा था।

भाभी ने खुशी की एक चीख मारी और झड़ने लगी।

मैंने भी अपना कड़कता लण्ड बाहर निकाल लिया।

भाभी ने कहा,”बड़ा दम वाला लण्ड है रे … अभी तक देखो कैसे इठला रहा है?”

उसने प्यार से अपने मुठ में उसे भरा और दबा कर जो मुठ मारी कि बस हाय रे …

मैं तो ये गया … सामने पहरेदार था, यानि भाभी का मुख ! उन्होंने अपना मुख खोल लिया था। मेरे सुपारे को मुख में लिया और दण्ड को फिर जो रगड़ा कि मेरा वीर्य सर्रर्ररर से छूट गया।

जोश में मेरा लण्ड उनके गले तक जा फ़ंसा था।

उसके पास कोई मौका नहीं था। निकला हुआ वीर्य बिना किसी दुविधा के सीधे गले में उतरता चला गया। फिर बचा खुचा वीर्य उसने गाय का थन दुहने की तरह खींच-खींच कर मेरा सारा माल निकाल लिया और पी गई।

मेरे और भाभी के मध्य एक मधुर अलौकिक सम्बंध स्थापित हो चुका था। भैया भी बहुत खुश थे कि भाभी मेरे साथ बहुत खुश रहती थी। अब वे बेहिचक अपनी व्यापारिक यात्राओं पर खुशी खुशी जाया करते थे इस बात से बेखबर कि भाभी की घर में जबरदस्त चुद रही है।

भाभी भी उन्हें बेहिचक बाहर जाने को कह देती थी। घर में चुदाई का आलम यह था कि भाभी और मैं, भैया की अनुपस्थिति में साथ-साथ ही सोते थे। रात को क्या, दिन को भी चुदाई में लीन रहते थे।

अब भाभी सन्तुष्ट रहती थी, उनके नींद में चलने की आदत भी नहीं रही थी। रात को चुदने बाद वो मस्ती से गहरी निद्रा में लीन हो जाती थी।

रूपा जी का गाण्ड चुदाई सेवक

मेरी नौकरी एक घर में लग गई थी। मैं यहाँ घर का सारा काम करता था, मसलन- भोजन पकाना, घर की साफ़ सफ़ाई रखना आदि। यूँ तो मैं एक पढ़ा लिखा लड़का हूँ पर पढ़ाई में रुचि नहीं होने के कारण मेरे अच्छे नम्बर नहीं आते थे, जैसे तैसे बी कॉम करने के बाद मैं गांव से शहर आ गया था। मैं एक छह फ़ुटा, हट्टा कट्टा, गोरे रंग का जाट जवान हूँ, सवेरे कसरत करना मेरा शौक था। अच्छी नौकरी के लिये लिये मैंने यहां वहां प्रार्थना पत्र डाल रखे थे।

जिस परिवार में काम करता था, वहाँ परिवार के नाम पर बस मियां-बीवी ही थे। नया घर था, आधुनिक सामान सज्जा से युक्त था। मैं यहाँ मन लगा कर काम करता था। मेहता साहब का स्वयं का एक कारखाना था। मेरा नौकरों वाला एक मकान का छोटा सा सेट था, जो चारदीवारी में पीछे की ओर बना हुआ था। रात को सोने से पहले मैं घर चेक करता था, सभी ताले वगैरह ठीक से बन्द हैं या नहीं, देख भाल करके ही सोने जाता था।

मेहता साहब और रूपा मेमसाब में झगड़ा बहुत होता था, नतीजन वे दोनों अलग अलग कमरे में रहते थे और अलग ही सोया करते थे। रूपा मेमसाब का कमरा पीछे था, उनका दरवाजा और खिड़की एक लाईन में थे और वो मेरी भी खिड़की के सामने थे। रूपाजी का कमरा बाहर की ओर मेरे क्वार्टर की तरफ़ भी खुलता था, पर वो
रूपा जी अन्दर से बन्द रखती थी। खिड़की खुले होने पर मुझे अन्दर सब साफ़ दिखाई देता था। जाहिर है रूपा जी को भी अपनी खिड़की से भी मेरा कमरा दिखाई देता होगा।

रात को कई बार मैं बाहर उनकी खिड़की में झांक कर रूपा जी के रूप का लुफ़्त उठाया करता था। मैंने उन्हें कितनी ही बार अर्धनग्न अवस्था में देखा था। एक बार तो पूरी नंगी भी देख लिया था। जाने क्यूँ कभी-कभी मुझे लगता था कि जब वो नग्नावस्था में होती हैं तो जानबूझ कर खिड़कियाँ ठीक से बंद नहीं करती। तो क्या, वो मुझे दिखाने के लिये ऐसा करती हैं ? उनका रूप-लावण्य देखकर मैं खो सा जाता था, उनके भारी स्तन सीधे तने हुए, पतली कमर और भारी कूल्हे उसे सेक्सी बनाते हैं। मुझे कितनी बार इस कारण उत्तेजना भर आती थी और मैं मुठ मारने लगता था।

झगड़े के कारण उनमें शारीरिक सबंध भी नहीं था। इसका कारण मुझे पता चला कि यह सब एक अन्य युवती की वजह से था।

आज शाम से ही रूपा जी के कमरे का दरवाजा खुला हुआ था। मैं अपना खाना तैयार करके वहाँ काम करने चला गया। शाम का भोजन बना कर, मेमसाब का भोजन ट्रे में सजा कर उनके कमरे में रख आया था। रूपा जी बिस्तर पर पड़ी बस यूँ ही शून्य में ताक रही थी।

“राम जी, कितना अकेलापन लगता है…!”

“जी मेमसाब ! आप कहें तो मैं आज शाम को आपको झील के किनारे घुमा लाऊँ ?”

“हाँ, चल … कहीं भी चल… गाड़ी निकाल !”

उनकी रोज की राम कहानी का टेप एक बार फिर से चल पड़ा। रास्ते भर वो मेहता साहब को गालियाँ देती रही। रात के दस बजे तक यहाँ-वहाँ घूमने के बाद घर आ गये। तब तक साहब भी आ चुके थे। मैं अपने कमरे में चला आया। साहब का दारू पीने का दौर आरम्भ हो गया था। तभी मेरे क्वार्टर के कमरे में रूपा जी आ गई। आज का बना हुआ मेरा खाना, उन्होंने अपने कमरे में मंगवा लिया। मुझे आश्चर्य हुआ।

“आज मेरे साथ ही खाना खा लो … !”

“पर मेरे भोजन में मिर्च मसाले तेज होते हैं !”

“वही तो खाना है ना…”

मैं नीचे बैठ गया और वो सी सी करके मेरे खाने का लुफ़्त उठाती रही। बीच बीच में वो ललचाई नजरों से मुझे देखती भी जा रही थी। लगता था कि वो आज मूड में हैं। उसने अपने हाथ साफ़ किए और मेरी तरफ़ मुस्करा कर कहने लगी,”कल रात को, राम जी, तुम कुछ गड़बड़ कर रहे थे ना…?”

उसके अचानक इस हमले से मैं घबरा गया।

“नहीं तो मालकिन…!”

“मैंने कल रात को तुम्हें मुठ मारते देखा था, तुम्हारा है तो सोलिड !” उसकी वासना भरी आवाज मुझे लुभा रहा थी।

“यह क्या कह रही हैं आप… अब जवानी में ऐसा हो ही जाता है !” मैंने सरल सा जवाब उसे आगे बढ़ने के दे दिया।

“राम जी, बस एक बार अपना लण्ड निकाल कर… बस एक बार मुठ मार दो मेरे सामने !”

मैं रूपा जी की बात सुन कर चकरा गया। ऐसी भाषा तो हम लोग बोलते थे। क्या उन्हें अपनी मर्यादा का ख्याल नहीं है? और यह मुठ मारने की बात … लण्ड की बात…। मैं शरमा गया, पर गर्म भी हो गया, भला ऐसे कैसे लण्ड निकाल कर मुठ मार दूँ।

“रूपा जी, आप कैसा मजाक करती हैं ?” लण्ड बाहर निकालना और फिर मुठ मारना ?

“तू इतनी बार मुझे नंगी देखता है तो मैंने तुझे कभी कुछ कहा क्या ?” एक और प्रहार हुआ।

मैं फिर से चौंक गया। मेरी हर बात पकड़ी जा चुकी थी। मैंने सर झुका लिया फिर सोचा शायद रुपा जी मेरे साथ सेक्स का मजा लेना चाहती है … सोचा … चलो इसमे हर्ज ही क्या है?

“जी, पर मेरी इतनी हिम्मत कहाँ … फिर शरम भी आती है”

“मर्द होकर शर्म … चल ना राम जी … कर ना … उतार दे यह पजामा !”

मैंने खड़े हो कर पजामा खोल दिया, फिर फ़टी हुई चड्डी भी उतार दी। पर डर के मारे मेरा लण्ड और भी सिकुड़ गया था।

वो हंसती हुई बोली,”अरे, यह तो मूंग्फ़ली जैसा हो गया है … उस दिन तो बहुत लंबा और मोटा नजर आ रहा था?”

“बस मेम साब, मुझे जाने दो … मुझसे नहीं होगा यह सब…” सच मानो तो मेरी हिम्मत ही नहीं हो रही थी। वो लपक कर मेरे पास आ गई।

“नाराज हो गये … लाओ जरा मैं देखूं तो !”

उसने मेरे सिकुड़े हुये लण्ड को हिलाया, मुझे जैसे बिजली का झटका सा लगा। लण्ड अब थोड़ा सा ढीला सा होकर लम्बा हो कर उसके हाथ में आ गया। अचानक यह हमला मुझे सपने जैसा लग रहा था। वो प्यार से लण्ड सहलाने लगी। जैसे सोता शेर जाग गया हो। मेरा लण्ड खड़ा हो कर कड़क हो गया।

“देखा, कड़क है साला … चल अब मार मुठ … मैं सामने बैठी हूँ !” वो भी लण्ड का आकार देख कर खुश हो गई। मुझे भी आंतरिक खुशी सी लगी। मैंने अपना लण्ड मुठ में भर लिया और हौले हौले से आगे पीछे चलाने लगा। रूपा जी की सांसें भी यह देख कर तेज हो उठी। उसकी छाती जैसे फ़ूलने पिचकने लगी। आखे नशीली हो गई। मुझे लगा कि तेजी से करूंगा तो वीर्य छूट जायेगा, सो मैंने धीरे से सुपाड़ा बाहर निकाल लिया और अंगुलियों से लाल टोपी को सहलाने लगा।

रूपा के मुख से आह निकल पड़ी। मेरे मुख से भी सुख की सिसकारी निकल गई। तभी रूपा ने अपना ब्लाऊज खोल दिया और ब्रा नीचे खींच कर अपना एक चुचूक मसलने लगी। यह देख कर मेरा हाल और भी बुरा हो गया, लगा कि चूचियों को हाथ से पकड़ कर भींच डालूँ।

तभी उसने अपनी साड़ी उतार दी और पेटीकोट ऊपर कर लिया। उसने अपनी पेन्टी उतार दी और अपनी चूत मेरे सामने ही नंगी कर ली। वो तो जो मन में आ रहा था, करती जा रही थी। अपने इस कृत्य में वो जबरदस्त वासना मह्सूस कर रही थी और रोमांचित भी होती जा रही थी।

“हाँ हाँ… और मार मुठ … मेरे राजा … हाय रे … मार ना…” वो जैसे मदहोश हो गई थी। उसे अपने तन का भी होश नहीं था। उसकी चूत और चूचियाँ सभी कुछ तो उघाड़ कर रखा था उसने।

“मेम साब , यह मत करो … हाय छुपा लो उसे…” ये सब मेरे में एक अद्भुत सा रोमांच भर रही थी।

“नहीं रे देख इस चूत को … और मुठ मारता जा…” उसने चूत की पलकों को अन्दर से गुलाबी रंग दिखाया। मुझे लगा कि लण्ड को उसमे घुसेड़ ही डालूँ।

“मेरा निकल जायेगा मेमसाब !”

मैं बदहाल हो गया था यह सब देख कर। मुझसे इतना सारा खेल सहा नहीं जा रहा था। अपने आप को झड़ने से रोक नहीं पाया और तेजी से लण्ड की धार निकल पड़ी। वीर्य स्खलित होते ही मुझे शरम सी आ गई अपनी इस कमजोरी पर।

पर रूपा ने और बढ़ावा दिया,”राम जी… फिर से मसल डालो लण्ड को … और मारो मुठ… इसे आज सोने मत दो !”

वो भी अपनी चूत खोल कर कभी चूत में दो अंगुलियाँ घुसेड़ती, कभी अपने मटर जैसे दाने को सहलाती। मेरा लण्ड उसे देख कर ही वापस अंगड़ाई ले कर जाग खड़ा हुआ और फिर से अकड़ गया। पर इस बार मैंने सोच लिया था कि इस तड़पती हुई नारी की चूत में बस लण्ड ही चाहिये। मैं भी क्यूँ लण्ड पर जुल्म करूँ?

मैं धीरे से चल कर उसके समीप आ गया। रूपा जी के सर पर प्यार से हाथ फ़ेरा, उसके बालों को सहलाया। उसकी प्यासी नजरें जैसे ऊपर उठी और मुझसे जैसे चुदने की विनती करने लगी। मैंने उसके कंधो को पकड़ा और धीरे से बिस्तर पर लेटा दिया। वो अपने पांव फ़ैला कर लुढ़क गई। मैं उसकी छाती के पास आ गया और लण्ड को उसके अधरों से छुला दिया। उसका मुख अपने आप ही खुल गया और मेरा लण्ड उसमें समाता चला गया।

“मेम साब माफ़ करना … आपका ही लण्ड है, जब चाहें हाज़िर हो जायेगा !”

“ओह राम जी … मेरे राजा …” और जोर जोर से लण्ड चूसने की आवाज आने लगी। मेरा सुपाड़ा फ़ूल के कुप्पा हो गया। चपड़ चपड़ की मधुर गूंज मुझे मस्त करने लगी।

“राम जी, अब मेरी चूत को भी चूस डालो… मजा आ जायेगा राजा…”

मैंने लण्ड उसके मुख से निकाल लिया और चूत के पास आ गया और चूत के पास झुक गया। एक मधुर सी चूत की भीनी भीनी खुशबू नथनो में भर गई। उसका दाना मटर जैसा बड़ा था, जीभ लगाने से वह और भी कड़ा हो गया। वो आनन्द से सिसकने लगी … मैंने उसकी चूत को चाटना और चूसना आरम्भ कर दिया। दाना भी
अछूता नहीं रहा। वो आनन्द से जैसे छटपटा उठी।

मैंने रूपा को उल्टी करके लेटा दिया और लन्ड को उसके चूतड़ों की दरार में घुसेड़ दिया। दूसरे ही क्षण उसके मुख से सीत्कार निकल गई। लण्ड गाण्ड में घुस चुका था। मैंने पीछे से उसे जोर से जकड़ लिया और उसकी चूचियाँ दबा दी। जोर लगा कर लण्ड और घुसेड़ा, उसको दर्द सा महसूस हुआ। पर बस मैंने इतना ही घुसाया और अन्दर बाहर करने लगा। धीरे धीरे जगह बनाता हुआ लण्ड अन्दर भीतर तक पूरा ही घुस गया था। रूपा अब भी जोर की सिसकारियाँ भर रही थी। उसकी आहों से यह नहीं पता चलता था कि वो दर्द भरी आह है या आनन्द की है। शायद काफ़ी समय के बाद चुदाने का आनन्द था यह !

मैं उससे लिपट कर उसकी गाण्ड मारता रहा और वह आनन्द में लिप्त हुई सिसकारियाँ भर रही थी। मैंने रूपा को फिर से पलट दिया और सीधा कर लिया। उसकी नशीली आंखें जैसे मुझे अपने बस में कर लेना चाहती थी।

“आई रे … राम जी धीरे से, बहुत मोटा है … आह अच्छा घुसा दो…”

मेरा लण्ड गाण्ड में ले लेने के बाद मुझे लगा कि चूत तो बनी ही लण्ड के लिये है… फिर तकलीफ़ कैसी…। मैं धीरे से लण्ड चूत की गहराईयों में उतारने लगा। रूपा ने अपने चक्षु बन्द कर लिये। लण्ड थोड़ा लंबा था सो
कहीं गहराई में जा कर किसी अंग से टकरा गया। मैं अब धीरे धीरे लण्ड को अन्दर बाहर करने लगा। उसकी गीली चूत ने इसमें सहायता की और लण्ड फ़िसलन भरी राह में तेजी से बढ़ चला।

उसकी चूत भी अब ऊपर-नीचे उछलने सी लगी थी। कुछ ही देर में हम दोनों पूरे जोश में तेजी से चुदाई कर रहे थे। ताल से ताल मिला कर हम दोनों का हर अंग चल रहा था। मैंने झुक कर उसके अधरों को अपने अधरों से भींच लिया। उसने भी अपनी जीभ से जैसे मेरा मुख चोद दिया। अन्तरंग भावनाओं में बहते हुये हम चरम बिन्दु की ओर बढ़ने लगे। एक दूसरे में समाये हुये, दोनों शरीर एक ही लगने लगे। मेरे शरीर का सारा रस जैसे लण्ड की ओर बहता सा लगा। लण्ड में गजब की मिठास भरने लगी। लण्ड का चूत पर जोर बढ़ गया।

तभी रूपा का जिस्म जैसे सिहर सा गया। उसकी चूत में जैसे लहरें उठने लगी। उसका रतिरस सीमायें तोड़ कर फ़ूट पड़ा था। वह झड़ने लगी थी। मेरा लण्ड भी वासना का तूफ़ान लिये अपनी सीमायें लांघने लगा था। मैंने लण्ड निकालने की कोशिश की पर रूपा ने मुझे कस कर जकड़ लिया था।

“राजा … निकाल दो … मेरी चूत में ही निकाल दो अपना माल … हाय मेरी मां…”

“आह्ह्ह्ह, मेम सा … निकल रहा है … उफ़्फ़्फ़्फ़्… हाऽऽऽऽऽऽऽ”

मेरे मुख से आनन्द भरी जैसे चीत्कार सी निकल पड़ी। लण्ड उसकी चूत में भरता चला गया। कुछ ही समय में जैसे सारा नशा उतर गया। हम दोनों एक दूसरे से अलग हो गये। अपने इस कृत्य पर पहले तो मुझे बहुत शर्म सी आई पर रूपा ने मुझे हंस बोल कर मेरा संकोच मिटा दिया।

“देखो राजा जी…”

“जी ! राम जी… है मेरा नाम !”

“आ जाया करो रात को हमारे पास …”

“जैसा आप कहें … आप बहुत अच्छी हैं मेमसाब जी…”

“यह लो रुपये और अपने लिये नये कपड़े और खुशबू भी ले आना… जरा स्टाईल मारा करो !”

मैंने लपक कर पैसे ले लिये। बस उसके बाद तो मेरी काया बदल गई। दिन को तो मैं नौकर था और रात को रूपा जी का प्रेमी।

कुछ दिनों बाद मुझे रूपा जी ने मुझे अपने कारखाने में सुपरवाइजर रख लिया। पर घर वही रहा।

मैं आज भी रूपा के घर काम, ऑफ़िस का काम और रूपा जी का व्यक्तिगत सेवक के रूप में कार्य कर रहा हूं, वो बात अलग है कि रूपा जी के साथ अब उनकी सहेलियाँ भी इस सेवा का लाभ उठाती हैं। रूपा जी मुझे अब राम जी सेवक कह कर पुकारने लगी थी। इस नाम का मतलब बस रूपा जी और उसकी सहेलियाँ ही समझती थी।

पर हाँ, जब वो सभी मुझे सेवक कहती थी तो उनके स्वर में एक कसक होती थी और चेहरे पर एक मतलब भरी मुस्कान !

ज्योतिषी की सेक्स सलाह – 2

मैंने कामिनी को बेडरूम में ले जाकर दरवाजा बंद कर लिया।

कामिनी ने कहा- अभी यह करना जरूरी है? जब रिशु रश्मि से कर ले तब हम करेंगे।

मैंने कहा- अरे यार, रिशु तो कल रश्मि के साथ पहली बार करेगा। सुनो, तुम आज रात को मेरे घर फोन करना और रश्मि से कहना कि कल तुम्हारे यहाँ पूजा है और सारे लोग आ जायें। मम्मी पापा तीन दिन के लिए बाहर गए है तो रश्मि मेरे साथ यहाँ आएगी।

तब तुम कह देना कि पंडित नहीं आया और पूजा रद्द हो गई। सबको फोन करके मना कर दिया पर हमारा फोन नहीं लग रहा था। फिर हम रश्मि को किसी न किसी तरीके
उत्तेजित करके मना ही लेंगे और उसके बाद रिशु का काम हो जायेगा। कहो, मेरी जान ?

यह बोल कर मैंने कामिनी की साड़ी खोल दी और अब वो ब्लाउज और पेटीकोट में मेरे सामने खड़ी थी।

कामिनी- इतनी जल्दी आंटी से जान और आप से तुम पर आ गए? मानती हूँ पक्के बहनचोद हो ! आओ और अब मेरी प्यास बुझाओ !

मुझे उम्मीद नहीं थी कि कामिनी इतनी जल्दी खुल जायेगी ! पर उसके मुँह से गालियाँ सुन कर मजा आ गया।

लम्बी, गोरी चिट्टी कामिनी का भरा बदन, चौड़ी कमर, बाहर निकले उत्तेजक कूल्हे और ब्लाउज से बाहर झांकते बड़े-बड़े स्तन मेरे मन में हलचल मचाने लगे। मेरे मन में उनको नंगा देखने का ख्याल आने लगा। फिर हम दोनों बिस्तर पर लेट गए। कामिनी एकदम मुझ से लिपट गई, मुझे करंट सा लगा जब उनके स्तन मेरी छाती से छुए। उसकी एक टांग मेरे ऊपर थी।

मैंने भी उसकी टांग पर एक पैर रख दिया और उसकी पीठ पर हाथ रखते हुए कहा- आओ मेरी जान !

कामिनी धीरे-धीरे मेरी बाहों में सिमटती जा रही थी और मुझे मजा आ रहा था। धीरे से मैंने उनके कूल्हों पर हाथ रखा और धीरे-धीरे सहलाने लगा।

कामिनी को मजा आ रहा था। फ़िर कामिनी सीधी लेट गई। अब मैं भी उससे चिपट गया और उसके वक्ष पर सिर रख लिया। मेरा लण्ड खड़ा हो चुका था। मैं धीरे धीरे उनका पेट और फ़िर जांघ सहलाने लगा।

तभी कामिनी ने अपने ब्लाउज के कुछ हुक खोल दिये यह कह कर कि बहुत गर्मी लग रही है। अब उनके चुचूक साफ़ नज़र आ रहे थे।

मैंने चूचियों पर हाथ रख लिया और सहलाने लगा। मैंने उनकी चूचियाँ ब्लाउज से निकाल कर मुँह में ले लिया और दोनों हाथों से पकड़ कर मसलते हुए उनका पेटीकोट अपने पैर से ऊपर करना शुरु कर दिया। उसकी गोरी गोरी जांघों को देख कर मैं एकदम जोश में आ चुका था। उसकी चूत नशीली लग रही थी। मैंने उसकी चूत को चाटना शुरु कर दिया। मैं पागल हो चुका था। आज मेरा बहुत पुराना सपना पूरा होने वाला था।

मैंने अपने पैर कामिनी के सिर की तरफ़ कर लिये थे। कामिनी भी मेरा लण्ड निकाल कर चूसने लगी। वह मुझे भरपूर मजा दे रही थी। कुछ देर बाद कामिनी मेरे ऊपर आ गई और मैं नीचे से चूत चाटने के साथ साथ उनके गोरे और बड़े बड़े कूल्हे सहलाने लगा। कामिनी की चूत पानी छोड़ गई।

अब मैं और नहीं रह सकता था, मैं उठा और कामिनी को लिटा कर, उसकी टांगें चौड़ी करके चूत में लण्ड डाल दिया और कामिनी कराहने लगी। मैं जोर जोर से धक्के लगाने लगा। कामिनी ने मुझे कस कर पकड़ लिया और कहने लगी- मोनू ऐसे ही करो, बहुत मजा आ रहा है, आज मैं तुम्हारी हो गई, अब मुझे रोज़ तुम्हारा लण्ड अपनी चूत में चाहिये ! एएऊउ स्स स्सी स्स्स आह्ह्ह ह्म्म आय हां हां च्च उई म्म मा।

कुछ देर बाद मेरे लण्ड ने पानी छोड़ दिया और कामिनी भी कई बार डिस्चार्ज हो चुकी थी। उस दिन मैंने तीन बार अलग अलग आसनों से कामिनी को चोदा। कामिनी ने भी मस्त हो कर पूरा साथ दिया।

उसके बाद हमने कपड़े पहने और बाहर ड्राइंगरूम में आ गए, रिशु वहाँ टीवी देख रहा था, उसको देख कर कामिनी थोड़ा शरमा गई और मैंने घर का नंबर मिलाया और फोन कामिनी को दे दिया। फोन रश्मि ने उठाया और वही बात हुई जो तय हुई थी। रश्मि ने कह दिया कि वो कल दस बजे तक आ जायेगी।

मैंने कामिनी को चूम लिया तो रिशु मुस्कुराने लगा और मैं वहां से चला आया।

घर पहुँचा तो रश्मि बोली- भैया, कामिनी आंटी का फोन आया था कल सुबह दस बजे उनके यहाँ जाना है, पूजा है।

मैंने कहा- ठीक है ! नौ बजे तक तैयार हो जाना !

और मन ही मन सोचा कि पूजा तो तुम्हारी होगी, कल की जिंदगी भर नहीं भूलोगी।

अगले दिन हम सुबह साढ़े नौ बजे घर से निकले और दस बजे रिशु के घर पहुँच गए। अंदर गए तो रश्मि ने पूछा- आंटी, क्या हम लोग सबसे पहले आ गए हैं?

कामिनी- अरे नहीं, असल में पूजा रद्द हो गई क्योंकि पंडित जी बीमार हो गए ! सबको तो मैंने फोन करके मना कर दिया पर तुम्हारा फोन लग ही नहीं रहा था। अच्छा ही हुआ कि तुम आ गई, पहली बार आई हो इस घर में ! मोनू तो आता रहता हैं पर तुम तो शक्ल ही नहीं दिखाती। अब खाना खाकर ही जाना।

रश्मि- नहीं आंटी, ऐसी बात नहीं है ! पर कॉलेज के बाद समय ही नहीं मिलता।

अरे ऐसी भी क्या पढ़ाई ! यही तो उम्र है खेलने खाने की ! क्यों मोनू?

मैंने शरारत से कहा- जी, मैं तो खूब खेलता-खाता हूँ आप तो जानती ही हैं। रिशु कहाँ है?

कामिनी- नहा रहा है !

तब तक रिशु नहा कर आ गया और उसने सिर्फ एक तौलिया लपेट रखा था। उसको देख कर रश्मि शरमा गई तो रिशु बोला- अरे क्या दीदी, बचपन में हम दोनों नंगे खेलते थे और अभी तो तौलिया पहना है मैंने ! तब भी शरमा गई?

रश्मि बोली- हट बदमाश !

रिशु रश्मि के सामने इस प्रकार से बैठ गया कि उसका लण्ड रश्मि को नजर आता रहे। रश्मि की निगाहें भी बार बार उसके तौलिए के अन्दर उसके लण्ड पर जा रही थी और यह बात हम तीनों से छिपी नहीं थी।

कामिनी ने मुझसे पूछा- मोनू कोल्डड्रिंक या चाय?

मैंने कहा- चाय !

रिशु ने भी चाय माँगी तब कामिनी ने रश्मि से पूछा तो वो बोली- जब ये लोग चाय पियेंगे तो मैं भी वही ले लूंगी।

पाँच मिनट में चाय आ गई और हमने अपने अपने कप उठा लिए।

तभी रिशु किसी बहाने से उठा और रश्मि के पास गया। रिशु ने रश्मि के ऊपर अपनी चाय गिरा दी, योजना के अनुसार रिशु की चाय ज्यादा गर्म नहीं थी। और वो पूरी चाय से तरबतर हो गई।

कामिनी को मैंने इशारा किया और वो रिशु के ऊपर चिल्लाने लगी।

रिशु ने तुरंत रश्मि का टॉप खींच कर उतार दिया तो रश्मि अकस्मात हुए इस घटनाक्रम से स्तम्भित सी रह गई। जब उसे अपना होश आया तो वो अपने को रिशु से छुड़ाने का प्रयत्न करने लगी। तब तक कामिनी उनके पास पहुँच चुकी थी और कामिनी ने रश्मि को रिशु से छुड़वा कर अपनी बाहों में ले लिया, उसे बाथरूम में ले गई और उसके ऊपर शॉवर चला दिया।

हम दोनों भी बाथरूम में गए तो देखा कि कामिनी भी बिल्कुल भीग चुकी थी। कामिनी रश्मि की ब्रा भी उतार चुकी थी और उसके स्तनों को धोने के बहाने मसल रही थी, उसके चुचूकों से खेल रही थी।

रश्मि की यौनाग्नि प्रज्वलित हो चुकी थी और उसके आंखें मुंदी जा रही थी।

रिशु अन्दर गया और वो भी रश्मि के स्तन मसलने लगा। रिशु ने रश्मि की चूचियों पर हाथ फ़ेरते हुए पूछा- अब जलन तो नहीं हो रही?

इस पर कामिनी बोली- हाँ रश्मि बता दे ! अगर जलन हो रही है तो रिशु से बर्फ़ मंगवाऊँ?

मैं बोला- मैं लाता हूं बर्फ़ !

मैं बर्फ़ रसोई में जाकर फ़्रिज़ से बर्फ़ ले आया और रिशु और कामिनी दोनों उसकी चूचियों पर बर्फ़ फ़िराने लगे।

रश्मि सिहर गई और कहने लगी- नहीं आन्टी ! बहुत ठण्डी लग रही है।

तो मैं गर्म कर देता हूं ना चूस कर ! कह कर रिशु कुछ ही पलों में उसके स्तन चूसने लगा।

अरे तेरी जीन्स बिल्कुल भीग गई ! कहते हुए कामिनी रश्मि की जींस का बटन खोलने लगी और नीचे झुक कर उसकी जींस उसकी टांगों से अलग कर दी।

अब रश्मि सिर्फ़ पैंटी में थी।

कामिनी ने रिशु को आँख से इशारा किया तो रिशु अपने हाथ रश्मि की पैन्टी पर ले गया और उसकी फ़ुद्दी पैंटी के ऊपर से ही सहलाने लगा। रश्मि ने कोई विरोध नहीं किया।

रश्मि अब पूरी गर्म हो चुकी थी और सीत्कार रही थी। फिर रिशु उसकी पैन्टी के अन्दर से हाथ डाल कर उसकी चूत के बालों पर हाथ फिराने लगा।

कामिनी ने अपने हाथ से रश्मि की पैंटी नीचे सरका दी और अब रिशु का हाथ उसकी नंगी योनि पर था।

इसी अवस्था में कामिनी और रिशु मिलकर रश्मि को कमरे में ले गए और बिस्तर पर लिटा दिया।

आँटी रिशु के गीले कपड़े उतारने लगी तो रिशु ने कहा- मम्मी, आप जाइए, मैं सम्भाल लूंगा।

कामिनी के जाने के बाद रिशु उसकी चूत के घने बालों पर हाथ फिराने लगा, फ़िर रिशु रश्मि की चूत की फांकों पर हाथ फिराने लगा। फिर हाथ फिराते-फिराते रिशु उंगलियों को रश्मि की चूत के फाँको में डाल कर रगड़ने लगा और अपनी एक उँगली रश्मि की चूत के अन्दर घुसा कर उसकी चूत को हल्के-हल्के रगड़ने लगा।

फिर उसकी चूत के जी-पॉयंट को अपनी उंगलियों से दबाने और हल्के-हल्के रगड़ने लगा। लगभग 5-7 मिनट बाद रश्मि की चूत से कुछ बहुत चिकना सा निकलने लगा।

अचानक रश्मि के मुँह से सिसकियाँ निकलने लगी और उसने अपनी आँखें खोल दी और काम-मद में बोली- रिशु क्या कर रहे हो?

रिशु ने कहा- बस सोचा कि आज अपनी रश्मि को कुछ मजा कराया जाये। सच बताओ, क्या मजा नहीं आ रहा हैं? मुझे पता है तुम मजे ले रही थी। वरना तुम्हारे नीचे से चिकना-चिकना सा नहीं निकलता।

रश्मि मुस्कुराई और बोली- सच रिशु, मुझे नहीं पता तुम क्या कर रहे थे पर मज़ा आ रहा था।

रिशु बोला- रश्मि, मेरा साथ दो। हम दोनों मिलकर खूब मजा करेंगे।

रश्मि बोली- क्या साथ दूँ और क्या दोनों मिलकर मजा करेंगे। और मेरी पैंटी क्यो उतार रखी है ?

रिशु ने कहा- रश्मि, मैं तुम्हारी पैंटी के अन्दर मजा ढूंढ रहा था !

कह कर रिशु ने उसे अपने सीने से चिपका लिया और फिर रिशु ने अपने जलते हुऐ होंठ रश्मि के होंठों पर रख दिए।

फिर रिशु उसके नरम-नरम होंठों को अपने होंठों में भर कर चूसने लगा। रश्मि ने भी उसे अपनी बाँहो में कस लिया। वो बहुत गर्म हो चुकी थी, जोर-जोर से सिसकारियाँ ले रही थी, रिशु के बालों पर हाथ फेर रही थी और उसके होंठ चूस रही थी।

रिशु का लण्ड रश्मि की जांघों से रगड़ खा रहा था। रिशु ने रश्मि का हाथ पकड़ कर अपने लण्ड पर रख दिया। रश्मि ने बिना झिझके रिशु का लण्ड अपने हाथ में थाम लिया। वो लण्ड को अपने हाथ में दबाने लगी। रिशु का लण्ड तन कर और भी सख्त हो गया था। रश्मि लण्ड को मुठ्ठी में भर कर आगे-पीछे करने लगी। फिर वो रिशु का लण्ड पकड़ कर जोर-जोर से हिलाने लगी।

अब रिशु रश्मि की चूत मारने को बेताब हो रहा था। रिशु रश्मि के ऊपर आकर लेट गया। रश्मि का नंगा जिस्म रिशु के नंगे जिस्म के नीचे दब गया। रिशु का लण्ड रश्मि की जांघों के बीच में रगड़ खा रहा था।

रिशु उसके उपर लेट कर उसके चुचूक को चूसने लगा। वो बस सिसकारियाँ ले रही थी। फिर रिशु एक हाथ नीचे ले जा कर उसकी चूत पर रख कर रगड़ने लगा और फिर एक उंगली उसकी चूत में डाल दी। वो मछली की तरह छटपटाने लगी और अपने हाथों से रिशु का लण्ड को टटोलने लगी। रिशु का लण्ड पूरे जोश में आ गया था और पूरा तरह खड़ा हो कर लोहे जैसा सख्त हो गया था।

रश्मि रिशु के कान के पास फुसफसा कर बोली- ओह रिशु। प्लीज़ ! कुछ करो ना। तन-बदन में आग सी लग रही है।

यह सुन कर अब रिशु ने उसकी टांगें थोड़ी ओर चौड़ी की और उसके ऊपर चढ़ गया। फिर अपने लण्ड का सुपारा उसकी चूत पर रख कर रगड़ने लगा। फिर रिशु ने अपने लण्ड का सुपाड़ा उसकी चूत पर टिका कर एक जोरदार धक्का मारा जिससे लण्ड का सुपारा रश्मि की कुंवारी चूत को फाड़ता हुआ अन्दर चला गया।

लण्ड के अन्दर जाते ही रश्मि के मुँह से चीख निकल गई और वो अपने हाथ पाँव बैड पर पटकने लगी और रिशु को अपने ऊपर से धकेलने की कोशिश करने लगी। लेकिन रिशु ने उसे कस कर पकड़ा था।

रश्मि की चीख सुन कर कामिनी अन्दर आ गई और सारा खेल देखने लगी।

रश्मि रिशु के सामने गिड़गिड़ाने लगी- प्लीज़ रिशु, मुझे छोड़, रिशु मर जाऊंगी, बहुत दर्द हो रहा है।

रिशु ने कहा- रश्मि तुम ही तो कह रही थी कि रिशु, प्लीज़ ! कुछ करो ना। तन-बदन में आग सी लग रही हैं। इसलिये तो तुम्हारे अन्दर डाला है। रश्मि तुम चिन्ता मत करो, पहली बार में ऐसा होता है, एक बार पूरा अन्दर जाने के बाद तुम्हें मज़ा ही मज़ा आएगा।

रश्मि को देख कर कामिनी हंसने लगी और बोली- अरे पूरा डालो तब इसे असली मज़ा आयेगा।

यह सुन कर रिशु ने एक और धक्का लगा कर उसकी चूत में अपना आधा लण्ड घुसा दिया। रश्मि तड़पने लगी। रिशु उसके ऊपर लेट कर उसके उरोज़ों को दबाने लगा और उसके होठों को अपने होठों से रगड़ने लगा। इससे रश्मि की तकलीफ़ कुछ कम हुई।

अब रिशु ने एक जोरदार धक्के से अपना पूरा का पूरा लण्ड उसकी चूत के अन्दर कर दिया। रिशु का 8″ लम्बा और ३” मोटा लण्ड उसके कौमार्य को चीरता हुआ उसकी कुँवारी चूत में समा गया।

इस पर वो चिल्लाने लगी- आहह्ह, मर गई। ओह प्लीज़ रिशु इसे बाहर निकाल, रिशु मर जाउंगी।

उसकी चूत से खून टपकने लगा था।

रिशु रुक गया और रश्मि से बोला- प्लीज़ ! रश्मि, मेरी जान, अब और दर्द नहीं होगा।

रश्मि का यह पहला सैक्सपीरियन्स था। इसलिए रिशु वहीं रुक गया और उसे प्यार से सहलाने लगा और उसके माथे को और आँखों को चूमने लगा । उसकी आँखों से आँसू निकल आये थे और वो सिसकारियाँ भरने लगी थी। यह देख कर रिशु ने रश्मि को अपनी बाँहो में भर लिया।

फिर रिशु ने अपने जलते हुऐ होंठ रश्मि के होंठों पर रख दिए और रिशु उसके नरम-नरम होंठों को अपने होंठों में भर कर चूसने लगा, ताकि वो अपना सारा दर्द भूल जाये। कुछ देर बाद उसका दर्द भी कम हो गया और उसने मुझे अपनी बाँहों में से कस लिया। रिशु ने भी रश्मि को अपनी बाँहों में भर लिया। रिशु का पूरा लण्ड रश्मि की चूत के अन्दर तक समाया हुआ था। फिर रिशु अपनेहोंठों से उसके नरम-नरम होंठों को चूसने लगा।

कुछ देर तक दोनों ऐसे ही एक-दूसरे से चिपके रहे और एक-दूसरे के होंठों को चूसते रहे।

फिर रिशु अपने लण्ड को उसकी चूत में धीरे-धीरे अन्दर बाहर करने लगा। रश्मि ने कोई विरोध नहीं किया। अब शायद उसका दर्द भी खत्म होने लगा था और वो जोश में आ रही थी और अपनी कमर को भी हिलाने लगी थी। उसकी चूत में से न बाहर आ रहा था जो इस बात का सबूत था कि उसकी चूत अभी तक कुंवारी थी और आज ही रिशु ने उसकी सील तोड़ी है।

उसकी चूत बहुत तंग थी और रिशु का लण्ड बहुत मोटा था, इसलिए रश्मि को चोदने में बहुत मजा आ रहा था। रिशु अपने लण्ड को धीरे-धीरे से रश्मि की चूत के अन्दर-बाहर कर रहा था।

फिर कुछ देर बाद रश्मि ने अपनी टांगें उपर की तरफ मोड़ ली और रिशु की कमर के दोनों तरफ लपेट ली। रिशु अपने लण्ड को लगातार धीरे-धीरे रश्मि की चूत के अन्दर-बाहर कर रहा था। धीरे-धीरे रिशु की रफ़्तार बढ़ने लगी। अब रिशु का लण्ड रश्मि की चूत में तेजी से अन्दर-बाहर हो रहा था। रिशु रश्मि की चूत में अपने लण्ड के तेज-तेज धक्के मारने लगा था।

थोड़ी देर में रश्मि भी नीचे से अपनी कमर उचका कर रिशु के धक्कों का ज़वाब देने लगी और मज़े में बोलने लगी- सी …. सी…. और जोररर से………. येस अररऽऽ बहुत मज़ा आ रहा है और अन्दर डालो और रिशु और अन्दर येस्स्स्स्सऽऽ जोर से करो। प्लीज़ ! रिशु तेज-तेज करो ना। आज मुझे बहुत मज़ा आ रहा है।

रश्मि को सचमुच में मजा आने लगा था। वो जोर जोर से अपने कूल्हे हिला रही थी और रिशु तेज़-तेज़ धक्के मार रहा था। वो रिशु के हर धक्के का स्वागत कर रही थी। उसने रिशु के कूल्हों को अपने हाथों में थाम लिया। जब रिशु लण्ड उसकी चूत के अन्दर घुसाता तो वो अपने कूल्हे पीछे खींच लेती। जब रिशु लण्ड उसकी चूत में से बाहर खींचता तो वो अपनी जांघें उपर उठा देती।

रिशु तेज-तेज धक्के मार कर रश्मि को चोदने लगा।

फिर रिशु बैड पर हाथ रख कर रश्मि के ऊपर झुक कर तेजी से उसकी चूत मारने लगा। अब रिशु का लण्ड रश्मि की चिकनी चूत में आसानी और तेजी से आ-जा रहा था। रश्मि भी अब चुदाई का भरपूर मजा ले रही थी। वो मदहोश हो रही थी।

रिशु ने रुक कर रश्मि से पूछा- रश्मि अच्छा लग रहा है?

रश्मि बोली- हाँ रिशु, बहुत अच्छा लग रहा है। प्लीज़ ! रुको मत। तेज-तेज करते रहो। हाँ प्लीज़ ! तेज-तेज करो। प्लीज़ ! चलो करो। अब रुको मत। तेज-तेज करते रहो।

रश्मि के मुहँ से यह सुन कर रिशु ने फिर से रश्मि को पूरे आवेग से चोदना शुरु कर दिया। रिशु ने रश्मि के बड़े-बड़े कूल्हे को अपने हाथों से जकड़ लिया और छोटे-छोटे मगर तेज-तेज शॉट मार कर रश्मि को चोदने लगा।

रश्मि के मुँह से मस्ती में “ओह्ह्हहोहोह सिस्स्सह्ह्ह हाहाह्ह्हआआआ हा-हा करो-करो ऽअआह हाहअआ प्लीज़ ! रिशु तेज-तेज करो।”

करीब 15 मिनट की चुदाई के बाद वो झड़ने वाली थी तभी दोनों एक सा अकड़ गये और एक साथ जोर-जोर से धक्के मारने लगे। फिर अचानक रश्मि ने रिशु को कस कर अपनी बाँहो में भर लिया और बोली- रिशु रिशु ! क्या हो रहा है मुझे ! जोर-जोर से करो येस-येस अररर् और जोर से य….य….यस यससस रिशु हई ईई….! इसके साथ ही रश्मि की चूत ने अपना पानी छोड़ दिया। उसने एक जोर से आह भरी और फिर वो ढीली पड़ गई।

रिशु समझ गया कि रश्मि स्खलित हो गई है। लेकिन रिशु का काम अभी नहीं हुआ था इसलिए रिशु जोर-जोर से अपने लण्ड से रश्मि की चूत को पेलने लगा। रिशुभी झड़ने वाला था, इसलिये रिशु तेज-तेज धक्के मारने लगा।

रश्मि रोने सी लगी और रिशु के लण्ड को अपनी चूत में से बाहर निकालने के लिए बोलने लगी। लेकिन रिशु ने उसकी बातों को अनसुना कर धक्के लगाना जारी रखा।

करीब 2-3 मिनट तक रश्मि को तेज-तेज चोदने के बाद जब रिशु होने लगा तो रिशु ने अपना लण्ड रश्मि की चूत से बाहर खींच लिया और उसकी चूत के झांटों ऊपर वीर्य गिरा दिया और उसके ऊपर गिर गया। फिर रिशु उसके ऊपर लेट कर अपनी तेज-तेज चलती हुई सांसों को सामान्य होने का इन्तज़ार करता रहा। फिर रिशु रश्मि की बगल में लेट गया। रश्मि भी रिशु के साथ लेटी हुई अपनी सांसों को काबू में आने का इंतजार कर रही थी।

रश्मि की चूत के काले घने घुंघराले बालों में रिशु के वीर्य की सफेद बून्दें चमक रही थी।

कामिनी बोली- अरे रिशु तू पहली ही बार में इतनी देर टिका रहा? कमाल है।

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Indian Wife With Maid Hubby

Simran hesitated just for an instant before pulling her panty down and stepping out of it fully nude. She was still in her dressing room. She had read about the benefits of massage in a number of newspapers and journals but could perhaps never muster the courage to go to a parlour. All sorts of doubts would appear to cloud her mind. How could she strip fully before complete strangers! And if the masseuse turned out to be a man! God! She would certainly die due to sheer embarrassment. And if she insisted on having a lady to do the job, perhaps the parlour owners would smirk at her prudishness. However when her maid servant Lakshmi had once mentioned that she too had lived in Kerala and had picked up that art, Simran decided that the time had come to indulge in what she had wanted to do for so long. For the lady to be seen nude by a maid servant was, well, natural. The only thing was the initial hesitation because till now Simran had only been topless in front of Lakshmi and that too only once.

The admiration that was reflected in Lakshmi’s eyes at that time was not lost on Simran. So when she broached the topic of getting herself massaged by Lakshmi, her response was more than enthusiastic. Lakshmi and her husband Bhavdeep had been with them for almost one year. While Bhavdeep worked as a driver, Lakshmi looked after the kitchen and whatever sundry work was assigned to her. Lakshmi was dark and in her early thirties whereas Bhavdeep, though of a similar age was fairer and looked slightly younger. In fact so fair was his complexion that an ignorant visitor could have been excused for assuming that he was a member of the family. At 26, Simran had a body that would give many established models a run for their money. Generous and firm 34 B size breasts complimented her 5 feet 7 inches body that was tall by Indian standards. Before stepping out from the dressing room she permitted herself some vanity and admired her nude self. The slender neck, the flawless satin skin, the shapely breasts capped by chocolatish brown nipples with small aerola, the sparse hair in the shaped pussy which did not do much to hide the lips of the labia, the long and lovely legs and the nail polished bare feet. There was a long and black beauty spot not unlike the shape of a heart, which was situated at the top of her right thigh. It had been a matter of some onsolation to Simran that the mark was situated so high that it would be visible only if she went nude and the chances of that were remote.

Her nude body was a sight that could have stopped anyone in his tracks. A light golden chain in the neck, appropriately designed bangles on her wrists and a cute pair of anklets only served to accentuate her well toned body. A suitable mat had been spread on the floor. Lakshmi had locked the door and was waiting for Simran with a bottle of oil in her hand.. This bottle had been purchased by Simran herself with the fond hope that someday she would be making use of it. That day had finally arrived. She finally took a deep breath and stepped out of the dressing room. She was feeling very self conscious but had braced herself by telling her own self that if she wanted a massage she had to strip, so it was best to act confident. As Lakshmi saw her Mem Sahib nude for the first time, she just stood mesmerised. If she had found Simran to be beautiful from above the waist, she was absolutely gorgeous from below the waist. Lakshmi also noted that Simran had recently got her belly button pierced and a dainty golden ring there, despite its small size was arousing tremendous passion in whosoever beheld that sight. Lakshmi was fully aware of the employer/employee relations between herself and Simran but she couldn’t help thinking that if the sight of Simran’s nude body could have such a powerful impact on her, what impact would it have on a male? Simran acted nonchalant as if this was not at all a big deal for her. She closed her eyes, took a deep breath and lay there ready for Lakshmi to start. The first touch made her jump but she soon relaxed as Lakshmi poured warm oil over her back. The smoothing of the oil on her body was delicious, the firm yet soft hands soothing her, first her shoulders, arms then lower back and when her buttocks trembled slightly under Lakshmi’s touch she felt a sense of letting go… almost a submission to her maid. Mem Sahib. may I say something?’ Lakshmi asked ‘Yes.’ Simran answered. ‘You are very beautiful.’ Lakshmi said in a husky tone. After all, it was not everyday that one got to work with a beautiful lady and it was even rarer to see her nude.

‘Hmm.’she mumbled not knowing how exactly to respond to a compliment being paid by a maid. ‘Mem Sahib. You are so hairless here. Just this little line of vertical hair looks very pretty.’ Lakshmi carried on pointing to Simran’s shaped pussy with her eyebrows. ‘Sahib must be very happy to see you that you put in so much effort to give it such a proper shape.’ Simran felt that the most appropriate response would be to keep quiet. She felt that Lakshmi was overstepping her limits but the compliments were such that she was actually enjoying listening to them. Her legs and feet were coated with the oil and Simran’s body felt so relaxed….so out of her control that when Lakshmi parted her legs to coat her inner thighs, she moaned softly and felt a familiar wetness beginning to form in her most sensitive spot between her thighs.

‘Mem Sahib. This dark spot that you have right here is very beautiful’ Lakshmi said running her slick fingers over the smooth skin on the inner thigh. Simran knew that in the state of nudity,the spot would be so visible that it would definitely be noticed. ‘Even Bhavdeep has a similar spot.’ Lakshmi continued. ‘Where?’ Simran asked sleepily and regretted it almost immediately. The massage had had a twin impact on her: she had started feeling drowsy and aroused at the same time. ‘Very close to where you have it. It is long and carries on upto where his……. starts.’ Lakshmi said blushing furiously. Even Simran was blushing. It felt odd to be discussing birthmarks of the maid’s husband situated in private parts. Despite that she felt a tingling in the lips of her pussy and immediately dismissed all erotic thoughts. How could she feel aroused thinking about a maid’s husband? For a moment the feeling of embarrassment persisted and then faded away. So she relaxed, not bothering to close her legs when Lakshmi had coated them and, with the oil on her body, she couldn’t tell what was oil and what was her body’s reaction to the hands that stroked her. However, she dreamily thought that it was good that Lakshmi is so adept at her job and it was such a pleasure to be treated like a queen. Lakshmi smiled down at Simran’s naked body lying on the table before her and admired the gleaming skin. It had shades of a beautiful golden brown all over except for the pink undersides of her feet. Everything appeared to be going dreamily when Simran heard loud noises outside. What on earth could have been going on, she wondered. The voices were that of her husband and he appeared to be very angry. ‘Lakhmi, I must go and see. Amit appears to be very upset.’ Simran said. ‘Okay, Mem Sahib. As you say.’ Lakshmi said winding up the massage by rubbing the remaining oil in Simran’s body by gently pulling her buttock cheeks apart and rubbing her oily fingers in the crack. For a fraction of a second they lingered on teasingly at the entry of her ass and then it was over. Simran hurriedly put on the gown that she had discarded over her body and emerged from the room.. She was quite perturbed and it did not bother her that her ample cleavage could be seen. With Lakshmi close on her heels she proceeded towards the place from where the voice was emanating and were just in time to hear the sound of a resounding slap. Both Simran and Lakshmi were aghast to see that the recipient of the slap was none other than Lakshmi’s husband Bhavdeep. ‘What is going on here?’ Simran asked no one in particular. ‘Ask this man. He is so thankless. We have employed both of them. Not only is he not sincere he answers back.’ Amit bellowed. Bhavdeep stood transfixed to the ground and did not utter a single word.

‘Whatever the case may be you should learn to keep your temper under control.’ Simran spoke to her husband. She somehow felt bad at this crass display of crude power by her husband and that too in front of Lakshmi. What would a wife feel when she saw her husband being slapped! ‘I am fed up. You also lecture me.’ Amit spoke in an exasperated tone and marched out of the room. Simran felt like consoling Bhavdeep and just as she approached him, she became conscious that her robe had just been tied with a cord and that under the robe she was completely nude. Her bare legs could be seen through the slit in the gown just as her cleavage. As she was becoming conscious of her state and was contemplating withdrawing, her eyes met that of Bhavdeep. She expected to find a feeling of hurt; instead she found a lusty feeling, a desire that was at the same time scary and endearing. By way of reflex action, Simran looked down at her feet and turning around swiftly walked to the privacy of her room. Somehow she felt a trifle disturbed. What disturbed her even more was that she did not feel contempt for the husband of her maid. This is preposterous, she told herself as she looked at herself in the mirror. Her skin was glowing from the massage and it was hardly Bhavdeep’s fault that he had forgotten all about the insults heaped on him by her husband. Simran shuddered, and peeled off the gown over her slender shoulders. For a while she looked at her bare self in the mirror. As she saw her own birthmark hidden so tastefully by nature, she recalled what Lakshmi had told her about a similar mark’s existence on Bhavdeep’s cock. Even within the solitary confines of her room, Simran blushed and went to the bathroom for a shower. That night Amit returned very late and was too tired and drunk to do anything. Simran wanted to speak to him but found that there was no point in trying. She expected Lakshmi to be sulking the next day but was pleasantly surprised to find that she was present in the house, in time. Simran was wearing the same gown that she had worn the previous evening. It was a gown that she was very fond of and though her mother-in-law had once or twice made disparaging comments about the fact that it revealed more than it hid, it was still a favourite of Simran. ‘I am sorry about yesterday.’she said in a small voice. ‘Why, Mem Sahib?’ Lakshmi appeared to be quite normal. ‘I mean Amit did not really behave the way he should have.’ Simran elaborated. ‘Oh, that. It is okay Mem Sahib. Bhavdeep is a very nice person. He likes Sahib a lot.’ Lakshmi said. ‘And you too.’ She added. ‘What?’ Simran was surprised. Nothing, Mem Sahib. And you won’t believe what happened. At night, I told him that you are really beautiful and that you too have a birth mark like he does. He asked me how did I know and I told him that I had massaged you, that was how.’ Lakshmi said excitedly. ‘You told him that you had seen me nude?’ Simran was aghast. ‘Yes, Mem Sahib. What is wrong? I am a woman and I thought that it was perfectly okay to tell him that I had seen you nude. Did I do something wrong?’ Lakshmi asked innocently. Simran did not know as to how to explain things to Lakshmi. First she goes and tells her husband that she has seen Mem Sahib nude, then she also tells him that he and Mem Sahib have a similar birthmark and that too in their private parts. Nothing wrong. But what is the need to say such things?’ Simran said absent mindedly. The day passed uneventfully. Amit was grumpy all throughout. He hardly had anything for breakfast and was busy throughout the day. He had taken another driver and Bhavdeep was left behind. Lakshmi too therefore went early but returned after two hours saying that since Bhavdeep had gone away because of some important work, she did not know what to do. That night Simran wanted to please Amit, so she put on her sexiest nightie. It was a peach coloured one brought by Amit from one of his sojourns abroad. She applied erotic perfume on her pussy and underarms and on the back of her knees before wearing a diaphanous bra and G string panty which left little for the viewer’s imagination. She put on a dainty pair of silver anklets which were just right for a nice round of lovemaking, subtle enough to highlight Simran’s feminity. Tastefully applied nailpolish on her toes and hands made her look absolutely ravishing. Amit did arrive at around 11 at night. He had to attend a party with some colleagues and did not appear to be in the best mood. However seeing his wife in such lovely attire did lift his spirits a little. He went to the bathroom for a shower and by the time he returned, Simran had slid between the cold and crisp white sheets in anticipation of what should have followed. Just as Amit was easing himself into the bed there was a sound from the drawing room. This appeared to be strange. The servants lived in the outhouse and there was no reason for anybody’s presence in the house. It could perhaps have been a cat or a mouse. This suspense lasted for barely a minute when Simran was appalled to see a well built man in a mask intruding into the bedroom. Simran was almost nude but thankfully in the bed.. The mask was black in colour and hid the entire face except for the eyes and the lips. He was armed with a revolver. ‘Come to the drawing room. Both of you.’ He said his voice a menacing whisper. ‘I, well……….’ Simran stammered. ‘Out of the bed. Now.’ he said, his voice absolutely cold. Simran looked at Amit but he offered no advice. Not because he didn’t want to but he did not appear to be in a position to do so. Seeing that there was absolutely no alternative, Simran got out of the bed and saw the pupils of the intruder’s eyes widen as they drank in the sight of her body through the transparent nightie. Somehow they did not seem to be unfamiliar. Neither Amit nor Simran had any choice; so they meekly followed him, both of them too scared to do anything but obey. The fear in the living room was thick and palpable as Amit was made to sit meekly on a straight chair. Amit tried to assert himself but after a hectic day and the liberal pegs of whiskey he was in no position to take on the intruder. He was tied down firmly with a plastic rope brought by the intruder who also slammed down a handkerchief suffused with something on Amit’s mouth which made him even drowsier within no time. The intruder had obviously done his homework. What exactly he had in mind was beyond Simran. She was however feeling very awkward at being so scantily clad in front of the man. ‘Now take this nightie off nice and slow. Please’ The man’s voice was a whisper. Simran bit her lip as she looked over at her husband and knew she had very little choice in the matter so she hesitantly took off her necklace Amit given her as a birthday present and dropped it on the floor. ‘I’ll do whatever you say if you let us go and promise not to hurt me or my husband,’ Simran said, tears falling down her cheeks. Come on, please be quick. We assure you that if you behave you won’t be hurt.!’ The man commanded, his eyes blazing with lust. Simran felt her face flush self-conciously as she tentatively, almost seductively, took her beautiful nightie off. The hungry look in his eyes made her try to cover her glorious bra-covered C-sized breasts, but thought better of it and pulled them away and unhooked her bra, dropping it to the floor. Her breasts felt nice and free in the open air and her brownish nipples were hard, like bullets from the fear and cold. One thing many guys found attractive about her was the fact her breasts stuck out and didn’t bounce as much as most women’s did. The only problem was most people that had seen her breasts (which wasn’t very many, only other girls), thought that this meant that she undergone some expensive surgery, which wasn’t true. As Simran stepped out of the nightie leaving it crumpled on the floor, she felt an odd sensation enter her body. She couldn’t describe it beyond knowing that this man, Besides her husband, was perhaps the only one who was seeing her virtually nude. ‘I did what you said. Please take what you want and let us be.’ Simran said, afraid that he would force her to take her panties off as well. ‘Not quite yet,’ The man said as he came up to her with a wide cruel smirk. He took the initiative in pulling her lace panties down right to her bare feet exposing her beautifully shaped pussy. It was his casual demeanour that Simran found chilling. ‘Look, this is nothing personal, but it is a fantasy of all rich persons to see their wives have pleasure. All sorts of pleasure.’ ‘W..what does that mean?’ Simran asked suddenly terrified. ‘Don’t be afraid.’ He said almost patronizingly. ‘I am sure you know how pretty you are. Surely this beauty needs to be shared with persons who are not as fortunate as he is.’ He said pointing towards Amit. ‘Please, please…….’ Simran burst into tears. ‘You somehow think that I want to hurt you. Not if you cooperate. You,’ he said addressing Amit. ‘Tell her to co-operate and enjoy; if you do not want to get seriously hurt.’ He was so much in command of the situation that he kept the revolver on one side and stepped out of his trouser. He wore no underwear and out sprang an uncircumcised cock that was surprisingly fair and well built. Simran had always imagined that the burglars were always the dark skinned ones but this was to her, even in that state of terror, a surprise. The head looked like a helmet, oozing white stuff that she knew had to be precum. It was the raw power behind it that truly frightened her. ‘Please don’t do this to us. If it is money that you are after, we are prepared to let you have whatever you want.’Simran said. Simran’s please seemed to have no effect on him, rather it seemed that he was getting a kick out of her discomfiture. Looking over at her husband, still in bondage, Simran was horrified to notice he was now recovering from the effects of the tranquillizer that he had smelt. ‘Please don’t force me to be rough with you. Surely you realize that I can get what I want by being nasty. If that is what you want, so be it. Should I start by breaking his teeth?’ he said in a matter of fact manner while proceeding to switch off the light. ‘It won’t do for others to wonder as to why the light in the room is on at this time of the night but the light that is coming in from your bedroom should keep us going nicely. Now, you well, what does a girl do when she sees a cock? Obviously sucks it. So do it. But wait, I think I need to do you a favour.’ The man knelt between her legs rubbing his own cock which had assumed a full throbbing erection by then. ‘That’s nice, God I wish I had a camera at a time like this.’ He laughed quietly at the possible humiliation she would feel. Then he leaned in on her and with one hand squeezed her breasts. He took the other hand to his mouth and put one finger inside it. Once it was properly wet and dripping from his saliva he began sliding it in and out of Simran’s pussy.. Just up to the knuckle to get her wet, but she was already wet and he worked in the whole finger and started fucking her with it the other hand teasing her nipples. She closed her eyes and rolled her head back trying to ignore what he was doing to her, but Amit could see Simran bite her lip and start to hump back. He worked in a second finger and got a bit more energetic and she turned her head left and the right taking deep breaths. When he started thumbing her clit at the same time she lost it. No longer could she control what her body was going through. Her chest heaved and both her husband and the intruder saw the ripples run down her abdomen with each contraction. Her thigh twitched and her whole body shook with the power of her orgasm. Before she could think, the man was leaning down on top of her. She could feel his hard-on against her belly and knew it would be inside soon. He worked it against her skin to get used to her body and began searching for her wet pussy. This was not the way she wanted this to happen. She had to stall him somehow.